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मंगलवार, 2 सितंबर 2014

जानो , समझो और सांझा करो अपने प्रिय बाबा भीमराब अम्मबेडकर जी को

समरसता के प्रेरणास्त्रोत हमारे डा. भीमराव अम्बेडकर जी---1




19वीं शताब्दी में अनेक अवतारी महापुरूषों ने भारत की धरती पर जन्म लिया। 14 अप्रैल 1881 का दिन ऐतिहासिक दिन था। इस दिन डा. भीमराव अम्बेडकर जी का जन्म हुआ। वर्षप्रतिपदा 1889 को डा. हैडगेवार जी का जन्म हुआ । 1983 में डा. हेडगेवार जी के जन्मदिन वर्षप्रतिपदा पर समरसता शब्द डा. अम्बेडकर जी की ही देन है। परमपूजनीय गुरूगोविन्द सिंह ने क्रांति का सूत्रपात किया। “सिंह” शब्द नाम ने न्यूनता ग्रंथि से ग्रसित करोंड़ों के समाज को आन्दोलित , प्रेरित करने का यशस्वी प्रयत्न किया।


अवतारीमहापुरूषों का जीवन वाल्यकाल से ही संकटों में गुजरता है जिस प्रकार भगवान राम ,भगवान कृष्ण , स्वामी विवेकानन्द व गुरूगोविन्द सिंह जी का बाल्यकाल संकटों व संघर्षों में गुजरा---डा हेडगेवार जी का वाल्यकाल भी संकटों के दौर से ही गुजरा----डा. हेडगवार जी ने 13 वर्ष की आयु में ही अपने माता-पिता को एक ही चिता में मुखाग्नि देने के बाद सारा जीवन कष्टों व संघर्षों में बिताया।घर में चाय तक पीने के लिए पैसे उपलब्ध नहीं रहते थे।


उसी प्रकार डा. भीमराव अम्बेडकर जी का जीवन भी कष्टों व संघर्षों के लिए ही जाना जाता है। डा भीमराव अम्बेडकर जी ने भी न्यूनता ग्रंथि से ग्रसित करोंड़ों हिन्दूओं को एक नई राह दिखाई वो राह जो उनके अन्दर आत्मविश्वास व आशा का संचार करती थी।


डा. भीम राव जी के एक प्रिय गुरू जी का अन्तिम नाम अम्बेडकर था उन्हीं के नाम पर डा. भीमराव जी का नाम भीम राव अम्बेडकर हुआ। डा. भीमराव अम्बेडकर जी की माता जी का देहांत तो 5वर्ष की आयु में ही हो गया । फिर भी उन्हें अपने पिता जी से घर में ही अच्छे संस्कार मिले। मुम्बई में एक ही कमरे में दोनों रहते थे ।एक सोता था तो एक पढ़ता था इतना छोटा कमरा था वो। आगे चलकर इन्हें केअसकर नाम के व्यक्ति( सज्जन) मिले जिन्होंने इनका परिचय बड़ौदा के महाराजा सहजराव गायकवाड़ जी से करवाया ।गायकवाड़ जी ने इन्हें छात्रवृति लगा दी । गायकवाड़ जी ने अम्बेडकर जी को विदेश भेजा बाद में लन्दन गए। लन्दन में खरीदी पुस्तकें मालबाहक जहाज में भेजने के कारण डूब गईं जिनका मुआवजा 2000 रूपए मिला फिर बड़ौदा गए। Ph. D करने पर बड़ौदा आने के बाद अम्बेडकर जी को तरह तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा। जिससे उनके मन में पीड़ा तो हुई पर कभी उनके मन में कटुता पैदा नहीं हुई।


फिर उनके मन में LAW की पढ़ाई करने का विचार आया। कोहलापुर के महाराजा ने उन्हें लंदन भेजा। डा. अम्बेडकर जी ने संस्कृत सीखी ।स्पृश्य-अस्पृश्य क्या है जानने का प्रयत्न किया।वेद, उपनिषद् , भगवद गीता सबका डटकर अध्ययन किया --साहित्य लिखा। डा.अम्बेडकर जी अन्त में इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि छुआ-छूत मुगलकाल की देन है । हिन्दू धर्म में इसका कोई स्थान नहीं। आर्य-द्रविड़ भेद पैदा करना अंग्रेजों की हिन्दूओं को आपस में लड़वाने की चाल है ऐसा उन्होंने खुद महसूस किया व ये सब उन्होंने लोगों को समझाने का भी प्रयत्न किया। आर्य बाहर से नहीं आए ये डा. अम्बेडकर जी ने कहा।


WHO ARE SHUDRAS में अम्बेडकर जी ने कहा जिस हिन्दू धर्म का ज्ञान इतना श्रेष्ठ है कि उस ज्ञान के प्रभाव से चींटी, सांप, तुलसी मतलब छोटे से चोटे जीव से लेकर पेड़-पौधों तक की पूजा करने वाला हिन्दू, हिन्दू को न छुए ऐसा कैसे हो सकता है ?


उन्होंने सपष्ट कहा कि समस्या धर्म की नहीं समस्या मानसिकता की है खासकर स्वर्ण मानसिकता की जो गुलामी के प्रभाव के कारण विकृत हो चुकी है जिसे बदलने की जरूरत है । यदि स्वर्ण मानसिकता बदलेगी तो हिन्दू समाज बदलेगा ।



समरसता के प्रेरणास्त्रोत हमारे डा. भीमराव अम्बेडकर जी----2



WHO ARE SHUDRAS में अम्बेडकर जी ने कहा जिस हिन्दू धर्म का ज्ञान इतना श्रेष्ठ है कि उस ज्ञान के प्रभाव से चींटी, सांप, तुलसी मतलब छोटे से चोटे जीव से लेकर पेड़-पौधों तक की पूजा करने वाला हिन्दू, हिन्दू को न छुए ऐसा कैसे हो सकता है ?



उन्होंने सपष्ट कहा कि समस्या धर्म की नहीं समस्या मानसिकता की है खासकर स्वर्ण मानसिकता जो गुलामी के प्रभाव के कारण विकृत हो चुकी है जिसे बदलने की जरूरत है । यदि स्वर्ण मानसिकता बदलेगी तो हिन्दू समाज बदलेगा ।


उन्होंने सत्याग्रह का शस्त्र उठाया। भगवद गीता को हथियार बनाया।तालाब के पानी हेतु---महाड़ सत्यग्रह ।नासिक के कालराम मन्दिर में प्रवेश हेतु सत्याग्रह किया लाठियां खाईं।


1935 में रूढ़ीबादिता व भ्रम के शिकार लोगों को Shock TREATMENT देते हुए कहा सुधरना है तो सुधर जाओ वरना मैं धर्मांतरण कर लूंगा। जबकि वासत्विकता यह है कि उन्होंने कभी धर्मांतरण किया ही नहीं। उनके सारे सहित्य में हिन्दू राष्ट्र शब्द का प्रयोग बार-बार हुआ है उन्होंने जातिविहीन समाज रचना, राष्ट्र संगठन सब पर लिखा है।


