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मोदीराज लाओ

मोदीराज लाओ
भारत बचाओ

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2011

हिन्दूओं के खून से लथपक्ष अरबी टोपी और अरबी रूमाल (काफा) पहनने से बड़ी दुर्भावना और क्या हो सकती है?


आजकल भारत में ऐसे परजीवियों की भरमार सी आ गई है जो खुद को कहते तो बुद्धिजीवि हैं पर काम करते हैं परजीवियों(parasites) जैसे। मोदी जी, पिछले 10 वर्षों से हिन्दूविरोधी-देशविरोधी ISI ऐजेंटों द्वारा चलाए जा रहे, दुष्प्रचार से भारत खासकर गुजरात के देशभक्त लोगों को छुटकारा दिलवाने के लिए सदभावना व्रत के माध्यम से गुजरात में हुए अप्रतयासित परन्तु योजनावद्ध विकाश का प्रचार प्रसार कर देश को विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा फूट डालो और राज करो के माध्यम से पहुंचाए जा रहे नुकशान से मुक्त करना चाहते हैं। लेकिन ये परजीवि देशहित से जुड़े विकाश के मुद्दे की चर्चा करने के बजाए ये चर्चा कर रहे हैं कि मोदी जी ने पहले अरवी टोपी और अब अरबी रूमाल लेने से क्यों मना कर दिया।
इन चर्चा करने वालों को क्या ये समझाने की जरूरत है कि ये अरवी टोपी (टोपी पर कलिक करें)Arbi Topiऔर काफा दुनियाभर में कत्लोगरद और हिंसा का प्रतीक बन गए हैं। दुनिया में ऐसा कौन सा सांप्रदाय ऐसा है जो इस्लामिक हिंसा और अत्याचार का सिकार नहीं हुआ है।
केवल ईसाईयों ने ही योजनावद्ध तरीके से इस्लामिक हिंसा का मुकाबला करने व हिंसा फैलाने वाले मुसलमानों को उनके किए से हजारों गुणा ज्यादा सजा देकर इस्लाम के मानवताविरोधी कुकृत्यों को राजनीतिक व सामाजिक भेदों को भुलाकर एकजुट होकर हिंसक इस्लाम को समाप्त करने की रणनीति बनाने और उसको लागू करने में सफलता हासिल की है ।इसी का परिणाम है कि आज अमेरिका जैसे बड़े ईसाई देशों से लेकर रोम जैसे छोटे ईसाई देश भी अपने आप को न केवल सुरक्षित रखने में सफल हैं बल्कि इस्लामिक आतंकवादियों को उनके घर में घुसकर मारने में भी अग्रणी हैं। ये देशभक्ति और जागरूकता का ही परिणाम है कि फ्रांस जैसे ईसाई देश ने अरबी पहनावे पर न केवल रोक लगाई बल्कि उसे सख्ती से लागू भी किया। ईसाईयों द्वारा इस्लामिक आतंकवाद से लड़ने में सफलता हासिल करने का सबसे बड़ा कारण है सबकेसब ईसाईयों द्वारा मुसलमानों के विरूद्ध लड़ रहे ईसाई क्रांतिकारियों व सरकारों का एक जुट होकर साथ देना।
ऐसा नहीं कि भारत ने इस्लामिक आतंकवाद का मुकावला नहीं किया। ये इस्लामिक आतंकवाद से मुकावले का ही परिणाम है कि हम आज तक भारतीय सभ्यता के अवशेषों को बचाकर रखने में कुछ हद तक सफल हुए हैं।अगर अब भी हमने एकजुट होकर इस हिंसक इस्लाम का खात्मा नही किया तो वो दिन दूर नहीं जब हम इन अवशेषों से भी हाथ धो बैठेंगे।
अब प्रश्न ये पैदा होता है कि जब हमने इस्लामिक आतंकवाद का मुकाबला किया तो फिर ये इस्लामिक आतंकवादी क्यों भारतीय सभ्यता और संस्कृति को नुकसान पहुंचाकर करोड़ों हिन्दूओं का कत्ल करने में सफल हुए।
बेशक ये सच है कि छत्रपति शिवाजी जी से लेकर परमपूजनीय गुरूगोविन्द सिंह जी , साध्वी प्रज्ञासिंह ठाकुर जी व लैफ्टिनैंट कर्नल पुरोहित जी तक सबके सब देशभक्त हिन्दू क्रांतिकारियों ने इस्लामिक आतंकवाद से डटकर मुकावला किया लेकिन ये भी उतना ही सत्य है कि जब-जब भी देशभक्त क्रांतिकारियों ने इस्लामिक आतंकवाद को कुचलने की कोशिश की तब-तब नेहरू, अर्जुन सिंह, दिगविजय सिंह, कुलदीप नैयर, राजेन्दर सच्चर, अग्निवेश, अरूंधति राय, प्रशांत भूषण व गौतम नवलखा जैसे जयचन्दों ने देशभक्तों का साथ देने के बजाए इन आतंकवादियों का साथ देकर ,हिन्दूओं का लहू बहाने में इनकी मदद की व कर रहे हैं।
आज जो खुद को बुद्धिजीवि, उदारवादी ,धर्मनिर्पेक्षतावादी, या फिर मानवाधिकारवादी कह रहे हैं वो बास्तव में गद्दार जयचन्द का ही वर्तमान स्वारूप हैं। जयचन्द ने भी मुसलमानों से मिलने वाले राज्य व शिवाजी से चोटी-मोटी इर्ष्या के बदले इस्लामिक आतंकवादियों का साथ दिया व ये बर्तमान गद्दार भी ISI से मिलने वाले माल के बदले इस्लामिक आतंकवादियों का साथ देकर हिन्दूओं को मरवा रहे हैं।
ये इन ISI ऐजेंटों के दुष्प्रचार का ही कमाल है कि आज बेसमझ परजीवि सदभावना का अर्थ कतलोगारद और बरबर अत्याचार की पहचान अरवी टोपी को ही सदभावना का प्रतीक मानने की मूर्खता कर रहे हैं।
बैसे भी इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब भी किसी समाज ने इन इस्लामिक आतंकवादियों के प्रति दयाभवना या सदभावना दिखाई है तो इस्लाम ने उस समाज का नामोनिशान मिटाकर अपनी दुष्टता व नीचता का परिचय दिया है।
हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि दुनिया के वाकी सभी वो देश, जिन पर इस्लाम ने विजय प्राप्त की , इस्लामी आक्रमण के दो दशकों के भीतर 100% इस्लाम में परिवर्तित हो गए। भारत एक अपबाद है । 800 वर्षों के अत्याचारी मुसलिम शासन के बाद भी अविभाजित भारत में 75% हिन्दू अबादी थी। मुसलमानों को यही बात आज तक सता रही है कि मुसलमानों द्वारा किए गए वेहिसाब जुल्मों के बाबजूद वो मुसलिम आतंकवादी हिन्दूओं का मनोबल तोड़ने में क्यों सफल न हो पाए।
इसीलिए ये मुसलमान, मोदी जैसे व्यक्ति को जो हिन्दूह्रदय सम्राट के रूप में जाना जाता है, को पाकिस्तान, बंगलादेश, कशमीरघाटी ,मऊ, असाम, केरल व अन्य मुसलिम बहुल क्षेत्रों में मारे गए करोड़ों हिन्दूओं के खून से लथपथ ये अरबी टोपी पहनाकर देशभक्त हिन्दूओं का मनोबल तोड़ना चाहते हैं।
हमारे विचार में ये खूनी टोपी पहनना या पहनाना सदभावना नहीं बल्कि जालिम इस्लामिक आतंकवादियों का समर्थन कर, भूतकाल में कत्ल हुए व भविष्य में कत्ल होने वाले हिन्दूओं ही नहीं बल्कि मानबता के प्रति दुर्भावना है।
जरा सोचो कहीं आप जाने-अनजाने इस हिन्दूविरोधी दुर्भावना का समर्थन तो नहीं कर रहे हैं?

मंगलवार, 18 अक्टूबर 2011

प्रशांत भूषण ने ISI को खुला समर्थन देकर टीम अन्ना को मरवा दिया?


आज देश के जो हलात हैं उनमें कोई भी अच्छा काम करना अगर असम्भव नहीं तो वेहद मुसकिल है। क्योंकि जैसे ही कोई देशभक्ति की बात करता है उसे मुसलिमविरोधी करारा देकर इस्लामिक आतंकवादियों के निसाने पर लाने की कोशिस की जाती।
जब तक वो किसी हमले का सिकार न हो तब तक उसे इतना बदनाम कर दिया जाता है कि लोगों को लगने लगता है कि उसके साथ जो हुआ वो सही है जिस तरह स्वामी रामदेव जी पर रात के अन्धेरे में जान से मारने के लिए हमला किया गया उससे हर आम आदमी का आक्रोशित होना स्वाभाविक था लेकिन सरकार ने कांग्रेस की नई-नवेली सहयोगी ISI के ऐजेंट धर्मनिर्पेक्षतावदी गद्दारों को करोड़ों रूपए देकर स्वामी जी, उनके सहयोगी व बालकृष्ण जी के विरूद्ध मिडीया में एक ऐसा अभियान चलाया जिसके परिमामस्वारूप लगने लगा मानो सारे अपराध स्वामी जी और उनके साथियों ने ही किए हों।
इसी तरह अन्ना जी को भी बदनाम करने के लिए हर तरह का हथकण्डा अपनाया गया।
इससे पहले RSS व मोदी को भी ऐसे ही हथकण्डो का उपयोग कर हर तरह से ठिकाने लगाने की कोशिस की गई ताकि देश में कोई भी इस्लामिक आतंकवाद के विरूद्ध आबाज न उठा सके ।
ये ऐसे षडयन्त्रों की ही सफलता है कि अग्निवेश जैसे लोग पहले स्वामी राम देव जी के अन्दोलन में घुसे बाद में ये अन्ना जी के अन्दोलन में घुसकर स्वामी जी और अन्ना जी को एक दूसरे से अलग रखने में सफल रहे।
ऐसे ही षडयन्त्रों ने अन्ना जी को प्रखर देशभक्त संगठन RSS से अन्दोलन को मिल रहे समर्थन को ठुकराने की बात करने पर मजबूर कर दिया।
भारतविरोधियों के ऐसे ही षडयन्त्र के परिणामस्वारूप ही उनके सहयोगी प्रशांत भूषण ने एक ऐसा भारतविरोधी ब्यान दिया जो पूरी तरह से ISI और पाकिस्तान के भारतविरोधी रूख का समर्थन करता है।जिसके परिमास्वारूप पूरी टीम अन्ना देशभक्तों के निशाने पर आ गई।
ऐसा नहीं कि प्रशांत भूषण ने ऐसा भारतविरोधी ब्यान पहलीवार दिया हो लेकिन इसवार योजना अनुसार इसका भारतविरोधी मिडीया का उपयोग कर तब तक प्रचार-प्रसार किया गया जब तक टीम अन्ना देशभक्तों के निशाने पर नहीं आ गई।
आज अगर कांग्रेस केजरीबाल पर हमला करवाने का साहस कर रही है तो ये ISI के ऐजेंट धर्मनिर्पेक्षतावदी गिरोह के उसी षडयन्त्र का परिणाम है जिसके अनुसार प्रशांत भूषण से ये पाकिस्तान समर्थक ब्यान दिलबाया गया।
अगर प्रशांतभूषण ने भारतविरोधी ब्यान देकर टीम अन्ना को देशभक्तों की निगाह में गिराया न होता तो किसमें दम था कि टीम अन्ना के किसी भी सदस्य को हाथ भी लगा पाता।
इसीलिए कहा गया है कि बुरी संगत से अकेले भले(पहले तो ऐसे गद्दारों को टीम में लेना ही नहीं चाहिए था अगर गलती से ले भी लिए थे तो पता चलते ही निकाल देने चाहिए थे अगर निकालने का दम नहीं था तो कम से कम उनकी कुटाई का तो विरोध न करते जिससे लोगों में किसी शंका का निर्माण न होता क्योंकि भ्रष्टाचार और गद्दारी की जननी कांग्रेस तो मौके की तलास में थी।)।आज नहीं तो कल केजरीवाल जी पर हुए हमले का सच सामने आएगा ही ।वेशक आज ये हमला कांग्रेस ने करवाया है लेकिन बहुत जल्दी हमें पता चल जाएगा कि इसमें अग्निवेश और प्रशांत भूषण की कितनी भूमिका है।

क्या अन्ना जी दो नावों पर पैर रखकर नैया पार लगाने की सोच रहे हैं?