1947 में मुसलिम अलगावबाद के परिणास्वारूप देश का विभाजन हो गया । जिस पर अम्बेडकर जी ने सपष्ट कहा कि अब जबकि मुसलमानों को अलग देश दे दिया गया है तो हमें पाकिस्तान से सब हिन्दूओं को भारत ले आना चाहिए व भारत से सब मुसलमानों को पाकिस्तान भेज देना चाहिए ताकि मुसलमान अपने घर पाकिस्तान में सुख से रहें और हिन्दू अपने घर भारत में सुख से रहें। आज चारों ओर फैले मुसलिम आतंकवाद को देखकर आप खुद समझ सकते हैं कि डा. अम्मवेडकर जी कितने दूरदर्शी थे।


विभाजन के बाद Hindu Code Bill अम्बेडकर जी की हिन्दू समाज को सबसे बढ़ी देन है । इसी में अम्बेडकर जी ने ‘हिन्दू किसे कहते हैं, इसकी व्याख्या की जिसमें सपष्ट कहा गया कि विदेशी धारणाओं इस्लाम और इसाईयत को छोड़कर भारत में रहने वाले (हिन्दू-सिख-बौद्ध-जैन----इत्यादि) सब लोग हिन्दू हैं।

समरसता के प्रेरणास्त्रोत हमारे डा. भीमराव अम्बेडकर जी--3
विभाजन के बाद Hindu Code Bill अम्बेडकर जी की हिन्दू समाज को सबसे बढ़ी देन है । इसी में अम्बेडकर जी ने ‘हिन्दू किसे कहते हैं, इसकी व्याख्या की जिसमें सपष्ट कहा गया कि विदेशी धारणाओं इस्लाम और इसाईयत को छोड़कर भारत में रहने वाले (हिन्दू-सिख-बौद्ध-जैन----इत्यादि) सब लोग हिन्दू हैं।



ये उन्हीं की दूरदर्शिता थी कि उन्होंने SC/St के नाम से वंचित हिन्दूओं के लिए अलग से आरक्षण की व्यवस्था बनाकर अंग्रेजों के बड़े पैमाने पर धर्मांतरण करने के षडयन्त्र को असफल किया।


अम्बेडकर जी ने सबको राजकीय समानता दिलवाते हुए सबके लिए एक ही वोट का प्रावधान किया। डा. भीमराव अम्बेडकर जी ने 1965 में कहा कि वेशक मेरा जन्म हिन्दू धर्म में हुआ है पर हिन्दू के रूप में मैं मरूंगा नहीं ।


अपनी जिन्दगी में जाति के कारण भी कई तरह के असहनीय कष्ट सहने के बाद भी उन्होंने हिन्दू हित के लिए काम करते हुए अन्त में बौद्ध मत अपनाया जो कि हिन्दू समाज का अपना ही मत है इसलिए उसे धर्मांतरण नहीं कहा जा सकता। उन्होंने किसी विदेशी अबधारणा को नहीं अपनाया। ये भी उनके मन में अपने देश-संस्कृति के प्रति अटूट प्रेम को दर्शाता है।


हैदराबाद के निजाम द्वारा 40 करोड़ ( आज आप अनुमान लगा सकते हैं कि कितना अधिक धन बनता है ये) व औरंगावाद में बंगला,जमीन का प्रलोभन देने के बाबजूद डा. भीम राव अम्बेडकर जी ने अत्याचारी इस्लाम स्वीकार नहीं किया ।


इसी तरह उन्हें ईसाईयों द्वारा ईसाईयत अपनाने के लिए भी कई तरह के प्रलोभन दिए गए लेकिन उन्होंने ईसाई बनना भी सवीकार नहीं किया।


वो अच्छी तरह जानते थे कि ये दोनों विदेशी अवधारणायें देशहित-हिन्दू हित में नहीं हैं ।


उन्होंने अपने वंचित हिन्दू भाईयों को सपष्ट आदेश दिया कि बेशक अपने हिन्दू भाईयों में कमियां हैं वो गुलामी के प्रभाव के कारण स्वर्ण मानसिकता के शिकार हैं पर अत्याचारी मुसलमान व लुटेरे ईसाई किसी भी हालात में हमारे हित में नही हो सकते ।


आज जिस तरह धरमांतरित हिन्दूओं को दलित व काले ईसाई कहकर पुकारा जा रहा है व धर्मांतरित हिन्दूओं को जिस तरह पाकिस्तान व बंगलादेश में मस्जिदों में बमविस्फोट कर मारा जा रहा है ,मुहाजिर कहा जा रहा है भारत में भी मुसलिम बहुल क्षेत्रों में निशाना बनाया जा रहा है उसे देख कर आप समझ सकते हैं कि डा. भीमराव अम्वेडकर जी कितने दूरदर्शी व देशहित-हिन्दूहित में कितने विस्तार से सोचने व निर्णय लेने में समर्थ थे।


दुनिया को धर्म सिखाना ही भारत की विभूतियों का काम है Deep Cultural Unity in our Society(India) में लिखते हैं कि आपस में झगड़ों के बाबजूद हिन्दू समाज एक है और एक रहेगा । मानसिकता में परिवर्तन के साथ ही ये झगड़े भी समाप्त हो जायेंगे।


1916 में लखनऊ पैक्ट में 13% मुसलमानों को 30% सीटें देने का उन्होंने कांग्रेस के हिन्दूविरोधी रूख के बाबजूद डटकर विरोध किया। उन्होंने कहा कि जो बात हिन्दू हित की नहीं वो देशहित की कैसे हो सकती है।आज हर देशभक्त को अपने घर में डा. भीमराव अम्बेडकर जी का चित्र लगाना चाहिए व उनके बताए मार्ग पर चलने का प्रयत्न करना चाहिए।

शनिवार, 18 मई 2013

ये शहीदों की जयहिन्द वोली


ये शहीदों की जयहिन्द वोली
 ऐसी वैसी ये वोली नहीं है
 इनके माथे पे खून का टीका देखो-देखो ये रोली नहीं है।।।
 सर कटाऊँ हिन्दू क्राँतिकारीयों को लेकर,
चल पड़े वे कशमीर से आगे हम हैं संतान राणा शिवा की,
 कायरों की ये टोली नहीं है।।।
 चल दिया जब जवाँ हँसते-हँसते ,
 भारत माँ की ममता तड़़प के वोली,
 आओ सो जाओ लाल मेरी गोद में ,
अब तेरे पास गोली नहीं है।।। 
अब बिदा जाने वाले शहीदों खून की सुर्ख पगड़ी पहनकर,
 खून की आज बौछार देखी, आज रंगों की होली नहीं है।।।
 हिन्दूओं को आंख दिखलाने वाले ,भस्म हो जायेंगे सारे दुश्मन,
 सेकुलर गद्दारो खैर मनाओ के हिन्दूओं ने अब तक खून के बदले खून की वोली वोली नहीं है।।।

गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

Wiki Leaks ने 26/11 मुम्बई हमले के बाद कांग्रेस के हिन्दूविरोधी षडयन्त्र का पर्दाफास किया





हम सब जानते हैं कि 26/11 मुम्बई हमला अब तक भारत पर हुए आतंकवादी हमलों में से सबसे बड़ा हमला था। लेकिन हम में से बहुत कम लोग जानते होंगे कि इस हमले को कांग्रेस ने हिन्दूओं के विरूद्ध हथियार के रूप में प्रयोग करने की साजिस रची।


हमले के कुछ ही क्षण बाद कांग्रेस ने अपने धर्मनिर्पेक्ष गिरोह से जुड़े मिडीया के माध्यम से ये खबर फैलाना शुरू कर दी कि आतंकवादियों ने हाथों में कंगन पहने हुए हैं मतलब मुम्बई पर हमला करने वाले आतंकवादी मुसलमान नहीं हिन्दू हैं।


फिर कांग्रेस के सांप्रदायिक विभाग के मन्त्री अबदुल रहमान अंतुले ने ये कहकर सबको चौंका दिया कि मुसलिम आतंकवादी हेमंत करकरे को मारने नहीं आए थे मतलब अंतुले जानता था कि मुसलिम आतंकवादी किसको मारने आए थे?