जिस तरह से अन्ना जी भारत माता की जय और वन्देमातरम् का उदघोष कर भ्रष्टाचार मिटाने की मुहिम चला रहे हैं उसे देखकर कोई भी देशभक्त अन्ना जी की ओर स्वभाविक रूप से ही दौड़ा चला आएगा।फिर वो चाहे किसी भी संगठन से क्यों न जुड़ा हो। ऐसे में अन्ना जी द्वारा RSS व भारत स्वाभिमान जैसे देशभक्त संगठनों से दूरी बनाना और देशद्रोहियों के लिए काम करने वाले अग्निवेश और प्रशांत भूषण को साथ रखना संदेह ही नहीं वल्कि गंभीर प्रश्न भी पैदा करता है।
वेशक भारतविरोधियों-हिन्दूविरोधियों के ऐजेंट अग्निवेश को बाहर का रास्ता दिया गया है लेकिन उसे बाहर का रास्ता इसलिए नहीं दिखाया गया क्योंकि वो भारत के विरूद्ध काम कर रहा था वल्कि इसलिए क्योंकि वो टीम अन्ना के विरूद्ध काम कर रहा था। मतलब टीम अन्ना का हित अन्ना जी के लिए भारत के हित से ज्यादा महत्व रखता है।
दूसरी तर्फ प्रशांत भूषण जो कि अग्निवेश की ही तरह भारत के शत्रुओं के हाथों में खेल रहा है को अन्ना जी वेशक लताड़ लगा रहे हैं लेकिन आतंकवादियों के इस साथी को अपनी टीम से बाहर करने की जिम्मेदारी उस टीम पर डाल रहे हैं जिस टीम में न जानें अग्निवेश और प्रशांत भूषण जैसे कितने ही ISI और वांमपंथी आतंकवादियों के प्यादे भरे पड़े हैं।
कुल मिलाकार ऐसा लग रहा है कि अन्ना जी गद्दारों और देशभक्तों को साथ रखकर एक ऐसा तानावान बुनने के चक्कर में जिससे कि अन्दोलन को इस्लामिक आतंकवादियों और बामपंथी कातिलों का समर्थन मिलने के साथ-साथ देशभक्तों का सहयोग भी मिल सके।
वरना अगर अन्ना जी को सिर्फ प्रखर देशभक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ना होता तो पहले तो अग्निवेस व प्रशांत ,जिनका पेशा ही आतंकवादियों का साथ देना है जैसे भारतविरोधियों को अपने साथ लेते ही नहीं और आगर उनमें सुधार की उम्मीद से उन्हे साथ ले ही लिया था तो उनके द्वारा ISI व पाकिस्तान की भाषा वोलने पर एक सैंकेड भी अपने साथ नहीं रखते।
अब वक्त आ गया है कि अन्ना जी साहस दिखाकर देशभक्तों और धर्मनिर्पेक्षतावादी गद्दारों में से किसी एक को चुनने का साहस दिखाकर अपनी असली मानसिकता का प्रमाण अपने समर्थकों और विरोधियों के सामने रखें।
वरना वो दिन दूर नहीं जब धर्मनिर्पेक्षतावदी गद्दार भारतविरोधी काम कर अन्ना जी के आज तक के वेदाग जीवन पर गद्दारी का ऐसा कलंक लगायेंगे जिसे आने वाली पीढ़ियां कभी माफ नहीं कर पायेंगी।
बैसे भी अन्ना जी आप बढ़े हैं हमारे से ज्यादा दुनिया को समझते हैं आपको ये कभी नहीं भूलना चाहिए कि दो नावों पर सवार होने वाला हमेशा मझधार में ही ढूबा है।
भगवान करे आप अपने मौन ब्रत के दौरान आपसे अनजाने में हुए गलतियों का समाधान देकर अपने देशभक्त समर्थकों को और निरूतसाहित नहीं करेंगे क्योंकि आज देशभक्त नागरिकों व संगठनों को धर्मनिर्पेक्षतावादी ISI ऐजेंटों द्वारा इतने जख्म दिए जा चुके हैं कि वो अब और जख्म बरदाश करने की स्थिति में नहीं हैं। कभी भी-कहीं से भी सम्पूर्ण क्रांति का ज्वालामुखी फूट सकता है।

शनिवार, 15 अक्टूबर 2011

A F Rehman और Raji Raouf, के दुष्प्रचार का खण्डन करने वाले डा. सुब्रमण्यम स्वामी जी के लेख “strategy to combat Islamic terrorism in India” का हिन्दी अनुवाद “भारत में इस्लामिक आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए रणनीति”




shubramanium Swami

खुले पृष्ठ ‘हिन्दू और मुसलिम परिपक्व हैं पर संघ परिवार नहीं।’ के लिेए एक खण्डन लेख।
द हिन्दु समाचार पत्र में में छपे उस अंश का ये खण्डन है जिसका शीर्षक है ‘हिन्दू और मुसलिम परिपक्व हैं पर संघ परिवार नहीं।’ (खुला पृष्ठ ,अगस्त 2011) जो कि खुद को मुसलमानों में उदारवादी सोच का प्रतिनिधि बताने वाले ए फैजुर रहमान द्वारा लिखा गया है।
यद्यपि रहमान द्वारा ये अंश पहले के एक अंश ‘हम मुसलमान परिपक्व हैं हम अलोचना सह सकते हैं’ (“खुला पृष्ठ”,अगस्त 7,2010 के संदर्भ में लिखा गया था। जो कि राजी रौफ द्वारा लिखा गया था क्योंकि राजी रऊफ ने मेरे द्वारा किसी अन्य समाचार पत्र में लिखित खुले पृष्ठ के वारे में दुष्प्रचार किया है इसलिए मेरे लिए ये जरूरी हो गया है कि मैं ‘द हिन्दु’ में रहमान द्वारा लिखित अंश का खण्डन करूं।
रहमान के अनुसार उदारवादी मुसलमान वो हैं जो उनके अनुसार मेरे द्वारा लिखित उत्तेजक लेखों पर प्रतिक्रिया नहीं करते। हालांकि रहमान ये बताने से चूक जाते हैं कि उदारवादी मुसलमानों की उन आतंकवादियों के प्रति क्या प्रतिक्रिया होनी चाहिए जो देश के विभिन्न हिस्सों में हजारों निर्दोष भारतीयों का कत्ल कर चुके हैं। इसके अतिरिक्त रहमान ये भी नहीं बताते कि उदारवादी मुसलमानों की कशमीरघाटी में 60000 हिन्दूओं का कत्ल कर 500000 हिन्दूओं पर बरबर अत्याचार कर उन्हें अपने घर से बेघर करने वाले आतंकवादियों के प्रति क्या प्रतिक्रिया होनी चाहिए।
रहमान कहता है कि उदारवादी मुसलमान, आतंकवादी मुसलिम संस्थाओं द्वारा हथियार उठाकर डा. सुब्रमण्यम स्वामी सहित सब हिन्दूओं पर हमला करने “take up arms and to let all hell loose (sic).” के उकसावे पर अमल करने के बजाए इस बात से सन्तुष्ट हैं कि राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने मुझे(डा. सुब्रमण्यम स्वामी) को नोटिस भेजा है। विचार करने के लिए रहमान का धन्यवाद।
लेकिन रहमान की उदारवादी मुसलमान की अवधारणा मात्र एक दिखावा है क्योंकि इसका एकमात्र मकसद इस्लामिक आतंकवादियों द्वारा किए जा रहे बरबर अत्याचारों से लोगों का ध्यान हटाना है। रहमान मुसलिमों को ऐसा कोई उपाए(कदम) नहीं बताते जो उन्हें मौन स्वीकृति त्याग कर हिन्दूओं पर अत्याचार कर रहे जिहादी आतंकवादियों के विरूद्ध उठाना चाहिए। मुझे “बराबर समय सिद्धांत" के अनुसार ये कहने का पूरा अधिकार है कि इस्लामिक आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए मेरे द्वारा लिखे गए खुले पृष्ठ में मैंनें सही तथ्य दिए थे। मेरे कहने का अर्थ है कि आतंकवाद इस्लाम की कत्लोगारद की परम्परा को ही आगे बढ़ा रहा है खासकर जिहाद को।
आतंकवाद हिंसा का वो हथियार है जो अपने राजनीतिक व वैचारिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए संवैधानिक तरीके से चुनी गई सरकार और लोगों को भयभीत करने के लिए आम जनता को निशाना बनाता है।
संयुक्त राष्ट्र सुराक्षा परिषद ने 2004 में “अपराधिक कृत्य” से सबन्धित संकल्प संख्या 1566 में आतंकवाद को इस तरह परिभाषित किया है। आम जनता या लोगों के समूह में या विशेष व्यक्तियों , एक जनसंख्या समूह को दवाव में लाने या एक सरकार को वाध्य करने या अन्तरराष्ट्रीय संस्था को किसी काम को करने या न करने के लिए वाध्य करना।
इसलिए प्रत्येक सरकार का ये कर्तव्य है कि वह सामूहिक या अपने स्तर पर आतंकवादविरोधी ऐसे कड़े कदम उठाए जिससे कि भविष्य में होने वाले हमलों को रोका जा सके । सरकार का ये भी कर्तव्य है कि वो आतंकवादी गतिविधियों को अन्जाम देने वाले लोगों के विरूद्ध मुकद्दमा चलाकर सजा दें। इसके साथ ही आतंकवाद का मुकाबला करना मनावाधिकारों की रक्षा करने और बढ़ावा देने के लिए भी बड़ा खतरा पैदा करता है। इसलिए प्रत्येक देश से ये आहवान किया जाता है कि वे आतंकवाद का खात्मा और मानवाधिकारों की रक्षा करें।इन दोनों के बीच में रैखिक सबन्ध होने के बजाए अरैखिक सबन्ध है। अर्थात ये सत्य नहीं है कि हम मानवाधिकारों का जितना कम बचाव करेंगे आतंकवाद का मुकाबला करने में उतना ही अधिक सफल होंगे। इसका विलोम ये भी सत्य नहीं है कि हम आतंकवाद को जितनी कड़ाई से कुचलेंगे मानवाधिकारों का उतना ही कम पालन होगा। इसलिए हमें एक ऐसी रणनीति बनाकर अमल करने की जरूरत है जिसके अनुसार मानवाधिकरों की रक्षा करने के साथ-साथ मानवता विरोधी आतंकवाद को भी नेस्तनाबूद करने के लिए किए जाने वाले रक्षा उपायों में अनुकूलतम संयोजन किया जा सके। कम होते हुए लाभ का नियम इस प्रक्रिया पर लागू होता है। हमें उपरलिखित प्रक्रिया पर अमल करने की जरूरत है। इसलिए हमने जो लिखा उसका मकसद एक बहस शुरू करना था ना कि हमारे लिखे का कोई दुरूपयोग कर दुष्प्रचार करे जैसा कि रहमान ने किया।
रणनीति
आज मौलिक प्रश्न ये है कि क्योंकि हम भारत में जिहादी आतंकवादी हमलों से दुनिया में सबसे अधिक पीड़ित हैं इसलिए इस्लामिक आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए रणनीति कैसे बनाई जाए?
आतंकवाद से लड़ने के लिए हमारी रणनीति ऐसी नहीं होनी चाहिए जो भविष्य में और अधिक मुसकिलें पैदा न करे। जैसा कि 1989 में रूबिया सईद अपहरण कांड व कंधार में आई-सी—814 विमान अपहरण कांड के दौरान हुआ। ततकालीन NF और राजग सरकारों द्वार आतंवादियों से सौदेवाजी करने के परिणामस्वारूप भारत में आतंकवाद ने और खतरनाक स्वारूप ले लिया। कन्धार में यात्रियों और जहाज के कर्मचारियों के वदले में मौलाना अजहर,उमर कुरैसी और जरगर जैसे दुर्दांत आतंकवादियों को छोड़े जाने के परिणामस्वारूप छुड़ाए गए लोगों से हजारों गुना ज्यादा निर्दोष लोग आज तक मारे जा चुके हैं। इन तीनों कुख्यात आतंकवादियों ने पाकिस्तान पहुंचने के बाद नायकों की तरह अपनी भारतविरोधी आतंकवादी हमलों को आगे बढ़ाया। इन हमलों में 26/11 का मुम्बई हमला भी सामिल है।
इसलिए हमें एक सपष्ट निती की जरूरत है मतलब एक उद्देश्यों को रेखांकित करने वाला सपष्ट घोषणा पत्र जिसमें कि इन उद्देश्यों की प्राथमिकताओं को सपष्टता से परिभाषित किया गया हो, इन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए अपनाई जाने वाली रणनीति का खुलासा हो और इन उद्देश्य की पूर्ति के लिए जरूरी आर्थिक,मानवीय और संरचनात्मक संसाधनों को जुटाने की प्रतिबद्धता हो।
हम भारतवासियों में से अधिकतर को इस्लामिक आतंकवाद से मुकाबले के लिए प्रतिरोधक रणनीति की जरूरत है। टैलीविजन चैनलों पर बैठकर धर्मनिर्पेक्ष परजिवी सच्चे इस्लाम को मानबीय और शांतिप्रिए बताकर लोगों को वरगलाने की कोशिश तो कर सकते हैं। परन्तु ये सपष्ट है कि इन धर्मनिर्पेक्ष परजिवीयों में से किसी ने भी ने कुरान,सुरा और हदीश का अधिकारिक अनुवाद नहीं पढ़ा है। इसलिए इस्लाम की सही ब्याख्या करने की बात करने के बजाए, जो लोग खुद को उदारवादी कहते हैं उन्हें इस्लाम के एक ऐसे नए सुधारे हुए स्वारूप की रचना करनी चाहिए जो लोकतान्त्रिक मूल्यों के साथ तालमेल बिठाने का आग्रह करता हो।
इस्लाम में पैगंबर के शब्द अंतिम है।कोई भी सच्चा मुसलमान समस्या की जड़ इन आयतों से अपने आपको अलग नहीं कर सकता और न ही सच्चा मुसलमान ये कह सकता है कि वो समस्या की जड़ कुरान की इन आयतों में सुधार कर इन्हें फिर से लिखेगा। क्योंकि ऐसा करने पर उसे जान बचाने के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ेंगी।
हम हिन्दूओं की स्वभाव से धार्मिक उदारवादी होने की सर्विदित मान्यता प्राप्त परम्परा है। जब भारत 100% हिन्दू राष्ट्र था तब भी हिन्दूओं ने दुनिया के विभिन्न भागों में प्रताड़ित पारसियों,यहूदियों,सिरियाईयों,इसाईयों और ऐहसान फरामोस अरब के मुसलमानों को न केवल शरण दी बल्कि उनका पालन पोषण भी किया। आज ऐहसान फरामोस इस्लामिक आतंकवादियों द्वारा निशाना बनाए जा रहे हिन्दूओं को अपनी रक्षा के लिए एकजुट होकर खड़े होना होगा।
आज 21वीं शताब्दी में हिन्दूओं के लिए संगठित होकर खड़ा होने का क्या मतलब है? अपनी रक्षा के लिए खड़े होने से मेरा मतलब है कि प्रभावशाली प्रतिशोधात्मक कार्यवाही कर देश की रक्षा करने के मुद्दे पर सब हिन्दूओं में पूरी मानसिक स्पष्टता होनी चाहिए।
इस संगठित प्रतिशोधात्मक कार्यवाही में अन्य धार्मिक समूहों का तर्कपूर्ण सहयोग, भारतीय संस्कृति को आगे बढ़ाने में लेना भी, इस प्रतिशोधात्मक कार्यवाही का हिस्सा है। इसलिए मैंनें इस बात की वकालत की कि मुसलमानों को, इस सच्चाई जो कि वैज्ञानिक डीएनए आनुवंशिक अध्ययन द्वारा सिद्ध हो चुकी है ,को स्वीकार कर लेना चाहिए कि हम सबके पूर्वज एक हैं और महान हिन्दू संस्कृति हम सब की सांझी विरासत है।
(डा. सुब्रमनियम स्वामी जी जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2011

ये गांधीवाद नहीं आतंकवाद है---संदर्भ---इन्द्रवर्मा को लहुलूहान करने वाले गांधीवादियों की पिटाई कितनी उचित?


हम सर्वथा लड़ाई के विरूद्ध हैं खासकर अपने ही देशवासियों के बीच में
लेकिन खुद को गांधीवादी कहने वालों ने इस देश को इतना लहुलूहान कर दिया है कि अब तो इस लड़ाई का समर्थन करने का मन करता है।
1947 में इन गांधीवादियों ने गांधी की पीठ के पीछे छुप कर भारत के तीन-तीन विभाजन करवाकर करोंड़ों हिन्दूओं को अत्याचारी इस्लमिक आतंकवादियों के हाथों बेआवरू होकर तड़प-तड़प कर मरने को छोड़ दिया।
आज जब किसी भी गद्दार को किसी भारतविरोधी षडयन्त्र को अनजाम देना होता है तो वो गांधीवाद की लंगोटी का नकाब ओड़ लेता है।
अभी हाल ही में आपने देखा कि किस तरह 50000 से अधिक देशभक्तों पर इन गांधीवादियों ने लाठियां ,गोलियां चलवाकर शहीद राजवाला जी के प्राणों की आहुती ले ली। इनका बस चलता तो ये गांधीवादी रामलीला मैदान को स्वामी रामदेव जी सहित हजारों देशभक्तों का शमशानघाट बना देते। इनकी गांधीवादी हिंसक मानसिकता का प्रमाण तब भी मिला जब गांधीवादियों ने स्वामीराम देव जी को पत्थर बांध पानी में तब तक डुवोए रखने की बात की जब तक उनके अन्दर प्राण शेष हैं मतलब स्वामी राम देव जी का कत्ल करने की मनसा रखते हैं ये गांधीवादी।
हमें समझ नहीं आ रहा कि ये कैसा गांधीवाद है जो हर वक्त भारतविरोधी आतंकवादियों के हाथों आम देशभक्त निर्दोष जनता का खून बहता देखकर खुश होता है और इन कातिल आतंकवादियों को हर तरह की सजा से बचाने के लिए आए दिन नए-नए बहाने बनाता है तिकड़म लड़ाता।
ये कौन सा गांधीवाद है जो भारत को विभाजित करवाकर विभाजन की विषबेल को फिर से भारत में रखने की मांग उठाकर आज इस विषबेल के पूरे भारत में फैल जाने के बाद भारतीयों का खून बहता देखकर इठलाता है ।
ये कौन सा गांधीवाद है जो भारत के तीन-तीन विभाजन करवाकर पाकिस्तान और बंगलादेश में हर चीज पर पहला अधिकार मुसलिम आतंकवादियों को देकर भारत में भी पहला अधिकार मुसलिम आतंकवादियों को ही देने की मांग उठाता ।
ये कौन सा गांधीवाद है जो भारत को 1000 वर्ष तक गुलाम बनाकर उनका शोषण करने वाले मुसलमानों और ईसाईयों के बच्चों को पाठशाला में प्रवेश करते ही हजारों रूपए की सहायता की देता है और हिन्दूओं के बच्चों द्वारा 80% अंक लेने के बावजूद उन्हें इस तरह की किसी सहायता की गारंटी नहीं देता।
हैरानी तो इस बात की है कि जिन ईसाईयों का आज भी भारत के शिक्षा ढांचे पर अंग्रेजों के साम्राज्यवाद के काल से चला आ रहा कब्जा है उन ईसाईयों को शोषित हिन्दू बच्चों से आगे बड़ाने की वकालत ये भारतविरोधी गांधीवाद करता है।
जिन मुसलमानों ने भारत पर अपने अत्याचारी कब्जे के दौरान हिन्दूओं से जिन्दा रहने के बदले में जजिया कर लिया जो आज भी वन्देमातरम् का विरोध कर खुद को गैर भारतीय बताने पर जोर देते हैं उन मुसलमानों के बच्चों को ये गांधीवाद इन मुसलमानों के अत्याचारी कब्जे के द्वारा प्रताड़ित और शोषित हिन्दूओं के बच्चों का हक छीन कर देने की वकालत ये गांधीवाद करता है।
गांधीवाद की वकालत करने वाले कितने गांधीवादी हैं ये तो आपने कल उस वक्त देख ही लिया होगा जब इन गांधीवादियों ने इन्द्र वर्मा जो कि प्रशांत भूषण की गद्दारी का विरोध कर रहा था को अपने कब्जे में लेकर किस तरह नोकीली चीजें चुभोकर लहुलूहान किया क्योंकि इनका गांधीवाद देशभक्तों का खून बहाकर आगे बढ़ता है।
उस युवक को देखो जो प्रशांत भूषण के भारतविरोधी कुकर्म से पूरी तरह आक्रोशित होने के बावजूद प्रशांत भूषण को कोई ऐसी चोट नहीं पहुंचाता जो उनको शारीरिक नुकसान करती ।
ऐसी ही हरकत इन गांदीवादियों की आपने तब भी देखी होगी जब स्वामी रामदेव जी को कांग्रेस द्वारा गाली-गलौच व अपमानित करने से आक्रोशित एक युवक ने कांग्रेसी प्रवक्ता को जूता सिर्फ दिखाया मारा नहीं वो इस प्रवक्ता(जनरदन द्विवेदी) के इतना नजदीक था कि अगर चाहता तो मार भी सकता था लेकिन बाद में गांधीवादी कांग्रेस के चापलूस गांधीवादी पत्रकारों और गांधीवादी दिगविजय सिंह ने उसे मार-मार कर लहुलूहान कर दिया।
ये कैसा गांधीवाद है जो भारत के सन्तों को ठग और दुनियाभर के कुख्यात इस्लामिक आतंकवादी ओसामविन लादेन को जी कहता है।
ये कैसा गाधीवाद है जो भारत के आम लोगों का धन लूट कर विदेशी बैंकों में जमाकरवाकर भारत को कमजोर करने की जड़ बन जाता है। विरोध करने वालों पर जुल्म ढाहता है
हे भगवान ये कैसा गांधीवाद है जो अफजल जैसे दुर्दाँत आतंकवादी की फांसी को तो वर्षों तक रोकर समाप्त करने की वकालत करता है लेकिन निर्दोष साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को नजायज तरीके से कब्जे में रखकर प्रताडित करने में ही आनन्दित महसूस नहीं करता बल्कि उसे जबरदस्ती फांसी पर चढ़ाने के लिए सुरक्षाबलों पर दबाव बनाने का हर सम्भव प्रयास करता है।
ये कैसा गांधीवाद है जो एक विदेशी के सामने सिर्फ इसलिए नतमस्तक हो जाता है क्योंकि वो अपने नाम के पीछे गांधी लगा लेती है और फिर सारे भारत को उसके हबाले छोड़कर उसे तूटने की खुली छूट देने की वकालत करता है लेकिन अपने ही देश के आर एस एस और भारत स्वाभिमान जैसे देशभक्त संगठनों को कुचलने के लिए हर सम्भव प्रयास करता है।
आओ प्रण करें कि ये गांधीवाद जो भारत को समाप्त करने पर तुला है उस गांधीवाद को हम ही मिलकर समाप्त करने का बीड़ा उठायें ऐसे ही गांधीवादी तरके अपनाकर।
चलते-चलते
मिडीया दुष्प्रचार कर रहा है कि आज अन्ना समर्थकों पर हमला हुआ लेकिन सच्चाई यह है कि हमला अन्ना समर्थकों पर नहीं बल्कि पाकिस्तान समर्थकों पर हुआ है क्योंकि प्रशांत भूषण का विरोध इसलिए नहीं हो रहा कि वो अन्ना जी के साथ क्यों हैं बल्कि इसलिए हो रहा है क्योंकि वो गांधीवाद की लंगोटी ओड़कर भारत के एक और विभाजन की मांग का समर्थन कर रहे हैं जो कि अन्ना जी कभी नहीं कर सकते।
आज जिन लोंगों की पिटाई हुई वो लोग वहां पर भारतविरोधी प्रशांत भूषण के विरूद्ध हो रही नारेबाजी का विरोध कर रहे ते मतलब प्रशांत भूषण के कुकर्म का समर्थन।
हमारे विचार में जो भी भारत के अस्तित्व को खतरा बनने की कोशिश करता है उसके साथ जो भी बुरे से बुरा किया जा सकता है किया जाना चाहिए क्योंकि ये गांधीवाद नहीं भारतविरोध-हिन्दूविरोध-देशविरोध ही नहीं बल्कि मानवता का विरोधी आतंकवाद है…

बुधवार, 12 अक्टूबर 2011

कशमीर पर ISI की भाषा बोलने वाले प्रशांत भूषण की पिटाई को क्या गलत ठहराया जा सकता है?