गद्दारों की सरदार एंटोनिया का खसमखास गद्दार दिगविजय सिंह आज भी दाबा कर रहा है कि हेमंत करकरे को हिन्दूओं से खतरा था।मतलब जो हिन्दूविरोधी षडयन्त्र तब रचा गया था उसे सिरे चढ़ाने का अब तक प्रयत्न जारी है।


सोचने वला विषय यह है कि जब हर कोई ये जनता है कि हमला मुसलिम आतंकवादियों ने किया था तो फिर कांग्रेस क्यों हिन्दूओं का नाम इसमें घसीट कर पाकिस्तान व आतंकवादियों को फायदा पहूंचाने की कोशिस कर रही है।


कांग्रेस का मानना है कि भारत में पाकिस्तान व आतंकवाद समर्थक मुसलमानों की बहुत बड़ी संख्या है । कांग्रेस को लगता है कि वो हिन्दूओं पर हमला कर इन सब आतंकवादी मुसलमानों का बोट प्राप्त कर सकती है। रही बात हिन्दूओं की तो हिन्दू तो राजनितिक रूप से मूर्ख है ही उसकी चिन्ता करने की क्या जरूरत । ऐसा कांग्रेस का मानना है।


अगर आप सोच रहे हैं कि हम कोई आरोप लगा रहे हैं तो आप गलत हैं क्योंकि इस सच्चाई का परदाफास जुलियन असांजे की कढ़ी मेहनत के परिणामस्वारूप Wiki Leaks में हुआ है।


भारत में अमेरिका के राजदूत डेविड मलफोर्ड ने अपनी सराकर को बताया कि वो कांग्रेस द्वारा खेले गए इस हिन्दूविरोधी कार्ड को देखकर भौचंके रह गए। मलफोर्ड ने आगे लिखा है कि कांग्रेस बोट के लिए देश के लोगों को जाति-भाषा-क्षेत्र-सांप्रदाय के अधार पर लड़वाने के लिए किसी भी हद तक गिर सकती है।


हमने तो कांग्रेस सहित धर्मनिर्पेक्ष गिरोह की इन हरकतों को पहचानकर उसी वक्त आबाज उठानी शुरू कर दी थी।


बुधवार, 8 दिसंबर 2010

ये भारतविरोधी धर्मनिरपेक्ष आतंकवाद कब और कैसे रूकेगा?




सच कहें तो अब भारतविरोधी धर्मनिर्पेक्ष आतंकवाद पर लिखने या वोलने के बजाए सीधे हथियार उठाकर भारतविरोधी धर्मनिर्पेक्ष आतंकवादियों व उनके समर्थकों का सिर कलम करने को दिलो-दिमाग वेचैन होने लगा है। स्वासतिका की मौत ने हम सबके सामने एक यक्ष प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या भारत में अब दूध पीते बच्चों को भी जिन्दा रहने के लिए भारतविरोधी आतंकवादियों के रहमोकर्म की जरूरत आन पड़ी है?


वेशक आपको ये बात अतिस्योक्ति पूर्ण लगे पर यच्चाई यही है कि भारतविरोधी धर्मनिर्पेक्ष आतंकवादी लगातार दूध पीते बच्चों तक को निशाना बना रहे हैं। स्वासतिका इन भारतविरोधी धर्मनिर्पेक्ष आतंकवादियों की हिंसा का सिकार होने वाली पहली बच्ची नहीं इससे पहले भी ये भारतविरोधी धर्मनिर्पेक्ष आतंकवादी अनेकों बच्चों को अपनी हिंसा का सिकार बना चुके हैं।


अफसोस की बात तो ये है कि जिस सरकार की जिम्मेदारी अपने नागरिकों की रक्षा करना है वो खुद इन भारतविरोधी धर्मनिर्पेक्ष आतंकवादियों की सांझीदार बन चुकी है।


पिछले 6 वर्षों में इस धर्मनिरपेक्ष आतंकवादियों की UPA सरकार ने इन भारतविरोधी धर्मनिर्पेक्ष आतंकवादियों को लाभ पहूंचाने के लिए न केवल पोटा जैसे सख्त कानूनों को हटाया पर इससे भी आगे बढ़कर इन भारतविरोधी धर्मनिर्पेक्ष आतंकवादियों को इस UPA सरकार ने आर्थिक मदद करने के साथ-साथ सुरक्षावलों के विरूद्ध कार्यवाही कर इन आतंकवादियों का हौसला भी बढ़ाया। मानो आतंकवादियों की UPA सरकार का मन इन सब भारतविरोधी कदमों से न भरा हो इसलिए इस सरकार ने माननीय सर्वोच न्यायालय से सजा प्राप्त अफजल जैसे भारतविरोधी धर्मनिर्पेक्ष आतंकवादियों की सजा पर रोक लगाकर देश में रहने वाले भारत के शत्रुओं को भारत विरोधी धर्मनिर्पेक्ष आतंकवादी बनने के लिए प्रेरित किया।


आज (07/12/2010) वाराणशी में जो धमाके हुए इनका होना सुनियोजित था।आज भारतविरोधी धर्मनिर्पेक्ष आतंकवादियों की UPA सरकार भ्रष्टाचार की दल-दल में पूरी तरह फंस चुकी है। ऐसे में आतंकवादियों की इस सरकार का भारतविरोधी धर्मनिर्पेक्ष आतंकवादियों के सिवाय और कौन मददगार हो सकता है? आखिरकार अपने लाडले इन आतंकवादियों के लिए इस UPA सरकार ने क्या-क्या नहीं किया?


भारतविरोधी धर्मनिर्पेक्ष आतंकवाद का खात्म जरूरी ही नहीं वल्कि देशभक्तों के लिए मजबूरी बन गया है।


वेशक देश के नागरिकों की रक्षा के लिए देश में सेना व पुलिस है लेकि आज UPA सरकार ने आतंकवादियों के विरूद्ध कार्यवाही करने वाले सैनिकों व पुलिस के जवानों के विरूद्ध कार्यवाही कर ये सपष्ट कर दिया है कि भारतविरोधी धर्मनिर्पेक्ष आतंकवादियों की UPA सरकार किसी भी हालात में देश की सेना को देश के नागरिकों की रक्षा के लिए जरूरी कदम नहीं उठाने देगी।


अब अपनी रक्षा का जिम्मेदारी देश के नागरिकों के कन्धों पर आन पड़ी है। उन्हें सरकार से कोई उमीद करने के बजाए एकजुट होकर स्वांय हथियार उठाकर इन भारतविरोधी धर्मनिर्पेक्ष आतंकवादियों का खात्मा सुनिश्चित करना होगा।