अभी-अभी दिल्ली सर्वोचन्यायालय परिसर में स्थित प्रशांत भूषण के कमरे में ही उनकी पिटाई prasant.jpg1.jpg6किए जाने का

समाचार आया है। प्रशांत भूषण ने खुद बताया कि पिटाई करने वाले

नौजवान इस बात से नाराज थे कि प्रशांत भूषण ने कशमीर के मसले पर

ISI मतलब पाकिस्तान के रूख का समर्थन किया है।

इससे पहले भी कई बार प्रशांत भूषण इस्लामिक आतंकवादियों के रूख k9का अनुसरण करते हुए सुरक्षा बलों पर हमला बोल चुके हैं।
इतना ही नहीं प्रशांत भूषण अकसर माओवादी कातिलों के समर्थन में भी

खुलकर खड़े नजर आते हैं।

वेशक इस बात के लिए तो आप प्रशांत भूषण को पागलपन के हद तक

बहादुर कह सकते हैं कि भारत में रहकर भारत की ही जड़ों को खोदने वाले

कुकर्म करने के बावजूद खुद को अन्ना जी के भ्रष्टाचार मिटाओ अन्दोलन

से जोड़कर भारत का हितैशी सिद्ध करने का दुहसाहस करने का दम रखते हैं।
फिर भी हम कहेंगे कि अगर प्रशांत भूषण की पिटाई भारतविरोधी कुकर्मों

के लिए हुई है तो किसी भी तरह गलत नहीं ठहराया जा सकता चाहे पिटाई

किसी ने भी की हो लेकिन अगर पिटाई सरकार ने उनके भ्रष्टाचारविरोधी

अन्दोलन से जुड़ने के कारण करवाई है तो इस पिटाई की जितनी भी निन्दा की जाए कम है।

प्रशांत भूषण की पिटाई अगर देशभक्तों ने की है तो सबसे बड़ी चिन्ता का

विषय ये है कि जिन वकीलों पर देश में कानून के आधार पर न्याय करवाने

की जिम्मेदारी है उन्हीं वकीलों ने सिर्फ इसलिए कि पिटने वाला एक

वकील था जो अकसर भारत विरोधी आतंकवादियों की सहायता के लिए

तत्पर रहता है के बदले में प्रशांत के भारतविरोधी रबैए से दुखी युवक के

नाक-मुंह से खून तक निकाल दिया जब कि उन युबकों ने प्रशांत को एक

भी चोट ऐसी नहीं पहुंचाई जिससे कि उनके शरीर को गम्भीर नुकसान हो।

इस घटना के बाद हम दावे से कह सकते हैं कि वो युवक सिर्फ अपना

विरोध दर्ज करवाने के लिए ही आए थे लेकिन प्रशांत, जो कि देशभक्तों से

नफरत की हद तक शत्रुता रखता है ,ने खुद को अपने गढ़ में पाकर उन

युवकों के सामने अपने भारतविरोधी रूख को दोहराकर उनको लड़ाई करने

के लिए उकसाया।
परिणामस्वारूप गद्दारी वाले कुकर्मों की बजह से लोगों के अन्दर पनप रहे

क्रोध को शांत करने के लिए खुद को प्रताड़ित बताकर( जिस काम में

आतंकवादियों के ये मददगार विशेषज्ञता हासिल कर चुके हैं) एक तो लोगों

का क्रोध शांत किया जाए दूसरा भारतविरोधियों की आँखों में हीरो बनकर

और आगे बढ़ा जाए ताकि शायद कोई भारतविरोधी किसी ऐसे इनाम से

नवाज दें जो अकसर भारतविरोधियों को ही दिए जाते हैं
इसीलिए हम ये लेख लिख रहे थे

अन्ना जी सावधान कहीं आपकी टीम में मौजूद

आतंकवादियों के मददगार आपकी मेहनत पर पानी न फेर दें!

लेकिन पूरा होने से पहले ही ये घटना घट गई।

इसमे कोई सन्देह नहीं कि आज भ्रष्टाचार हम सबकी जिन्दगी में जहर

घोल रहा है। हम कांग्रेस द्वारा बिछाए गए चोरी और गद्दारी के जाल में उसी

तरह उलझ गए हैं जिस तरह कांग्रेस द्वारा बिछाए गए फूट चालो और राज

करो के जाल में उलझे हैं। इस सबसे हम बाहर निकलने के लिए छटपटा

रहे हैं। ऐसे में जो भी इस जाल से बाहर निकालने की आश जगाता है हम

उसे अपना मानने लगते हैं। लेकिन हमें ये ध्यान ऱखना होगा कि कहीं

भारतविरोधी कांग्रेस के जाल से बाहर निकलते-निकलते हम हमारे अपने

भारतीयों के कातिल इस्लामिक और माओवादी आतंकवादियों  के जाल में

न फंस जायें।
हम हर तरह से अन्ना जी द्वारा चलाए जा रहे भ्रष्टाचार मिटाओ अभियान

के पक्ष में हैं लेकिन जब तक टीम अन्ना से आतंकवादियों के मददगार

अग्निवेश की ही तरह प्रशान्तभूषण को हटा नहीं दिया जाता तब तक टीम

अन्ना पर आँख बन्द कर भरोसा नहीं किया जा सकता।

आप सोच रहे होंगे कि प्रशान्त ने देश से ऐसी कैन सी गद्दारी की है जो हम

प्रशान्त भूषण को सन्देह की निगाह से देख रहे हैं।

सबसे पहली बात ये कि प्रशान्त भूषण हमेशा उन लोगों के साथ रहे हैं जो

भारत माता की जय और वन्देमातरम् का विरोध करते हैं मतलब भारत

की अखण्डता के बरखलाफ हैं। ये पहली बार है कि भारत माता की जय

और वन्देमातरम् का उदघोष करने वाले लोगों के साथ प्रशान्त भूषण दिखे

बेशक फिर भी भारत माता की जय या वन्देमातरम का एक बार भी नारा

नहीं लगाया। अगर आपने ये उदघोष लगाते हुए कभी देखा हो तो हमें जरूर बताना।
हमें लगा कि अगर एक व्यक्ति हमेशा गद्दारों का साथ देने के बाद आज

देशभक्तों के साथ आने की कोशिश कर अपने पाप का प्रयश्चित कर कर रहा

है तो उस पर अंगुली नहीं उठानी चाहिए ।लेकिन जैसे ही अन्दोलन समाप्त

हुआ ये व्यक्ति फिर से जम्मू कशमीर में जाकर हमारे सुरक्षाबलों के विरूद्ध

जहर उगलने लग पड़ा।
ऐसा नहीं कि इसने ऐसा पहली बार किया है इससे पहले भी ,जब

इस्लामिक देशों द्वारा पाकिस्तान के माध्यम से फैंके गए टुकड़ों के बल पर

हमारे सैनिकों पर पत्थरवाजी को हथियार बनाकर हमला sopore 2करने वाले आतंकवादियों और सुरक्षबलों में से किसी एक का साथ देने का मौका आया था तो इसने इन आतंकवादियोंINDIA_KASHMIR_POLIC_135876e को निर्दोष कहकर आतंकवादियों के प्रति अपनी देशविरोधी मानसिकता का प्रमाण दे दिया था। (R-L) Prashant Bhushan, Yogendra Yadva, Sunil, president, Samajwadi Jan Parishad प्रशांत भूषण अपहरण जैसे संगीन मामलों के आरोपी इस्लामिक अपराधियों के समर्थन में।
prasant   alina sen प्रशान्त भूषण देश से गद्दारी के आरोप में जेल जा चुके माओवादी कातिलों के मददगारों का समर्थन करता हुआ।
prasant   arundhati roy प्रशांतभूषण कशमीर पर पाकिस्तान के रूख का समर्थन करने वाली आतंकवादियों की मददगार अपनी सहयोगी अरूंधती राय के साथ।
आगे देखो ये दोनों आतंकवादियों के मददगार अकसर एक दिखेंगे दोनों

आतंकवादियों से भारत को लहुलूहान करवाने के मुद्दे पर एक राय जो रखते हैं।
prasant   arundhati roy.jpg1prasant   arundhati roy.jpg1.jpg2
prasant in meeting in hydrabadप्रशांत भूषण भ्रष्टाचारविरोधी कार्यक्रम में पहुचने पर।


prasant.3jpgप्रशांत भूषण माओवादी कातिल विनायक सेन के समर्थन मेंprasant.4jpgप्रसांत भूषण सोराबुद्दीन,इशरत जहां जैसे इस्लामिक आतंकवादियों के समर्थन में।prasant 7 प्रशांत भूषण माओवादी सरगना लिंगा के समर्थन में।
मेरे भाई इतना ही होता तो गनीमत थी अब आप अगले चित्र में देखेंगे उस

गौतम नबलखा को जो जो अमेरिका में भारत को बदनाम कर बर्बाद करने

के काम में लगे ISI ऐजेंट गुलामनबी फई का मित्र ही नहीं बल्कि सहयोगी

भी है।मजेदार बात ये है कि इस गद्दार के साथ प्रशांत भूषण की खास सहयोगी अरूंधती राय भी हैg6    g1 अब आप सोचेंगे कि KAC क्या है ये भारतविरोधी गद्दारों के सहयोग से ISI ऐजेंट गुलामनबी फई द्वारा चलाई

गई वो संस्था है जिसका एक मात्र मकसद मिडीया(print &

Electronic) में अपने  ISI ऐजेंटों के सहयोग से देशभक्त संगठनों को

बदनाम कर इसलामिक आतंकवादियों के अनुकूल महौल बनाकर भारत को

लहूलुहान करना  है …
आप आप खुद सोच लो कि इन भारतविरोधियों की कुटाई कितनी सही या

कितनी गलत है या फिर आप खुद फैसला कर लो कि अगर इन गद्दारों में

से कोई आपके हथे चढ़ जाए तो उसके साथ क्या बर्ताब करना चाहिए?

पूरी सूची बहुत जल्द।

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2011

क्या पिछले 7 वर्षों के कुशासन से ये सिद्ध नहीं हो गया कि 2004 व 2009 में अडवाणी या भाजपा की नहीं वल्कि भारत की हार हुई थी?


आज देश में ऐसे गद्दारों की कमी नहीं जो ,इस्लामिक देशों से इस्लाम के

अधूरे काम को पूरा करने के लिए पाकिस्तान की ISI के माध्यम से मिल

रही खैरात व अमेरिका की खुफिया ऐजेंसियों CIA व FBI के माध्यय से

भारत में अंग्रोजों द्वारा सम्राज्यबाद में विकसित इसाईयत के ढांचे को सुदृढ़

करने के लिए मिल रहे टुकड़ों के बल पर हर उस देशभक्त को निशाना बना

रहे हैं जो भारत और भारतीय संस्कृति की बात करता हो ।

अडवाणी जी की यात्रा के शुरू होते ही ये गद्दार समाचार पत्रों व समाचार

चैनलों के माध्यमों का दुरूपयोग कर अडवाणी जी के साथ-साथ भारतीय

संस्कृति वोले तो हिन्दू संस्कृति को अपमानित करने के लिए तरह-तरह

का शब्द जाल बुनेंगे। ध्यान रहे हमें उन लोगों से कोई शिकायत नहीं जो

रचनात्मक अलोचना कर इस अन्दोलन को और ताकतवर बनाने का मार्ग

प्रशस्त करेंगे।

अडवाणी जी हमेशा ऐसे ही गद्दारों के निशाने पर हमेशा रहे हैं खासकर उस

वक्त तक जब तक कि उन्होंने जिन्ना जैसे आतंकवादी



advani
व एडवीज एंटोनिया अलवीना माइनो उर्फ सोनिया गांधी जैसी विषकन्या soniyaके वारे में कुछ नर्म शब्द कहकर ऐसे गद्दारों को

ये सन्देश नहीं दे दिया कि वो अब उन गद्दारों का उस तरह विरोध नहीं

करते जिस तरह का विरोध हिन्दुत्वनिष्ठ देशभक्त संगठन करते हैं।

कुलमिलाकर अडवाणी जी ने इस तरह के वयान देकर अपनी सारी

जिन्दगी समर्पित कर हिन्दुत्व को आगे बढ़ाने व भारत मां की सेवा करने

के लिए इन गद्दारों पर हमला कर जो प्रसिद्धि व विश्वसनियता हासिल की

थी उस पर पानी फेर दिया।

एक तरह से कहें तो अडवाणी जी ने हिन्दुत्व से अपना सीधा नता तोड़

लिया या यूं कहें कि हिन्दूओं ने अडवाणी जी द्वारा लगातार लगभग 4

दशकों तक समर्पण भाव से हिन्दूहित के लिए काम करने के बाबजूद

एकवार भी भाजपा को एकजूट होकर वोट न डालकर अडवाणी जी को

हिन्दूत्व से नाता तोड़ने के लिए मजबूर कर दिया।

अगर इन कुछ अपबादों को छोड़ दें तो अडवाणी जी के मुकाबले ठहरने

वाला देश में आज एक भी नेता नहीं है।

इमानदारी ये वो अडवाणी जी हैं जिन्नहोंने हबाला काण्ड में नाम उछाले

जाने के बाद संसद की सदस्यता तक त्याग दी। अडवाणी जी संसद में तब

तक नहीं गए जब तक कि उनपर लगे आरोप झूठे साबित नहीं हो गए।

आपको ये नहीं भूलना चाहिए कि अडवाणी जी के 4 दशकों से अधिक के

राजनीतिक जीवन में एकवार भी कोई भ्रष्टाचार का आरोप लगना तो दूर

किसी विरोधी द्वारा उनकी तरफ अंगुली उठाने तक नहीं उठाई गई आज

तक। जब उठाने की कोशिश भी हुई तो अडवाणी जी ने संसद के बाहर का

रास्ता अपनाकर उस षडयन्त्र को असफल कर दिया।
त्याग देश का हर वो नागरिक जो उस वक्त होश सम्भाल चुका था अच्छी

तरह जानता है कि अयोध्या में मर्यादापुर्षोतम भगवान श्री राम जी का

भव्य मन्दिर बनाने के लिए निकाली गई यात्रा के बाद अडवाणी जी देश की

राजनीति पर पूरी तरह छा चुके थे लेकि जब प्रधानमन्त्री बनने की बारी

आई तो उन्होंने सबसे पहले अटल जी का नाम आगे कर बढ़ों का सम्मान

करने की हिन्दूसंस्कृति की रीत को निभाते हुए ऐसे त्याग को अन्जाम

दिया जो 20 वीं शताब्दी के शुरू से चली आ रही विभाजनकारी राजनीति में

आज तक देखने को नहीं मिला।
भाईचारे की भावना विदेशियों के टुकड़ों पर पलने वाले गद्दार लाख

मना करें पर सच्चाई यही है कि इस्लामिक आतंकवादियों और लुटेरे

ईसाईयों की गुलामी के दौर में हुए बरबर अत्याचारों व अपमानों के

परिणामस्वारूप भारत की संसकृति के मूलाधार सर्वधर्मसम्भाव व हिन्दू

एकता के सिद्धांत को भुला चुका हिन्दू अडवाणी जी की यात्रा के बाद

एकवार फिर भारतीय संस्क़ति को सुदृढ़ करने के अपने मूल काम में लग

गया। वेशक आज अडवाणी जी हिन्दुत्व से अलग हो चुके हैं लेकिन ये बात

हिन्दूओं को कभी नहीं भूलनी चाहिए कि अगर आज हिन्दू राजनीतिक रूप

से विधर्मियों के हमलों का उचित प्रत्युतर देने की ओर आगे बढ़ रहा है तो

इसमें अडवाणी जी की भी अहम भूमिका रही है।

ये अडवाणी जी ही हैं जिन्होंने हिन्दूओं को समझाया कि विधर्मियों के

अत्याचारों के परिमामस्वारूप इस्लाम या इसाईयत अपना चुके कमजोर

भारतीयों के पूर्बज भी हिन्दू ही हैं इसलिए वो भी हिन्दू हैं हमे उनसे नफरत

करने के बजाए उन्हें अपने घर बापस लाकर विधर्मियों के षडयन्त्रों को

नाकाम करना है।
ये अडवाणी जी ही हैं जिन्होंने सवरी माता के जूठे वेर खाने वाले

मर्यादापुर्षोतम भगवान श्री जी के नाम को आगे बढ़ाकर छुआछूत करने

वाले मूर्ख हिन्दूओं को अपने वंचित भाईयों को गले लगाने के लिए प्रेरित

किया।
अगर आप अडवाणी जी द्वारा सृजित व संचित नए नेताओं की पंक्ति देखें तो

पांयेंगे कि उस पंक्ति में हर वर्ण-हर तपके-गांव व शाहर हर जगह के नेता हैं।
अडवाणी जी ने प्रेम-भाईचारे का सन्देश शब्दों के बजाए अपने कर्म से दिया।
परिवार के बजाए संगठन को महत्व एक तो आज देश में

अडवाणी जी के कद का एक तो कोई नेता है ही नहीं पर अगर कोई खुद को

अडवाणी जी के सामने खड़ा करना भी चाहे तो नहीं कर सकता। अडवाणी

जी अपने कद के देश में एकमात्र ऐसे नेता हैं जिन्होंने अपनी सारी जिन्दगी

में परिवार के बजाए संगठन को महत्व दिया।

आज भी आप देख सकते हैं कि अडवाणी जी के परिवार का एक भी सदस्य

अडवाणी जी के कन्धे पर सवार होकर अपनी ही पार्टी के वाकी बरिष्ठ व

कर्मठ नेताओं को कुचल कर आगे बढ़ने का दुहसाहस नहीं कर रहा है न ही

आज तक किया है। जैसा कि प्राय वाकी सभी पार्टियों व भाजपा के भी कई

नेताओं के परिवारों द्वारा किया जा रहा है। सुना है कि गुलाम कांग्रेसियों को

परिवार तो परिवार पर नैहरू परिवार के पालतु जीव-जन्तुओं का भी मान

सम्मान करना पड़ता है।
देश की सर्वोचता अडवाणी जी के किसी भी कर्म के मूल में आप पायेंगे

कि उन्होंने हमेशा देश को सर्वोपरि माना है। यही बजह है कि आज चोरों

और गद्दारों की सरकार के देशविरोधी कुकर्मों और षडयन्त्रों को देखकर

आज देश में अगर कोई सबसे अधिक दुखी है तो वो अडवाणी जी हैं।

इसीलिए वो अपनी व लोगं पीड़ा सांझी करने के लिए रथयात्रा निकाल कर

आम लोगों के बीच जा रहे हैं।
जो सोचा-समझा वही कहा और जो कहा वही किया
हमारे विचार में अडवाणी जी की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि उन्होंने

आज तक अन्तरात्मा के विरूद्ध जाकर न कुछ कहा है न माना है न किया है।
आज तक अडवाणी जी ने अपने या संगठन के हित की खातिर देशहित के

विरूद्ध कुछ नहीं किया।

आज वेशक वो हमें देशभक्त हिन्दुत्वनिष्ठ संगठनों से दूरी बनाते हुए प्रतीत

हों पर हमें विश्वास रखना चाहिए कि अडवाणी जी हिन्दुत्वविरोधी-

देशविरोधी लोगों के साथ सम्पर्क बनाकर उन्हें हिन्दुत्व के पाले में लेकर

आयेंगे न कि खुद उनकी हिन्दूविरोधी–देशविरोधी मानसिकता का सिकार

हो जायेंगे।
जरा सोचो इतने महान ,त्यागशील प्रखर देशभक्त की जगह एक विदेशी एडवीज एंटोनिया अलवीना माइनो उर्फ सोनिया गांधी के गुलाम मनमोहन सिंह को प्रधानमन्त्री बनाकर देश ने क्या खोया और क्या पाया?
2004-2009 में अडवाणी नहीं देश हारा

हम अच्छी तरह जानते और समझते हैं कि देश के हारने की बात कहना वो

भी सिर्फ एक व्यक्ति को उपर उठाने किए किसी अपराध से कम नहीं।

लेकिन अगर आप इस चोरों और गद्दारों से भरी पड़ी हिन्दूविरोधी-

देशविरोधी सरकार के भारतविरोधी कुकर्मों पर बिस्तार ने नजर दौड़ायेंगे

तो पायेंगे कि वाकई 2004 में इस विदेशी एडवीज एंटोनिया अलवीना

माइनो उर्फ सोनिया गांधी की गुलाम सरकार का सता में आना भाजपा या

अडवाणी की हार नहीं बल्कि देश की हार है।

किसी भी सरकार द्वारा थोड़ी बहुत गलतियां करना चाहे वो किसी भी क्षेत्र से

जुड़ी हों स्वाभाविक है लेकिन जब सरकार देश की ही जड़ खोदने में लग

जाए तो आप उसे गलतियां नहीं देशविरोधी षडयन्त्र कहेंगे।
· कोर्ट में रामसेतु से जुड़े मामले में मर्यादापुर्षोतम भगवान श्री राम के अस्तित्व को नकारना।
· 2004 में सता में आते ही पोटा समाप्त कर न्या आतंकवाद विरोधी कानून

न बनाकर आतंकवादियों को भारतीयों के कत्लयाम की खुली छूट देना।

· 2004 में सता में आते ही अर्धसैनिक बलों के जवानों के, आतंकवादियों से

लड़ते हुए शहीद हो जाने पर, उनके परिबार को मिलने वाली विशेष आर्थिक

सहायता को, आर्थिक तंगी का हबाला देकर बन्द करना व बाद में

सुरक्षाबलों के हाथों मारे जाने वाले आतंकवादियों के परिवारों को लाखों

रूपए की सहयता देना।
· सेना में हिन्दू-मुसलिम की गिनती करने के आदेश देकर सेना को सांप्रदायिक आधार पर विभाजित करने का षडयन्त्र।

· देश के संसाधनों का संप्रदायिक आधार पर विभाजन करने के

साथ-साथ बच्चों तक की छात्रवृतियों का सांप्रदायिक आधार पर विभाजन कर देना।
· इस्लमिक आतंकवादियों द्वारा किए गए हमलों के लिए देशजागरण के

काम में लगे साधु-सन्तों-साधवियों व देश की रक्षा मे लगे सैनिकों को

जेल में डालकर इस्लामिक आतंकवादियों को बचाने के लिए संसार में

भारतीय संस्कृति को बदनाम करने का षडयन्त्र।

· सन्तों को ठग व ओसामा विन लादेन जैसे इस्लामिक आतंकवादी को जी

कहकर मुसलमानों के बच्चों को आतंकवादी बनने के लिए व हिन्दूओं के

बच्चों का सन्त न बनने के लिए संकेत देना।
· सारे देश में वन्देमातरम् का गान करने का आदेश देकर मुठीभर

इस्लामिक आतंकवादियों के कहने पर आदेश को वापस लेकर मुसलमानों

के बच्चों को आतंकवादियों की बात मानने पर मजबूर करना व सारे

मुसलमानों को बन्देमातरम् का विरोधी प्रचारित कर देशभक्त मुसलमानों

का अपमान करना।
· महाराष्ट्र सहित सारे देश में अंडरबर्ड का मुकाबला करने वाले सार्प सूटरों

को जेलों में डालकर गुण्डो को आम जनता को धमकाकर लूटने व जनता

पर अत्याचार करने की खुलीछूट देना।
· सोराबुद्दीन,इशरत जहां जैसे आतंकवादियों को मार गिराने वाले जवानों

को जेलों मे डालकर आतंकवादियों को न मारनें के लिए जवानों पर

दबाबा बनाना व आम जनता पर आतंकवादी हमले करने के लिए खुली
छूट देना।
· आतंकवादियों को निर्दोष बताकर शहीद मोहन चन्द शर्मा के बलिदान का

अपमान कर आतंकवादियों का हौसला बढ़ाना व सुरक्षाबलों के जवानों का

हौसला तोड़ना।
· दिल्ली में भारत को तोड़ने की बात करने वाले गिलानी व अरूंधति राय को

खुली छूट देना ,कातिल माओवादी सेन को अपना सलाहकार बनाना व

देशभक्ति की बात करने वाले स्वामी रामदेव व उनके समर्थकों पर गोले

बरसाना।
· अफजल की फांसी को मानीय न्यायालय की फटकार और हमले में शहीद हुए परिवारों के विरोध के बाबजूद आज तक रोके रखना व

देशभक्त हिन्दूसंगठनों के कार्यकर्ताओं और समर्थकों को जेलों में डालना व फांसी पर लटकाने के ,षडयन्त्र रचना।
·
आदर्श,CWG,2G,3G,S-Band ,कशमीर में सेना की भूमि बेचने,

जैसे घोटालों के माध्यम से देश को लूटना और लूट का विरोध करने वालों

को जेल में डालना ,उनका अपमान करना ,उनके विरूद्ध जांच बैठैाकर

सरकारी ऐजेंसियों का दुरूपयोग करना।
· कालेधन को भारत बापस लाने के लिए अभियान चलाने वाले स्वामी

रामदेब व उनके समर्थकों को धमकाकर व प्रताड़ित कर गद्दारों द्वारा लुटे

गए धन को बापस लाने के लिए उठने वाली हर आबाज को कुचलने का

प्रयत्न करना।
· भ्रष्टाचार के विरूद्ध आबाज उठाने वाले अन्ना हजारे जी को

अपमानित करना ,उनको धोखा देना व जेल भेजकर लोगों को भ्रष्टाचार के विरूद्ध आबाज न उठाने के लिए धमकाना।

· इस्लामिक आतंकवादी मदनी को छुड़ाने के लिए कानून बनबाना व उसे इलाज के लिए मंहगे औषधालय में भर्ती करवाना और साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को जबर्दस्ती आतंकवादी कहकर जेल में डालना व जरूरी इलाज तक उपलब्ध न करवाना।
· एक विदेशी एडवीज एंटोनिया अलवीना माइनो उर्फ सोनिया गांधी की

गुलाम सरकार बनबाकर शहीद भगत सिह जैसे लाखों शहीदों द्वारा

विदेशियों से सता छीन कर भारतीयों के हाथ में देने के लिए किए गए

बलिदानों का अपमान कर उनकी आत्मा को लहुलुहान करना।
· शर्म-अलशेख में गुलाम प्रधान्मन्त्री ने अपनी मन्दबुद्धि का

परिचय देते हुए पाकिस्तान के साथ एक ऐसे घोषणा पत्र पर अपनी

सहमति दे दी जो पाकिस्तान में आतंकवाद के लिए भारत को दोषी
ठहराती है।
· इस्लामिक देशों के इसारे व आर्थिक बल पर वर्षों से लाखों

भारतीयों का खून बहाने वाले आतंकवादियों की सरणगाह व प्रशिक्षण

स्थल पाकिस्तान को आतंकवाद का पीड़ित बताकर पाकिस्तान को

भारतीयों का खून बहाना जारी रखने के लिए समर्थन देना।
· सरकार के मन्त्री द्वारा मुम्बई पर हुए भारत के इतिहास के

सबसे बड़े इस्लामिक आतंकवादी हमले को हिन्दूओं द्वारा किया गया

बताना क्योंकि हमले में मारे जाने वालों में वो व्यक्ति भी सामिल था जो

सरकारी दबाब में आकर मुसलिम आतंकवादियों द्वारा किए गए हमलों के

लिए हिन्दूओं को फंसा रहा था। बाद में सरकार चला रही कांग्रेस पार्टी के

महासचिब द्वारा आतंकवादियों के समर्थक द्वारा इस हमले के लिए RSS को

दोषी ठहराने वाली पुस्तक का विमोचन कर आतंकवादियों को खुला

समर्थन देना।
· आम लोगों को मरने के लिए मजबूर करने की हद तक अपने चहेतों को फायदा पहुंचाने के लिए मंहगाई को आसमान तक पहुंचा देना।

क्या आपने कभी सोचा कि जिनके घर से न तो सरकारी नौकर है न ही कोइ दुकानदार वो भला जिन्दगी कैसे जी रहे होंगे?
अब आप खुद सोच लो कि इस सबसे अडवाणी जी advani.jpg1को क्या निजी नुकसान हुआ ? कोई नहीं?