कहने की जरूरत नहीं कि आज देश में दर्जनों क्रांतिकारी संगठन काम कर रहे हैं । हमें जरूरत है इन क्रांतिकारी संगठनों के साथ जुड़कर तन-मन-धन से इनके हाथ मजबूत कर इस लड़ाई को निर्णायक दौर में ले जाकर भारत को भारतविरोधी धर्मनिर्पेक्ष आतंकवादियों से मुक्त करवाने के लिए चल रहे अन्दोलन को तीब्र करने की। आओ मिलकर इस लड़ाई को निर्णायक युद्ध में बदल कर भारतविरोधी आतंकवादियों के विनाश के लिए एकजुट होकर तीब्रता से काम करें।






रविवार, 28 नवंबर 2010

एडवीज एंटोनिया अलवीना माइनो उर्फ सोनिया गांधी एक परिचय




सोनिया गांधी का वास्तविक नाम एडवीज एंटोनिया अलवीना माइनो है। एडवीज एंटोनिया अलवीना माइनो का जन्म 9 दिसम्बर 1946 को इटली के कौंटरा मैनी नामक स्थान पर हुआ। कौंटरा मैनी इटली के बैनीटो क्षेत्र के बीसंजा से 30 कि.मी. की दूरी पर लुसियाना शहर के पास है। एडवीज एंटोनिया अलवीना माइनो के पिता का नाम मिस्टर सटीफैनो था । सटीफैनो फासीवादी सैनिक थे। इनकी माता का नाम पाओला माईनो था। एडवीज एंटोनिया अलवीना माइनो की परवरिश एक कैथोलिक परिवार में टुरिन नाम के कस्वे के पास औरवेशानो में हुई। एडवीज एंटोनिया अलवीना माइनो की पढ़ाई-लिखाई कैथोलिक स्कूल में हुई।


आगे हम खुद न लिखकर मेल से प्राप्त जानकारी आप तक पहुंचा रहे हैं आशा है कि ये जानकारी आपको भी इस विदेशी के कुछ रहसयों से अबगत करवाएगी।


सोनिया गाँधी भारत की प्रधानमंत्री बनने के योग्य हैं या नहीं, इस प्रश्न का "धर्मनिरपेक्षता", या "हिन्दू राष्ट्रवाद" या "भारत की बहुलवादी संस्कृति" से कोई लेना-देना नहीं है। इसका पूरी तरह से नाता इस बात से है कि उनका जन्म इटली में हुआ, लेकिन यही एक बात नहीं है, सबसे पहली बात तो यह कि देश के सबसे महत्वपूर्ण पद पर आसीन कराने के लिये कैसे उन पर भरोसा किया जाये। सन १९९८ में एक रैली में उन्होंने कहा था कि "अपनी आखिरी साँस तक मैं भारतीय हूँ", बहुत ही उच्च विचार है, लेकिन तथ्यों के आधार पर यह बेहद खोखला ठहरता है। अब चूँकि वे देश के एक खास परिवार से हैं और प्रधानमंत्री पद के लिये बेहद आतुर हैं (जी हाँ) तब वे एक सामाजिक व्यक्तित्व बन जाती हैं और उनके बारे में जानने का हक सभी को है (१४ मई २००४ तक वे प्रधानमंत्री बनने के लिये जी-तोड़ कोशिश करती रहीं, यहाँ तक कि एक बार तो पूर्ण समर्थन ना होने के बावजूद वे दावा पेश करने चल पडी़ थीं, लेकिन १४ मई २००४ को राष्ट्रपति कलाम साहब द्वारा कुछ "असुविधाजनक" प्रश्न पूछ लिये जाने के बाद यकायक १७ मई आते-आते उनमे वैराग्य भावना जागृत हो गई और वे खामख्वाह "त्याग" और "बलिदान" (?) की प्रतिमूर्ति बना दी गईं - कलाम साहब को दूसरा कार्यकाल न मिलने के पीछे यह एक बडी़ वजह है, ठीक वैसे ही जैसे सोनिया ने प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति इसलिये नहीं बनवाया, क्योंकि इंदिरा गाँधी की मृत्यु के बाद राजीव के प्रधानमंत्री बनने का उन्होंने विरोध किया था... और अब एक तरफ़ कठपुतली प्रधानमंत्री और जी-हुजूर राष्ट्रपति दूसरी तरफ़ होने के बाद अगले चुनावों के पश्चात सोनिया को प्रधानमंत्री बनने से कौन रोक सकता है?)बहरहाल... सोनिया गाँधी उर्फ़ माइनो भले ही आखिरी साँस तक भारतीय होने का दावा करती रहें, भारत की भोली-भाली (?) जनता को इन्दिरा स्टाइल में,सिर पर पल्ला ओढ़ कर "नामास्खार" आदि दो चार हिन्दी शब्द बोल लें, लेकिन यह सच्चाई है कि सन १९८४ तक उन्होंने इटली की नागरिकता और पासपोर्ट नहीं छोडा़ था (शायद कभी जरूरत पड़ जाये) । राजीव और सोनिया का विवाह हुआ था सन १९६८ में,भारत के नागरिकता कानूनों के मुताबिक (जो कानून भाजपा या कम्युनिस्टों ने नहीं बल्कि कांग्रेसियों ने ही सन १९५० में बनाये) सोनिया को पाँच वर्ष के भीतर भारत की नागरिकता ग्रहण कर लेना चाहिये था अर्थात सन १९७४ तक, लेकिन यह काम उन्होंने किया दस साल बाद...यह कोई नजरअंदाज कर दिये जाने वाली बात नहीं है। इन पन्द्रह वर्षों में दो मौके ऐसे आये जब सोनिया अपने आप को भारतीय(!)साबित कर सकती थीं। पहला मौका आया था सन १९७१ में जब पाकिस्तान से युद्ध हुआ (बांग्लादेश को तभी मुक्त करवाया गया था), उस वक्त आपातकालीन आदेशों के तहत इंडियन एयरलाइंस के सभी पायलटों की छुट्टियाँ रद्द कर दी गईं थीं, ताकि आवश्यकता पड़ने पर सेना को किसी भी तरह की रसद आदि पहुँचाई जा सके । सिर्फ़ एक पायलट को इससे छूट दी गई थी, जी हाँ राजीव गाँधी, जो उस वक्त भी एक पूर्णकालिक पायलट थे । जब सारे भारतीय पायलट अपनी मातृभूमि की सेवा में लगे थे तब सोनिया अपने पति और दोनों बच्चों के साथ इटली की सुरम्य वादियों में थीं, वे वहाँ से तभी लौटीं, जब जनरल नियाजी ने समर्पण के कागजों पर दस्तखत कर दिये। दूसरा मौका आया सन १९७७ में जब यह खबर आई कि इंदिरा गाँधी चुनाव हार गईं हैं और शायद जनता पार्टी सरकार उनको गिरफ़्तार करे और उन्हें परेशान करे। "माईनो" मैडम ने तत्काल अपना सामान बाँधा और अपने दोनों बच्चों सहित दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित इटालियन दूतावास में जा छिपीं। इंदिरा गाँधी, संजय गाँधी और एक और बहू मेनका के संयुक्त प्रयासों और मान-मनौव्वल के बाद वे घर वापस लौटीं। १९८४ में भी भारतीय नागरिकता ग्रहण करना उनकी मजबूरी इसलिये थी कि राजीव गाँधी के लिये यह बडी़ शर्म और असुविधा की स्थिति होती कि एक भारतीय प्रधानमंत्री की पत्नी इटली की नागरिक है ? भारत की नागरिकता लेने की दिनांक भारतीय जनता से बडी़ ही सफ़ाई से छिपाई गई। भारत का कानून अमेरिका, जर्मनी, फ़िनलैंड, थाईलैंड या सिंगापुर आदि देशों जैसा नहीं है जिसमें वहाँ पैदा हुआ व्यक्ति ही उच्च पदों पर बैठ सकता है। भारत के संविधान में यह प्रावधान इसलिये नहीं है कि इसे बनाने वाले "धर्मनिरपेक्ष नेताओं" ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि आजादी के साठ वर्ष के भीतर ही कोई विदेशी मूल का व्यक्ति प्रधानमंत्री पद का दावेदार बन जायेगा। लेकिन कलाम साहब ने आसानी से धोखा नहीं खाया और उनसे सवाल कर लिये (प्रतिभा ताई कितने सवाल कर पाती हैं यह देखना बाकी है)। संविधान के मुताबिक सोनिया प्रधानमंत्री पद की दावेदार बन सकती हैं, जैसे कि मैं या कोई और। लेकिन भारत के नागरिकता कानून के मुताबिक व्यक्ति तीन तरीकों से भारत का नागरिक हो सकता है, पहला जन्म से, दूसरा रजिस्ट्रेशन से, और तीसरा प्राकृतिक कारणों (भारतीय से विवाह के बाद पाँच वर्ष तक लगातार भारत में रहने पर) । इस प्रकार मैं और सोनिया गाँधी,दोनों भारतीय नागरिक हैं, लेकिन मैं जन्म से भारत का नागरिक हूँ और मुझसे यह कोई नहीं छीन सकता, जबकि सोनिया के मामले में उनका रजिस्ट्रेशन रद्द किया जा सकता है। वे भले ही लाख दावा करें कि वे भारतीय बहू हैं, लेकिन उनका नागरिकता रजिस्ट्रेशन भारत के नागरिकता कानून की धारा १० के तहत तीन उपधाराओं के कारण रद्द किया जा सकता है (अ) उन्होंने नागरिकता का रजिस्ट्रेशन धोखाधडी़ या कोई तथ्य छुपाकर हासिल किया हो, (ब) वह नागरिक भारत के संविधान के प्रति बेईमान हो, या (स) रजिस्टर्ड नागरिक युद्धकाल के दौरान दुश्मन देश के साथ किसी भी प्रकार के सम्पर्क में रहा हो । (इन मुद्दों पर डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी काफ़ी काम कर चुके हैं और अपनी पुस्तक में उन्होंने इसका उल्लेख भी किया है, जो आप पायेंगे इन अनुवादों के "तीसरे भाग" में)। राष्ट्रपति कलाम साहब के दिमाग में एक और बात निश्चित ही चल रही होगी, वह यह कि इटली के कानूनों के मुताबिक वहाँ का कोई भी नागरिक दोहरी नागरिकता रख सकता है, भारत के कानून में ऐसा नहीं है, और अब तक यह बात सार्वजनिक नहीं हुई है कि सोनिया ने अपना इटली वाला पासपोर्ट और नागरिकता कब छोडी़ ? ऐसे में वह भारत की प्रधानमंत्री बनने के साथ-साथ इटली की भी प्रधानमंत्री बनने की दावेदार हो सकती हैं। अन्त में एक और मुद्दा, अमेरिका के संविधान के अनुसार सर्वोच्च पद पर आसीन होने वाले व्यक्ति को अंग्रेजी आना चाहिये, अमेरिका के प्रति वफ़ादार हो तथा अमेरिकी संविधान और शासन व्यवस्था का जानकार हो। भारत का संविधान भी लगभग मिलता-जुलता ही है, लेकिन सोनिया किसी भी भारतीय भाषा में निपुण नहीं हैं (अंग्रेजी में भी), उनकी भारत के प्रति वफ़ादारी भी मात्र बाईस-तेईस साल पुरानी ही है, और उन्हें भारतीय संविधान और इतिहास की कितनी जानकारी है यह तो सभी जानते हैं। जब कोई नया प्रधानमंत्री बनता है तो भारत सरकार का पत्र सूचना ब्यूरो (पीआईबी) उनका बायो-डाटा और अन्य जानकारियाँ एक पैम्फ़लेट में जारी करता है। आज तक उस पैम्फ़लेट को किसी ने भी ध्यान से नहीं पढा़, क्योंकि जो भी प्रधानमंत्री बना उसके बारे में जनता, प्रेस और यहाँ तक कि छुटभैये नेता तक नख-शिख जानते हैं। यदि (भगवान न करे) सोनिया प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुईं तो पीआईबी के उस विस्तृत पैम्फ़लेट को पढ़ना बेहद दिलचस्प होगा। आखिर भारतीयों को यह जानना ही होगा कि सोनिया का जन्म दरअसल कहाँ हुआ? उनके माता-पिता का नाम क्या है और उनका इतिहास क्या है? वे किस स्कूल में पढीं? किस भाषा में वे अपने को सहज पाती हैं? उनका मनपसन्द खाना कौन सा है? हिन्दी फ़िल्मों का कौन सा गायक उन्हें अच्छा लगता है? किस भारतीय कवि की कवितायें उन्हें लुभाती हैं? क्या भारत के प्रधानमंत्री के बारे में इतना भी नहीं जानना चाहिये!






(प्रस्तुत लेख सुश्री कंचन गुप्ता द्वारा दिनांक २३ अप्रैल १९९९ को रेडिफ़.कॉम पर लिखा गया है, बेहद मामूली फ़ेरबदल और कुछ भाषाई जरूरतों के मुताबिक इसे  संकलित, संपादित और अनुवादित कर हमारे मित्र

महाजाल पर सुरेश चिपलूनकर (Suresh Chiplunkar)



जी  ने इसे लोगों को भेजा।  मित्रों जनजागरण का यह महाअभियान जारी रहे, अंग्रेजी में लिखा हुआ अधिकतर आम लोगों ने नहीं पढा़ होगा इसलिये सभी का यह कर्तव्य बनता है कि महाजाल पर स्थित यह सामग्री हिन्दी पाठकों को भी सुलभ हो, इसलिये इस लेख की लिंक को अपने इष्टमित्रों तक अवश्य पहुँचायें, क्योंकि हो सकता है कि कल को हम एक विदेशी द्वारा शासित होने को अभिशप्त हो जायें !














रविवार, 14 नवंबर 2010

अलकायदा के मददगारों को आप आतंकवादी नहीं तो और क्या कहेंगे?