अगर नुकशान हुआ तो देश की आम देशभक्त जनता का जो चोरों और

गद्दारों के 7वर्ष के कुशासन के बाद आज न तो पेट भर खाना खा सकते

हैं ,न खुद को सुरक्षित महूसस कर सकते हैं और न हीं दुनिया के सामने

सिर उठाकर कह सकते हैं कि हम भारतीय हैं क्योंकि इस सरकार ने भारत

को भ्रष्टाचार,मंहगाई और आतंकवाद के लिए सारी दुनिया में बदनाम कर

दिया।
कुल मिलाकर ये हार भारत की है न कि किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति की नहीं।

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011

सुब्रमण्यम स्वामी जी द्वरा लिखित लेख ‘How to wipe out Islamic terror?’का हिन्दी अनुबाद---इस्लामिक आतंकवाद को कैसे नेस्तनाबूद किया जाए?



shubramanium Swamiजुलाई 13,2011 को मुसलिम आतंकवादियों द्वारा किए गए बम धमाकों के बाद हिन्दूओं को निर्णायक रूप से अपनी अन्तरात्मा को झकझोरने की जरूरत है। भारत का विनाश करने के लिए, मुसलिम आतंकवादियों द्वारा हिन्दूओं का हलाल तरीके से आए दिन खून बहाया जाना, हिन्दूओं द्वारा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
आतंकवाद गैर कानूनी तरीके से ताकत के दुरूपयोग का वो हथियार है, जिससे आम जनता को भयभीत कर, उसे आतंकवादियों की इच्छा के विपरीत काम करने से रोकने व आतंकवादियों की नजाजय मांगो को समर्थन देने के लिए मजबूर करने के लिए उपयोग किया जाता है
भारत में हर महीने लगभग 40 आतंकवादी हमले होते हैं।इसीलिए हाल ही में अमेरिका के ‘आतंकवाद विरोधी केन्द्र’ के प्रकाशन ‘A Chronology of International Terrorism ’ में बताया गया है कि आज तक जितने आतंकवादी हमले भारत पर हुए हैं उतने आतंकवादी हमले दुनिया के किसी भी देश ने नहीं झेले हैं।
वेशक प्रधानमन्त्री माओवादी हिंसा को देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बतायें लेकिन मेरा मानना है कि आज इस्लामिक आतंकवाद देश के लिए सबसे गम्भीर खतरा है।अगर बर्तमान गृहमन्त्री, प्रधानमन्त्री और UPA अध्यक्ष को आज हटा दिया जाए तो माओवादी हिंसा को एक महीन में उसी तरह समाप्त किया जा सकता है जिस तरह मैंने 1991 में बरिष्ठ मन्त्री के पद पर रहते हुए तमिलनाडु में LTTE व MGR ने 1980 में नक्सलवादियों को किया।मुसलिम आतंकवाद देश के लिए एक अलग तरह का खतरा है।
मुसलिम आतंकवाद हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्यों है? इसके वारे में 2012 के बाद किसी के मन में कोई शंका नहीं रहेगी। 2012 में तालिवान पाकिस्तान पर कब्जा कर लेंगे व अमेरिका अफगानिस्तान छोड़ कर भाग जाएगा। उसके बाद इस्लाम अपने अधूरे काम को पूरा करने के लिए हिन्दूत्व से सीधी लड़ाई लड़ेगा। अलकायदा का नया सरगना, जो कि ओसामाविन लादेन का उताधिकारी है पहले ही घोषणा कर चुका है कि मुसलिम आतंकवादियों का सबसे बड़ा लक्ष्य भारत है न कि अमेरिका।
कट्टरपंथी मुसलमान हिन्दूबहुल भारत को ‘इस्लामी विजय का एक अधूरा अध्याय’ मानते हैं। हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि दुनिया के वाकी सभी वो देश, जिन पर इस्लाम ने विजय प्राप्त की , इस्लामी आक्रमण के दो दशकों के भीतर 100% इस्लाम में परिवर्तित हो गए। भारत एक अपबाद है । 800 वर्षों के अत्याचारी  बरबर मुसलिम शासन के बाद भी अविभाजित भारत में 75% हिन्दू अबादी थी। कट्टरपंथी मुसलमानों को यही बात आज तक सता रही है कि मुसलमानों द्वारा किए गए वेहिसाब जुल्मों के बाबजूद वो मुसलिम आतंकवादी हिन्दूओं का मनोबल तोड़ने में क्यों सफल न हो पाए।
हर दंगे के बाद नियुक्त किए गए जांच आयोगों की रिपोर्टों के अधार पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 1947 से लेकर आज तक जितने भी हिन्दू-मुसलिम दंगे हुए हैं उन सबकी शुरूआत कट्टरपंथी मुसलमानों द्वारा ही की गई---यहां तक कि गुजरात दंगों की शुरूआत भी कट्टरपंथी मुसलमानों द्वारा गोधरा में 56 हिन्दू महिलाओं और बच्चों को जिन्दा जलाकर की गई।
आज की परिभाषा के अनुसार मुसलिम आतंकवादियों द्वारा किए गए ये सबके सब हमले आतंकवादी गतिविधियां हैं। वेशक भारत में मुसलमान अल्पसंख्यक हैं लेकिन फिर भी कट्टरपंथी हिंसक मुसलमान हिन्दूओं पर जानलेवा हमले करने का दुशसाहस करते हैं। भारत के अन्य मुसलमान इन हमलों को या तो मौन स्वीकृति देते हैं या फिर इनमें कूद पड़ते हैं या फिर हिन्दूओं के मारे जाने का तमाशा देखते हैं। भारत में अत्याचारी बाबर से लेकर कातिल औरंगजेब तक और औरंगजेब से लेकर आज तक हिन्दूओं का कत्लयाम ही मुसलमानों का ईतिहास है। हिन्दूओं पर मुसलिम आतंकवादियों द्वारा किए जाने हमलों के प्रति उदासीन रहने में ,भूतकाल में दारा सिकोह व वर्तमान में एम जे अकबर व सलमान हैदर जैसे लोग, जो मुसलिम आतंकवाद के विरूद्ध खुलकर वोलने से नहीं डरते हैं,अपबाद हैं
कट्टरपंथी मुसलमानों द्वारा किए जाने वाले हमलों के लिए हिन्दू ही दोशी हैं।
कट्टरपंथी मुसलमानों द्वारा हिन्दूओं को निशाना बनाए जाने के लिए मैं मुसलमानों के बजाए हिन्दूओं को ही दोष देता हूं। में इन हमलों का दोष उन हिन्दूओं को देता हूं जिन्होंने सनातन धर्म में बाताई गई आत्मा और पतमात्मा की अबधारणा को चरम पर ले जाते हुए खुद को अपने आप तक सीमित कर लिया। लाखों हिन्दू विना किसी सरकारी सहयोग के अपने आप को व्यबस्थित कर कुम्भ मेले में ईकट्ठे हो सकते हैं ,लेकिन मेले के बाद ये सब हिन्दू कशमीर,मऊ, मेल्विशरम और मलप्पुरम व अन्य विधर्मियों के बहुमत वाले इलाकों में हिन्दूमिटाओ-हिन्दूभगाओ अभियान के तहत मुसलमानों द्वारा निशाना बनाए जा रहे हिन्दूओं की पीड़ा से वेखबर,हमले के शिकार हिन्दूओं की सहायता के लिए विना कोई संगठित कदम उठाए घर की ओर लौट जाते हैं।
उधाहरण के लिए अगर आधे हिन्दू भी जाति ,भाषा व क्षेत्र के विभाजनों से उपर उठकर बोट करें तो एक सच्चे हिन्दू राजनीतिक दल को दो तिहाई बहुमत मिलेगा।
आज धर्मनिर्पेक्षतावादी ,उग्र हिन्दूओं द्वारा मुसलमानों व अन्य अल्पसंख्यकों पर किए गए छुट-पुट हमलों की बात करते हैं। लेकिन इन में से अधिकतर हमले कांग्रेस सरकारों द्वारा नियोजित रूप से करवाए गए, न कि संगठित हिन्दूओं द्वारा। जबकि ISI व पाकिस्तान की सेना द्वारा प्रयोजित व नियोजित हमलों को छोड़ दें तो मुसलमानों द्वारा किए गए अधिकतर हमले गैर राज्य उपद्रवियों द्वारा किए गए।
कट्टरपंथी मुसलमान हिन्दूओं को निरूत्साहित करने के लिए हिन्दूओं को निशाना बनाकर हमले करते हैं ताकि हिन्दू अपने उन अधिकारों को छोड़ दें जो कि उन्हें नहीं छोड़ने चाहिए। इन हमलों का मूल उद्देशय भारतीय संस्कृति को कमजोर कर अन्त में भारत को समाप्त करना है। ये 1000 वर्ष से लड़े जा रहे हिन्दूविरोधी-भारतविरोधी युद्ध का वो अधूरा उद्देश्य है जिसकी बात ओसामाविन लादेन अक्कसर करता है।असल में मुसलिम आतंकवाद वही हथियार है जिसका उपयोग सुहरावर्दी और जिन्ना द्वारा 1946 में हिन्दूओं को पाकिस्तान बनाने की मांग मानने को मजबूर करने के लिए वंगाल में किया गया। कांग्रेस पार्टी ने हिन्दूओं का प्रतिनिधि बनकर मुसलिम आतंकवाद के आगे घुटने टेकते हुए देश के भारत का 25% हिस्सा धर्मनिर्पेक्ष थाली में सजाकर मुसलिम आतंकवादी जिन्ना के हबाले कर दिया। अब ये मुसलमान वाकी बचे 75% हिस्से पर आतंकवाद को हथियार बनाकर कब्जा करना चाहते हैं।
हिन्दूविरोधी ताकतें

हम ये नहीं कहते कि इस्लाम को छोड़कर किसी और ने हिन्दूओं
को निसाना नहीं बनाया।आजादी के बाद के 6 दशकों में अंग्रेजो के
सम्राज्यबाद से प्रभावित इ वी रामास्वामी के नेतृत्व वाले,द्रविड़यन
अन्दोलन ने तर्कशीलता के नाम पर हिन्दू धर्म को तर्कहीन करार
देने की कोशिश की और हिन्दू धर्म का प्रचार करने वाले पुजारियों
को आतंकित कर हिन्दू धर्म का प्रचार करने से रोकने की कुचेष्ठा
की।