आप देख रहे हैं कि किस तरह एडवीज एंटोनिया अलवीना माइनो की गुलाम UPA सरकार एक के वाद एक ऐसे कदम उठाती जा रही है जिनसे इस बात में कोई सन्देह नहीं रह जाता कि ये सरकार हिन्दूरोधी-देशविरोधी आतंकवादियों की सरकार है।


आप देख रहे हैं कि वर्षों से ये कांग्रेसी दाऊद इबरहाहीम जैसे मुसलिम आतंकवादियों की मदद कर न्हें कानून से बचा रही है ।


इतनी ही नहीं यही धर्मनिर्पेक्ष गिरोह कशमीरघाटी को भारत से अलग करने के लिए लगातार षडयन्त्र करने वाले वाले जिलानी,गिलानी व यासीन मलिक जैसे मुसलिम आतंकवादियों की भी मदद करता चला आ रहा है।


अब तो इस धर्मनिरपेक्ष गिरोह की UPA सरकार ने सारी हदें लांघते हुए अलकायदा जैसे आतंकवादी गिरोह की भी मदद करना शुरू कर दी ।



उम्मीद है कि इस समाचार को पढ़ने के बाद आप भी यही कहेंगे कि य़े सेकुलर गिरोह की UPA सरकार आतंकवादियों की सरकार है । इस सरकार के कर्ताधर्ता राजनितिज्ञ नहीं वल्कि कातिल आतंकवादी कहलाने लायक हैं। इन आतंकवादियों का समूलनाश भारत को बचाने के लिए जरूरी है।


शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

क्या आप जानते हैं कि बौद्धिक गुलाम क्यों धरना प्रदर्शन कर रहे हैं?


10-11-10 को आपने देखा कि किस तरह देशभक्तों की संस्था RSS ने शांति से अपनी बात लोगों तक पहूंचाने का प्रयत्न किया। विना किसी हिंसा,अगजनी या हमले के । आज आप देख रहे हैं कि किस तरह एक फासीवादी हिन्दूविरोधी-देशविरोधी इटालियन अंग्रेज एडवीज एंटोनिया अलवीना माइनो उर्फ सोनिया गांधी की गुलाम कांग्रेस हिंसा ,अगजनी व धमकियां देकर उस सच्चाई को छुपाना चाहते है जिस सच्चाई का हर देशभक्त भारतीय तक पहंचना बहुत जरूरी है। ये वो सच्चाई है जो भारत को इस भारतविरोधी से आजादी दिलवाने में सहायक सिद्ध होगी ।


इस सच्चाई के वारे में आज हम खुद लिखने बजाए आपको मेल से प्राप्त जानकारी दे रहे हैं इसे आप संयम व धैर्य से पढकर खुद सोचें कि क्या आप इस अंग्रेज को जानते भी हैं या नहीं?





"आप सोनिया गाँधी को कितना जानते हैं" की पहली कडी़, अंग्रेजी में इसके


मूल लेखक हैं एस.गुरुमूर्ति और यह लेख दिनांक १७ अप्रैल २००४ को "द न्यू


इंडियन एक्सप्रेस" में - अनमास्किंग सोनिया गाँधी- शीर्षक से प्रकाशित


हुआ था ।


। भारत की खुफ़िया एजेंसी "रॉ", जिसका गठन सन १९६८ में हुआ, ने विभिन्न


देशों की गुप्तचर एजेंसियों जैसे अमेरिका की सीआईए, रूस की केजीबी,


इसराईल की मोस्साद और फ़्रांस तथा जर्मनी में अपने पेशेगत संपर्क बढाये


और एक नेटवर्क खडा़ किया । इन खुफ़िया एजेंसियों के अपने-अपने सूत्र थे


और वे आतंकवाद, घुसपैठ और चीन के खतरे के बारे में सूचनायें आदान-प्रदान


करने में सक्षम थीं । लेकिन "रॉ" ने इटली की खुफ़िया एजेंसियों से इस


प्रकार का कोई सहयोग या गठजोड़ नहीं किया था, क्योंकि "रॉ" के वरिष्ठ


जासूसों का मानना था कि इटालियन खुफ़िया एजेंसियाँ भरोसे के काबिल नहीं


हैं और उनकी सूचनायें देने की क्षमता पर भी उन्हें संदेह था ।


सक्रिय राजनीति में राजीव गाँधी का प्रवेश हुआ १९८० में संजय की मौत के


बाद । "रॉ" की नियमित "ब्रीफ़िंग" में राजीव गाँधी भी भाग लेने लगे थे


("ब्रीफ़िंग" कहते हैं उस संक्षिप्त बैठक को जिसमें रॉ या सीबीआई या


पुलिस या कोई और सरकारी संस्था प्रधानमन्त्री या गृहमंत्री को अपनी


रिपोर्ट देती है), जबकि राजीव गाँधी सरकार में किसी पद पर नहीं थे, तब वे


सिर्फ़ काँग्रेस महासचिव थे । राजीव गाँधी चाहते थे कि अरुण नेहरू और


अरुण सिंह भी रॉ की इन बैठकों में शामिल हों । रॉ के कुछ वरिष्ठ


अधिकारियों ने दबी जुबान में इस बात का विरोध किया था चूँकि राजीव गाँधी


किसी अधिकृत पद पर नहीं थे, लेकिन इंदिरा गाँधी ने रॉ से उन्हें इसकी


अनुमति देने को कह दिया था, फ़िर भी रॉ ने इंदिरा जी को स्पष्ट कर दिया


था कि इन लोगों के नाम इस ब्रीफ़िंग के रिकॉर्ड में नहीं आएंगे । उन


बैठकों के दौरान राजीव गाँधी सतत रॉ पर दबाव डालते रहते कि वे इटालियन


खुफ़िया एजेंसियों से भी गठजोड़ करें, राजीव गाँधी ऐसा क्यों चाहते थे ?


या क्या वे इतने अनुभवी थे कि उन्हें इटालियन एजेंसियों के महत्व का पता


भी चल गया था ? ऐसा कुछ नहीं था, इसके पीछे एकमात्र कारण थी सोनिया गाँधी


। राजीव गाँधी ने सोनिया से सन १९६८ में विवाह किया था, और हालांकि रॉ


मानती थी कि इटली की एजेंसी से गठजोड़ सिवाय पैसे और समय की बर्बादी के


अलावा कुछ नहीं है, राजीव लगातार दबाव बनाये रहे । अन्ततः दस वर्षों से


भी अधिक समय के पश्चात रॉ ने इटली की खुफ़िया संस्था से गठजोड़ कर लिया ।


क्या आप जानते हैं कि रॉ और इटली के जासूसों की पहली आधिकारिक मीटिंग की


व्यवस्था किसने की ? जी हाँ, सोनिया गाँधी ने । सीधी सी बात यह है कि वह


इटली के जासूसों के निरन्तर सम्पर्क में थीं । एक मासूम गृहिणी, जो


राजनैतिक और प्रशासनिक मामलों से अलिप्त हो और उसके इटालियन खुफ़िया


एजेन्सियों के गहरे सम्बन्ध हों यह सोचने वाली बात है, वह भी तब जबकि


उन्होंने भारत की नागरिकता नहीं ली थी (वह उन्होंने बहुत बाद में ली) ।


प्रधानमंत्री के घर में रहते हुए, जबकि राजीव खुद सरकार में नहीं थे । हो


सकता है कि रॉ इसी कारण से इटली की खुफ़िया एजेंसी से गठजोड़ करने मे


कतरा रहा हो, क्योंकि ऐसे किसी भी सहयोग के बाद उन जासूसों की पहुँच


सिर्फ़ रॉ तक न रहकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक हो सकती थी ।


जब पंजाब में आतंकवाद चरम पर था तब सुरक्षा अधिकारियों ने इंदिरा गाँधी


को बुलेटप्रूफ़ कार में चलने की सलाह दी, इंदिरा गाँधी ने अम्बेसेडर


कारों को बुलेटप्रूफ़ बनवाने के लिये कहा, उस वक्त भारत में बुलेटप्रूफ़


कारें नहीं बनती थीं इसलिये एक जर्मन कम्पनी को कारों को बुलेटप्रूफ़


बनाने का ठेका दिया गया । जानना चाहते हैं उस ठेके का बिचौलिया कौन था,


वाल्टर विंसी, सोनिया गाँधी की बहन अनुष्का का पति ! रॉ को हमेशा यह शक


था कि उसे इसमें कमीशन मिला था, लेकिन कमीशन से भी गंभीर बात यह थी कि


इतना महत्वपूर्ण सुरक्षा सम्बन्धी कार्य उसके मार्फ़त दिया गया । इटली का


प्रभाव सोनिया दिल्ली तक लाने में कामयाब रही थीं, जबकि इंदिरा गाँधी


जीवित थीं । दो साल बाद १९८६ में ये वही वाल्टर विंसी महाशय थे जिन्हें


एसपीजी को इटालियन सुरक्षा एजेंसियों द्वारा प्रशिक्षण दिये जाने का ठेका


मिला, और आश्चर्य की बात यह कि इस सौदे के लिये उन्होंने नगद भुगतान की


मांग की और वह सरकारी तौर पर किया भी गया । यह नगद भुगतान पहले एक रॉ


अधिकारी के हाथों जिनेवा (स्विटजरलैण्ड) पहुँचाया गया लेकिन वाल्टर विंसी


ने जिनेवा में पैसा लेने से मना कर दिया और रॉ के अधिकारी से कहा कि वह


ये पैसा मिलान (इटली) में चाहता है, विंसी ने उस अधिकारी को कहा कि वह


स्विस और इटली के कस्टम से उन्हें आराम से निकलवा देगा और यह "कैश" चेक


नहीं किया जायेगा । रॉ के उस अधिकारी ने उसकी बात नहीं मानी और अंततः वह


भुगतान इटली में भारतीय दूतावास के जरिये किया गया । इस नगद भुगतान के


बारे में तत्कालीन कैबिनेट सचिव बी.जी.देशमुख ने अपनी हालिया किताब में


उल्लेख किया है, हालांकि वह तथाकथित ट्रेनिंग घोर असफ़ल रही और सारा पैसा


लगभग व्यर्थ चला गया । इटली के जो सुरक्षा अधिकारी भारतीय एसपीजी कमांडो


को प्रशिक्षण देने आये थे उनका रवैया जवानों के प्रति बेहद रूखा था, एक


जवान को तो उस दौरान थप्पड़ भी मारा गया । रॉ अधिकारियों ने यह बात राजीव


गाँधी को बताई और कहा कि इस व्यवहार से सुरक्षा बलों के मनोबल पर विपरीत


प्रभाव पड़ रहा है और उनकी खुद की सुरक्षा व्यवस्था भी ऐसे में खतरे में


पड़ सकती है, घबराये हुए राजीव ने तत्काल वह ट्रेनिंग रुकवा दी,लेकिन वह


ट्रेनिंग का ठेका लेने वाले विंसी को तब तक भुगतान किया जा चुका था ।


राजीव गाँधी की हत्या के बाद तो सोनिया गाँधी पूरी तरह से इटालियन और


पश्चिमी सुरक्षा अधिकारियों पर भरोसा करने लगीं, खासकर उस वक्त जब राहुल


और प्रियंका यूरोप घूमने जाते थे । सन १९८५ में जब राजीव सपरिवार फ़्रांस


गये थे तब रॉ का एक अधिकारी जो फ़्रेंच बोलना जानता था, उनके साथ भेजा


गया था, ताकि फ़्रेंच सुरक्षा अधिकारियों से तालमेल बनाया जा सके । लियोन


(फ़्रांस) में उस वक्त एसपीजी अधिकारियों में हड़कम्प मच गया जब पता चला


कि राहुल और प्रियंका गुम हो गये हैं । भारतीय सुरक्षा अधिकारियों को


विंसी ने बताया कि चिंता की कोई बात नहीं है, दोनों बच्चे जोस वाल्डेमारो


के साथ हैं जो कि सोनिया की एक और बहन नादिया के पति हैं । विंसी ने


उन्हें यह भी कहा कि वे वाल्डेमारो के साथ स्पेन चले जायेंगे जहाँ


स्पेनिश अधिकारी उनकी सुरक्षा संभाल लेंगे । भारतीय सुरक्षा अधिकारी यह


जानकर अचंभित रह गये कि न केवल स्पेनिश बल्कि इटालियन सुरक्षा अधिकारी


उनके स्पेन जाने के कार्यक्रम के बारे में जानते थे । जाहिर है कि एक तो


सोनिया गाँधी तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के अहसानों के तले दबना


नहीं चाहती थीं, और वे भारतीय सुरक्षा एजेंसियों पर विश्वास नहीं करती


थीं । इसका एक और सबूत इससे भी मिलता है कि एक बार सन १९८६ में जिनेवा


स्थित रॉ के अधिकारी को वहाँ के पुलिस कमिश्नर जैक कुन्जी़ ने बताया कि


जिनेवा से दो वीआईपी बच्चे इटली सुरक्षित पहुँच चुके हैं, खिसियाये हुए


रॉ अधिकारी को तो इस बारे में कुछ मालूम ही नहीं था । जिनेवा का पुलिस


कमिश्नर उस रॉ अधिकारी का मित्र था, लेकिन यह अलग से बताने की जरूरत नहीं


थी कि वे वीआईपी बच्चे कौन थे । वे कार से वाल्टर विंसी के साथ जिनेवा


आये थे और स्विस पुलिस तथा इटालियन अधिकारी निरन्तर सम्पर्क में थे जबकि


रॉ अधिकारी को सिरे से कोई सूचना ही नहीं थी, है ना हास्यास्पद लेकिन


चिंताजनक... उस स्विस पुलिस कमिश्नर ने ताना मारते हुए कहा कि "तुम्हारे


प्रधानमंत्री की पत्नी तुम पर विश्वास नहीं करती और उनके बच्चों की


सुरक्षा के लिये इटालियन एजेंसी से सहयोग करती है" । बुरी तरह से अपमानित


रॉ के अधिकारी ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों से इसकी शिकायत की, लेकिन कुछ