आंदोलन के संगठनात्मक हाथ, द्रविड़ कझगम (डी के) ने 50 वर्ष तक इसलिए राबण की पूजा की ताकि हिन्दूओं द्वारा भगवान राम की अराधना करने का उपहास उड़ाया जा सके व माता सीता के अपहरण को जायज ठहराकर हिन्दूओं को अपमानित किया जा सके। लेकिन जैसे ही द्रविड़ कझगम (DK) को ये पता चला कि रावण एक ब्राह्मण भगवान होने के साथ-साथ शिव का एक पवित्र भक्त भी था,तो इसने राबण की पूजा करनी बन्द कर दी।रामायण के अपमान की इस नीचता को छोड़ने के बाद DK ने अब उस भारत विरोधी LTTE का समर्थन करना शुरू कर दिया जिसने श्रीलंका में तमिल–हिन्दू नेताओं को मारने में विशेसज्ञता हासिल कर ली है। वेशक अब LTTE के नाश के बाद DK अनाथ हो गई है।
गृह-युद्ध की स्थिति
1960 के दशक में ईसाई मिशनरियों ने नागा लोगों को भारत के विरूद्ध भड़काया। जिसके परिणामस्वारूप अब नागा भी भारत से नागालैंड को अलग करवाकर भारत को और विभाजित करना चाहते हैं।
1980 के दशक में विदेश में प्रक्षिक्षण प्राप्त भारतविरोधी ईसाई आतंकवादियों ने मणिपुर में हिन्दूओं को निशाना बनाया। ईसाई आतंकवादियों द्वारा मणिपुर में रहने वाले लोगों को धमकी दी गई कि या तो भारत का विरोध करो या फिर मरने के लिए तैयार हो जाओ।
1986 से खासकर 1990 के दशक में कशमीर में इस्लामिक आतंकवादियों ने हिन्दूओं को निशाना बनाकर उनकी मां-बहन-वेटियों को अपनानित करने के साथ-साथ हिन्दूओं का बड़े पैमाने पर कत्लयाम कर उन्हें कशमीर घाटी छोड़ने को मजबूर किया।
अब बड़े स्तर पर इस बात को माना जाने लगा है कि मुसलिम आतंकवादी हिन्दूओं को निशाना बनाकर हमले कर रहे हैं व भारत के मुसलमान इन हमलों को मौन स्वीकृति दे रहे हैं। मुसलिम आतंकवादियों के विदेशी संरक्षक अब आतंकवादी हमलों को कुछ इस तरह का अन्जाम दे रहे हैं ताकि मुसलमानों को हिन्दूओं के विरूद्ध राष्ट्रीय स्तर पर लड़ाया जा सके जिससे भारत में सर्विया और वोसनिया की तरह गृह युद्ध छेड़ा जा सके ।
मुसलमानों को 'उदारवादियों' और 'चरमपंथियों में विभाजित नहीं किया जा सकता है क्योंकि जब भी चरमपंथी मुसलमानों के विरूद्ध कदम उठाए जाते हैं तब तथाकथित उदारवादी उनकी ढ़ाल बनकर खड़े हो जाते हैं। पाकिस्तान की असैन्य सरकार ने पतंगवाजी पर सिर्फ इसलिए प्रतिबन्ध लगा दिया क्योंकि तालिवान पतंगवाजी को हिन्दूओं का खेल मानते हैं। मलेशिया और कजाकिस्तान की उदारबादी सरकारें हिन्दू-मन्दिरों को गिरा रहीं हैं।
*सामूहिक प्रतिक्रिया *
इसलिए भारत में आतंकवाद से निपटने के लिए, भारतविरोधी इस्लामिक आतंकवाद के हाल के इतिहास से हमें सबसे पहला सबक ये सीखने की जरूरत है कि आतंकवाद के निशाने पर हिंदू हैं और भारत के मुसलमानों को धीमी प्रतिक्रियाशील प्रक्रिया के द्वारा आतंकवादी बनने के लिए क्रमादेशित किया जा रहा है ताकि वो हिन्दूओं के विरूद्ध आत्मघाती हमले करने पर अमादा हो जायें। हिंदू मानस को कमजोर करने और गृहयुद्ध का डर पैदा करने के लिए इन आतंकवादी हमलों को अन्जाम दिया जा रहा है।
और इसलिए क्योंकि आतंकवादियों के निशाने पर हिन्दू हैं, हिन्दूओं को हिन्दूओं के रूप में ही भारतविरोधी आतंकवादियों के विरूद्ध संगठित होकर जबाबी कार्यवाही करनी चाहिए ताकि कोई हिन्दू खुद को अलग थलग या लालचार महसूस न करे। हिन्दू को इसलिए आतंकवाद से मुंह नहीं फेर लेना चाहिए कि अभी तक उसके परिवार का कोई सदस्य इस आतंकवाद का सिकार नहीं हुआ है।
आज अगर एक हिन्दू सिर्फ इसलिए मारा जाता है क्योंकि वह हिन्दू ता तो यह सब हिन्दूओं की नैतिक मौत है। ये विराट हिन्दू का एक जरूरी और आबश्यक मानसिक रवैया है।( विराट हिन्दू की अबधारणा की अधिक जानकारी के लिए मेरी ‘Hindus Under Siege: The Way Out Haranand, 2006).’ देखें।
इसलिए हमें मुसलिम आतंकवाद का सामना करने के लिए हिन्दू के नाते सामूहिक मानसिकता की जरूरत है। इस जबाबी कार्यवाही में भारत के मुसलमान भी हमारे साथ आ सकते हैं अगर वो सच में हिन्दूओं के कत्लयाम के विरूद्ध हैं तो। मैं नहीं मानता कि भारतीय मुसलमान हिन्दूओं पर हो रहे अत्याचारों के विरूद्ध तब तक हमारे साथ आयेंगे जब तक वो इस सच्चाई को स्वीकार नहीं करते कि वेशक वो आज मुसलिम हैं लेकिन उनके पूर्वज भी हिन्दू ही हैं।
अपने पूर्वजों के वारे में इस सच्चाई को स्वीकार करना मुसलमानों के लिए आसान नहीं है क्योंकि मुसलिम मुल्हा इसका इसलिए विरोध करेंगे क्योंकि इस सच्चाई को स्वीकारने के बाद एक तो भारतीय मुसलमानों में इस्लाम से मिली आत्मघाती कट्टरता कमजोर हो जाएगी और दूसरा इस सच्चाई को जानने व स्वीकारने के बाद उनकी हिन्दू धर्म में घर बापसी की सम्भावनायें बढ़ जायेंगी। कहीं भारतीय मुसलमान इस सच्चाई को स्वीकार न कर लें इसीलिए मुसलमानों के धार्मिक नेता हर हाल में काफिर बोले तो हिन्दूओं के विरूद्ध हिंसा और नफरत का प्रचार प्रसार करते रहते हैं।(उधाहरण के लिए आप कुरान के अध्याय 8 की आयत 12 पढ़ सकते हैं।) इस्लामिक आतंकवादी संस्था सिमी(SIMI) पहले ही यह घोषणा कर चुकी है कि भारत दारूल हरब है और SIMI इसे दारूल इस्लाम बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। भारत का दारूल हरब होना, मुसलमानों को हिन्दूओं का कत्लयाम करने ,हिन्दूओं के मान सम्मान को ठेस पहुंचाने ,हिन्दूओं की मां-बहन-बेटियों की इज्जत आबरू के साथ खिलबाड़ करने के साथ साथ उन्हें हिन्दूओं के प्रति हर तरह के नैतिक बन्धनों से मुक्त करता है क्योंकि मुसलमानों को कुरान व हदीस में दारूल हरब को दारूल इस्लाम बनाने के लिए ये सब करने का आदेश दिया गया है।
बृहद हिन्दू समाज
परन्तु फिर भी अगर कोई मुसलमान इस बात को स्वीकार करता है कि उसके पूर्बज हिन्दू हैं तो हम उसे बृहद हिन्दू समाज बोले तो हिन्दूस्तान के अंग के रूप में स्वीकार कर सकते हैं।भारत अर्थात इंडिया अर्थात हिन्दुस्तान हिन्दूओं और अन्य जिनके पूर्बज हिन्दू हैं उन सबका देश है। यहां तक कि भारत में रहने वाले पारसियों और यहूदियों के पूर्बज भी हिन्दू ही थे। अन्य जो भारत से अपना खून का रिस्ता होने की बात को अस्वीकार करते हैं या फिर जिनका भारत से खून का रिस्ता है ही नहीं या फिर वो दिदेशी जो मात्र पंजीकरण की बजह से भारतीय नागरिक बने हैं वो भारत में रह तो सकते हैं लेकिन उन्हें बोट डालने का अधिकार नहीं दिया जा सकता (मतलब वो चुने हुए प्रतिनिधि नहीं हो सकते)।
इसलिए आतंकबाद का मुकाबला करने बालीनीतिपर अमल करने से पहले हर और प्रतेक हिन्दू का प्रतिबद्ध और बिराट हिन्दू बनना जरूरी है। किसी भी व्यक्ति को बिराट हिन्दू बनने के लिए एक हिन्दू मानसिकता रखना मतलब उसकी एक ऐसी मानसिकता होना जरूरी है जो व्यक्तिगत और राष्ट्रीय चरित्र के अन्तर को समझ सके।
बिराट हिन्दू होने के लिए किसी हिन्दू का पबित्र, इमानदार और पढ़ा-लिखा होना ही काफी नहीं है।ये सब व्यक्तिगत चरित्र के अंग हैं। राष्ट्रीय चरित्र वो मानसिकता है जो सक्रिय व पूरी ताकत से देश की पबित्रता और अखण्डता के लिए प्रतिबद्ध रहती है।उधाहरण के लिए मनमोहन सिंह(प्रधानमन्त्री) का व्यक्तिगत चरित्र तो ठीक दिखता है परन्तु अर्द्ध साक्षर सोनिया गांधी की एक रबर स्टैंप की तरह काम करते हुए हर राष्ट्रीय मुद्दे पर घुटने टेक देने की वजह से ये साबित हो चुका है कि उसका कोई राष्ट्रीय चरित्र नहीं है।
भारत में आतंकवाद से निपटने के लिए, भारतविरोधी इस्लामिक आतंकवाद के हाल के इतिहास से हमें दूसरा सबक ये सीखना चाहिए कि क्योंकि आतंकवादियों का उदेश्य हिन्दूओं का मनोबल तोड़ना और हिन्दू संस्कृति को समाप्त करने के लिए भारत के हिन्दू आधार को तबाह करना है इसलिए हमें आतंकवादियों के आगे न तो हथियार डालने चाहिए और न ही आतंकवादियों की किसी भी मांग को मानना चाहिए। आतंकवाद से लड़ने की किसी भी नीति का मूल आधार यही होना चाहिए कि हम आतंकवादियों की किसी भी मांग को किसी भी हालात में नहीं मानेंगे।हमारे हाल के इतिहास में इसनीतिपर विलकुल भी अमल नहीं किया गया। जबसे हमने 1947 में मुसलिम आतंकवादियों के दबाब में पाकिस्तान बनाने की मांग को स्वीकार किया है तब से हम दबाब में बार-बार आतंकवादियों के आगे घुकने टेक देते हैं।
आतंकवादियों के सामने घुटने टेकने की घटनायें।
1989 में मुफ्ती मुहम्द सैयद की वेटी रूविया को आतंकवादियों से मुक्त करवाने के लिए वी पी सिंह सरकार द्वारा भारतीय जेलों से पांच आतंकवादियों को छोड़ दिया गया।
इस घटना ने अपराधियों को कशमीरी अलगाववादियों व उनके समर्थकों की आँखों में नायक बना दिया ।क्योंकि इन अपराधियों ने हिन्दूओं की सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर देने में सफलता हासिल की थी।रूविया को छुड़ाने के लिए आतंकवादियों के आगे घुटने टेकना जरूरी नहीं था।
भारत के आधुनिक इतिहास में आतंकवादियों के आगे घुटने टेकने की सबसे शर्मनाक घटना तब घटी जब 1999 में आतंकवादियों ने भारतीय विमान सेवा की उड़ान IC-814 को अगवा कर कन्धार पहुंचा दिया। सरकार ने न्यायालय से आज्ञा लिए विना ही तीन आतंकवादियों को छोड़ दिया। मानो देश को शर्मशार करने के लिए इतना ही काफी न हो आतंकवादियों को पाकिस्तान में धकेलने के बजाए, उनके साथ एक बिशेष अतिथी जैसा बर्ताव करते हुए प्रधानमन्त्री के विमान में विठाकर एक बरिष्ठ मन्त्री द्वारा कन्धार पहुंचाया गया।
ये तीनों आतंकवादी कन्धार में छोड़े जाने के बाद वापिस पाकिस्तान गए। पाकिस्तान जाकर इन तीनों आतंकवादियों ने हिन्दूओं को कत्ल करने के लिए तीन अलग-अलग आतंकवादी संगठन बनाए।मुहम्दहजर जिसे ततकालीन सुरक्षा सलाहकार ब्रजेस मिश्र ने मेमना बताया था ने छोड़े जाने के बाद लश्करे तैयावा की कमान सम्भाली ।लश्करे तैयवा वह गिरोह है जिसने श्रीनगर से लेकर बंगलौर तक हिन्दूओं को लहुलुहान करने के लिए बार-बार हमलों को अन्जाम दिया। अजहर ने मध्य 2000 से लेकर अब तक 2000 से अधिक हिन्दूओं का खून बहाया।यही अजहर दिसम्बर 13, 2001 में संसदभवन पर हुए हमले के लिए भी जिम्मेदार है। तीसरा आतंकवादी जरगर अल-मुझाहिदीन-जंगान की स्थापना करने के बाद आजकल डोडा और जम्मू में हिन्दूओं का खून बहा रहा है।
कन्धरा में की गई ये मुर्खता हमें के सबक देती है कि हमें कभी भी, किसी भी हालात में आतंकवादियों के आगे घुटने नहीं टेकने चाहिए। अगर आप आतंकवादियों के आगे घुटने टेकते हैं तो आप घुटने टेक कर बचाए गए हिन्दूओं से कहीं ज्यादा हिन्दूओं का कत्ल करवायेंगे। इसलिए आतंकवादियों से किसी भी तरह की सौदेबाजी पर लगाम लगाकर ,आतंकवादियों के सर्वनाश के लिए आगे बढ़ना चाहिए।
सच का सामना
भारत में आतंकवाद से निपटने के लिए, भारतविरोधी इस्लामिक आतंकवाद के हाल के इतिहास से हमें तीसरा सबक ये सीखना चाहिए कि आतंकवादी घटना कितनी भी छोटी या कम महत्व क्यों न हो देश को जबाबी कार्यवाही हर हाल में करनी चाहिए---आतंकवादी घटना के बराबर या फिर विनम्र कार्यवाही नहीं वल्कि आतंकवादियों और उनके समर्थकों को सबक सिखाने के लिए पूर्ण कार्यवाही।
उधाहरण के लिए अय़ोध्या पर किया गया आतंकवादी हमला वेशक बड़ा हमला नहीं था लेकिन हमें आतंकवादियों के हमले पर जबाबी कार्यवाही करते हुए अयोध्य में एक भव्य राम मन्दिर का पुनरनिर्माण करना चाहिए था।
ये कलियुग है इसलिए हिन्दू विरोधी आतंकवादियों व उनके समर्थकों के प्रति किसी भी सातविक प्रतिक्रिया के लिए कोई जगह नहीं है। हिन्दू धर्म में आपाकलीन धर्म का प्रावधान है जिसपर हमें आज के हालात में अमल करना चाहिए। ये हमारे लिए सच्चाई का सामना करने का वक्त है। एक सभ्यता के रूप में अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए या तो हमें हिन्दू के रूप में संगठित होकर हिंसक व अत्याचारी इस्लामिक आतंकवादी हमले का मुकावला करना चाहिए या फिर परसियन,वेवीलोनियन और मिश्र की सभ्यता की तरह नष्ट होने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। ये सभ्यतायें अत्याचारी इस्लामिक आतंकवादी हमले का संगठित होकर मुकावला करने में असमर्थ रहीं इसलिए इनका सर्वनाश हो गया। हमें शाम, दाम, दण्ड, भेद नियम का पालन करते हुए हर हाल में अत्याचारी इस्लामिक आतंकवाद का सर्वनाश सुनिश्चित करना चाहिए वरना ये राक्षश हमें समाप्त करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।
गरीबी आतंकवाद का कोई कारक नहीं
भारत में इस्लामिक आतंकवादियों को प्रेरणा कहां से मिलती है? बहुत से लोग हिन्दूओं को ये सलाह देते हैं कि मुसलिम आतंकवादियों पर जबाबी हमले करने के बजाए आतंकवाद के मूल कारण को खत्म करें। ये लोग मूल कारण भी बताते हैं।
निर्दोष हिन्दूओं का खून बहाने वाले आतंकवादियों के लिए हर तरह की सहानुभूति रखने वाले खूनी उदारवादी हमे बताते हैं कि आतंकवाद के पनपने व बढ़ने का कारण अनपढ़ता, गरीबी, शोषण और भेदभाव है। ये तथाकथित उदारबादी कुतर्क देते हैं कि इन आतंकवादियों का खात्मा करने पर जोर देने के बजाए आतंकवाद के इन चार कारणों को खत्म किया जाए। इन चार कारणों के समाप्त होते ही आतंकवाद खत्म हो जाएगा। इन प्रशनों का उतर देने से पहले ये समझ लेना बहुत जरूरी है कि मुझें नहीं लगता ये कातिल उदारवादी या खूनी बुद्धिजीवी भारत के प्रति बफादार हैं। ये हर व्यक्ति की भावनात्मक ताकत को खत्म कर उसे जिन्दा मुर्दा बना देना चाहते हैं। मतलब मजबूरी को ये हिन्दूओं की मानसिकता का अंग बना देना चाहते हैं। इस तरह की हीन भावना के साथ कोई भी देश य़ा समाज लम्बे समय तक जीवित नहीं रह सकता।
ये कहना बकवास है कि जो आतंकवादी आज तक हमले कर लाखों हिन्दूओं का खून बहा चुके हैं वो गरीब हैं।उधाहरण के लिए दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवादी ओसामा विन लादेन अरबपति है।खनिज तेल से वेहिसाब पैसा कमाने वाले अमीर देश मुसलिम आतंकवादियों को संरक्षण और आर्थिक मदद पहुंचाते हैं। ब्रिटेन में आतंकवादी हमलों को अन्जाम देने के दोषी सबके सब आतंकवादी साधन सम्पन मुसलमान हैं।
मुसलिम आतंकवादी अनपढ़ भी नहीं हैं। आतंकवादियों के अधिकतर सरगना डाकटर,चार्टड एकौंटैंट(CA),एम बी ए(MBA) और अध्यापक हैं। उधाहरण के लिए दिल्ली में धनतेरस के दिन सैंकड़ों हिन्दूओं का कतल करने वाला आतंकवादी रसायन विज्ञान में सनातकोतर है व टायम सुकेयर पर हमले का असफल प्रयास करने वाला आतंकवादी सहजाद MBA है वो भी अमेरिका के एक उच्चस्तरीय विश्वविद्यालय से।
उसका सबन्ध पाकिस्तान के एक अमीर परिबार से है। निश्चित तौर पर उसने अपने ही देश पाकिस्तान में किसी भी तरह का भेदभाव नहीं सहा।11 सित्मबर,2001 को जिन 9 लोगों के गिरोह ने चार हबाई जहाजों को अगवा कर World Trade Towers सहित अन्य जगहों को निशाना बनाया निश्चित तौर पर उनके साथ भी अमेरिका में किसी तरह का भेदभाव या शोषण नहीं हुआ था। इसलिए ये कहना कि आतंकवाद गरीब आतंकवादियों की देन है पूरी से मूर्खतापूर्ण है।
अगर हम बांमपंथी उदारवादी कुतर्क को मान भी लें तो क्या बामपंथी इस बात से सहमत हैं कि मुसलिम देशों में प्रताड़ित सबके सब गैर मुसलमानों को आतंकवादी बनकर मुसलमानों का कत्ल करना चाहिए। कशमीर घाटी जहां पर मुसलमान बहुमत में हैं वहां पर घारा 370 लगाकर बहुसंख्यक मुसलमानों को विशेषाधिकार दिए गए हैं व अल्पसंखयक हिन्दूओं का कत्लयाम किया गया ,हिन्दूओं की मां-बहन वेटियों के साथ बालातकार किए गए, अन्त में उन्हें वहां से जगा दिया गया।वो अपने ही देश में वेघर होकर दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं तो क्या ये उदारबादी उनके द्वारा मुसलमानों के विरूद्ध हथियार उठाने पर उनका बैसा ही साथ देंगे जैसा वो आज तक हिन्दूओं का कत्ल करने वाले मुसलिम आतंकवादियों का देते आए हैं?
यह कहना कि क्योंकि आतंकवादी मरने-मारने को तैयार हैं,वे अपना विवेक खो चुके हैं,उनका कोई घरबार नहीं है इसलिए उनका कत्ल नहीं किया जाना चाहिए। आतंकवादियों के सरगनाओं की इस आतंकवाद रूपी पागलपन में भी एक सोची समझी रणनीति और योजना है जिसके लिए उन्होंने निश्चित राजनीतिक उद्देश्य चुने हैं। इसलिए हमें आतंकवादियों को कुचलने के साथ-साथ एक ऐसी रणनीति पर अमल करना है जो आतंकवादियों के उद्देश्यों को पूरी तरह से विफल कर दे। ऐसी रणनीति कैसे बनाई जा सकती है। राबर्ट टरैगर और देशीसलाबा(Robert Trager and Dessislava Zagorcheva) ने शोध पत्र आतंकवाद का मुकाबला((‘Deterring Terrorism’ International Security, vol 30, No 3, Winter 2005/06, pp 87-123) में आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए रणनीति बनाने के लिए समान्य सिद्धांत बताए हैं।
सामरिक योजना
अगर मुसलिम समाज आतंकवादियों के इन उद्देश्यों को गैरइस्लामिक घोषित कर इनकी निंदा और विरोध नहीं करता है तो इन सिद्धांतों का उपयोग कर मैं इस्लामिक आतंकवादियों के राजनैतिक उदेश्यों को असफल करने के लिए निम्नलिखित सामरिकनीतिका समर्थन करता हूं।
षडयन्त्र-1 :-कशमीर पर भारत को आतंकित करना।
रणनीति-1:- धारा 370 समाप्त कर,भूतपूर्व सैनिकों को कशमीर घाटी में बसाना। कशमीरी हिन्दूओं के लिए पुनन कशमीर का निर्माण करना,बलूचियों और सिंधियों को आजादी के लिए सहायता देना।
षडयन्त्र-2:- हमारे मन्दिरों में बम धमाके कर भक्तों का कत्ल करना।
रणनिति-2:- जैसे को तैसानीति अपनाते हुए काशी विश्वानाथ मन्दिर परिसर सहित 300 अन्य जगहों से मसजिदों को हटाना।
षडयन्त्र :-3 भारत को दारूल इस्लाम बनाना ।
रणनिति-3:- भारत में एक समान नागरिक संहिता लागू करना,पढ़ाई के लिए संस्कृत को अनिवार्या बनाना,वन्देमातरम् का गान जरूरी करना और भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित कर सिर्फ उन्हीं गैर हिन्दूओं को बोट का अधिकार देना जो गर्व से ये स्वीकार करें कि उनके पूर्बज हिन्दू हैं। भारत का हिन्दूस्तान(हिन्दूओं और उन गैर हिन्दूओं का देश जिनके पूर्बज हिन्दू हैं) के रूप में पुन : नामकरण करना।
षडयन्त्र-4 अवैध आप्रवास, धर्मांतरण, और परिवार नियोजन को अपनाने से इनकार द्वारा भारत की जनसांख्यिकी बदलें.
रणनिति-4:- देश में एक ऐसा राष्ट्रीय नियम लागू करें जिसके अनुसार हिन्दू धर्म से किसी भी अन्य धर्म में धर्मांतरण करना बर्जित हो। किसी भी अन्य धर्म से हिन्दू धर्म में घर वापसी इसमें प्रतिबन्धित नहीं होनी चाहिए। गैर हिन्दूओं द्वारा अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी जाति में घर वापसी करने का स्वागत करें बशर्ते वे अनशासन का पालन करने को तैयार हों। भारत में रहने वाले अबैध वंगलादेशियों की शंख्या के अनुशार बंगलादेश की जमीन पर कब्जा कर लिया जाए। आज की संख्या के अनुसार सिलहट से खुलना तक के उतर का एक-तिहाई भारत को अबैध रूप से भारत में रह रहे बंगलादेशियों को बसाने के लिए अपने कब्जे में ले लेना चाहिए।
षडयन्त्र-5 हिन्दूओं के अन्दर आत्मगलानी का बोध पैदा करने व उन्हें आत्म समर्पण के लिए मजबूर करने के मकसद से मस्जिदों, मदरसों और चर्चों में अश्लील लेखन और उपदेश के माध्यम से हिंदू धर्म को बदनाम करना।
रणनिति-5:- हिन्दू मानसिकता के विकाश का प्रचार-प्रसार करें( मेरी नई पुस्तक ‘हिंदुत्व और राष्ट्रीय पुनर्जागरण’ Haranand, 2010 देखें।)
समाधान का समय
भारत इस तरह की रणनीति अपनाकर सिर्फ पांच बर्षो में अपनी आतंकवाद की समस्या का समाधान निकाल सकता है परन्तु इसके लिए हमें आतंकवाद द्वारा सिखाए गए उपरलिखित चार सबक हर समय याद रखने होंगे और राष्ट्र की रक्षा के लिए साहसिक,जोखिम भरे व कठोर कदम उठाने के लिए हिन्दू मानसिकता का निर्माण करना होगा।यदि यहूदियों को गैस चैंबरों में जलाए जाने के लिए मिमयाते हुए जाने वाले मेमनों से ज्वलंत शेर में सिर्फ 10 वर्ष में बदला जा सकता है तो हिन्दूओं के लिए तो उनसे कहीं वेहतर हालात (आज भी हम भारत का 83 प्रतिशत हैं) में ये काम सिर्फ पांच वर्ष में करना किसी भी तरह से मुशकिल नहीं है।
परम्पूजनीय गुरूगोविन्द सिंह जी द्वारा हमें पहले ही रास्ता दिखा दिया गया है कि किस तरह सिर्फ पांच निडर लोग आध्यात्मिक मार्गदर्शन में सारे समाज को बदल सकते हैं।यहां तक कि अगर आधे हिन्दू मतदाता भी संगठित होकर हिन्दू के रूप में, इमानदारी से हिंदू एजेंडा के लिए प्रतिबद्ध पार्टी को,बोट डालने के लिए प्रोतसाहित किए जा सकें तब भी हम परिवर्तन के लिए एक मजबूत आधार तैयार कर सकते हैं। और अंततः सच्चाई के इस क्षण में एक लोकतांत्रिक हिंदुस्तान में यही आतंकवाद से लड़ने की रणनीति में निम्नतम जरूरत है।