नहीं हुआ । अंतरराष्ट्रीय खुफ़िया एजेंसियों के गुट में तेजी से यह बात


फ़ैल गई थी कि सोनिया गाँधी भारतीय अधिकारियों, भारतीय सुरक्षा और भारतीय


दूतावासों पर बिलकुल भरोसा नहीं करती हैं, और यह निश्चित ही भारत की छवि


खराब करने वाली बात थी । राजीव की हत्या के बाद तो उनके विदेश प्रवास के


बारे में विदेशी सुरक्षा एजेंसियाँ, एसपीजी से अधिक सूचनायें पा जाती थी


और भारतीय पुलिस और रॉ उनका मुँह देखते रहते थे । (ओट्टावियो क्वात्रोची


के बार-बार मक्खन की तरह हाथ से फ़िसल जाने का कारण समझ में आया ?) उनके


निजी सचिव विंसेंट जॉर्ज सीधे पश्चिमी सुरक्षा अधिकारियों के सम्पर्क में


रहते थे, रॉ अधिकारियों ने इसकी शिकायत नरसिम्हा राव से की थी, लेकिन


जैसी की उनकी आदत (?) थी वे मौन साध कर बैठ गये ।


संक्षेप में तात्पर्य यह कि, जब एक गृहिणी होते हुए भी वे गंभीर सुरक्षा


मामलों में अपने परिवार वालों को ठेका दिलवा सकती हैं, राजीव गाँधी और


इंदिरा गाँधी के जीवित रहते रॉ को इटालियन जासूसों से सहयोग करने को कह


सकती हैं, सत्ता में ना रहते हुए भी भारतीय सुरक्षा अधिकारियों पर


अविश्वास दिखा सकती हैं, तो अब जबकि सारी सत्ता और ताकत उनके हाथों मे


है, वे क्या-क्या कर सकती हैं, बल्कि क्या नहीं कर सकती । हालांकि "मैं


भारत की बहू हूँ" और "मेरे खून की अंतिम बूँद भी भारत के काम आयेगी" आदि


वे यदा-कदा बोलती रहती हैं, लेकिन यह असली सोनिया नहीं है । समूचा


पश्चिमी जगत, जो कि जरूरी नहीं कि भारत का मित्र ही हो, उनके बारे में सब


कुछ जानता है, लेकिन हम भारतीय लोग सोनिया के बारे में कितना जानते हैं ?







गुरुवार, 4 नवंबर 2010

आओ दिपावली के शुभ अवसर पर हिन्दू एकता के लिए अथक प्रयास करने की कशम उठायें।

आज हिन्दू समाज के सामने कई चुनौतियां हैं । इन सब चुनौतियों का एकमात्र समाधान है हिन्दू एकता। हिन्दू एकता से हमारा अभिप्राय है कि सब हिन्दू उंच-नीच ,छुआ-छूत, अमीरी-गरीबी की सब दिवारों को तोड़कर सिर्फ ये याद रखें कि हम सब हिन्दू हैं हम सब एक हैं। बैसे भी अगर हिन्दू अपने पूर्वजों की ओर नजर दौड़ायें तो पायेंगे कि हम सब एक ही परमपिता परमातमा की सन्तान हैं। हम सबका खून एक है। वेशक मुसलिम आतंकवादियों व धर्मांतरण के ठेकेदार इसाईयों के षडयन्त्रो का सिकार होकर हम आपस में कुछ इस तरह उलझ गए कि हमने मूर्खता की हद तक पाखंड अपने सिर पर ओड़ कर इन आक्रमणकारियों के हिन्दूविरोधी-देशविरोधी षडयन्त्रों को सफल होने में सहायाता तक कर डाली। आज भी हमारे देश में एसे दुष्टों की कमी नहीं जो हिन्दूओं को विभाजित रखने के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं। इन सब विभाजनकारियों को हमारा एकमात्र जबाब हो सकता है पूर्ण समरसता को साकार कर हिन्दू एकता के मार्ग पर आगे को बढ़ना। हमें याद रखना चाहिए कि हिन्दूओं के अन्दर गुलामीकाल से पहले किसी भी तरह की छुआछूत नहीं थी अगर होती तो समाज में जो स्वारूप समाजिक कार्यक्रमों में देखने को हमें आज भी मिलता है वो कभी भी अस्तित्व में नहीं आ सकता था।
http://samrastamunch.blogspot.com/2009/01/blog-post_9926.html

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

क्या आप भी मानते हैं कि RSS कायरों का संगठन है ?

अयोध्या में हिन्दूमहासभा ने RSS पर कायरों का संगठन होने का आरोप लगाने के साथ-साथ यह भी कहा कि संघ आतंकवाद कैसे फैला सकता है ।

हमारा मानना है कि संघ के वारे में जो छवि हिन्दूविरोधी-देशविरोधी धर्मनिर्पेक्ष गिरोह द्वारा बनाई जाती है उससे प्रभावित होकर कई उग्र हिन्दू संघ में प्रवेश कर जाते हैं जब वो संघ के अन्दर काम करते हैं तो स्थिति विलकुल विपरीत मिलती है। इस स्थिति में कोई भी उग्र हिन्दू अपना आपा खो सकता है( लगता है कि ये आरोप ऐसे ही हिन्दू ने लगाया है) । क्योंकि संघ के वारे में मिडीया में सुनने से लगता है कि संघ क्रांतिकारी संगठन है लेकिन बास्तब में संघ का क्रांति से दूर-दूर तक कोई बास्ता नहीं ।संघ के संविधान की पहली पंक्ति में लिखा है कि संघ समाजिक और सांसकृतिक संगठन है जबकि दूसरी पंक्ति में लिखा है है कि संघ में हिसंक या देशविरोधी प्रवृति से ग्रर्सित व्यक्ति के लिए कोई जगह नहीं। बस ये जो हिंसक शब्द है यही सारी समस्या की जड़ है।

संघ में हमारा प्रवेश तब हुआ जब हम गणित में सनात्कोतर पढ़ाइ के दौरान हास्टल में बांमपंथी हिंसा के सिकार बने। इस बामपंथी हमले का सामना करने में संघ ने हमारा साथ दिया।

हमें लगा कि हिन्दूक्रांति के काम को आगे बढ़ाने के लिए संघ हमें सहायता प्रदान करेगा । लेकिन धीरे-धीरे हमें लगा कि मुसलिम आतंकवादियों की हिंसा की प्रतिक्रियास्वारूप हमारे मन में मुसलमानों के प्रति जो आग भरी थी वो शांत होने लगी। हमने धैर्य बनाए रखा लेकिन अपने हर सम्मभव प्रयत्न के बाबजूद हम संघ के अधिकारियों को अपनी प्रतिक्रियावादी हिंसा की निती के वारे में विश्वास में न ले सके ।

अन्त में हमने संघ के अधिकारियों के सामने सीधी बात ऱखी कि अगर कशमीरघाटी या किसी और मुसलिम बहुल क्षेत्र में या फिर मुसलिम आतंकवादी हमले में अगर 10 हिन्दू मारे जाते हैं तो हमें 20 मुसलमानों का कत्ल सुनिश्चित करना चाहिए। बस फिर क्या था संघ के एक अधिकारी ने हमें पूछा कि ये सब कब रूकेगा हमने कहा कि हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के बाद। फिर अधिकारी ने आगे प्रश्न किया कि क्या गारंटी है कि हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के बाद जिन को कत्ल की आदत पड़ जाएगी वो खुद को हिंसा से रोकने में समर्थ होंगे । इस बात को समझाने के लिए उन्होंने पाकिस्तान व अफगानीस्थान में रहने वाले मुसलमानों का उधाहरण दिया। उन्होंने हमें समझाने की कोशिश की कि किस तरह उन मुसलमानों ने हिन्दूओं के खत्म हो जाने के बाद मुसलमानों पर ही हमले शुरू किए जो आज तक जारी हैं। आगे हमें उस अधिकारी ने समझाने की कोशिश की, कि किस तरह ये मुसलिम भी अपने ही भाई हैं। इनका और हमारा खून एक है।

इस तरह हमें समझ आ गया कि RSS में हमारी दाल नहीं गलने वाली फिर कुछ समय के लिए हमने किसी को ये बात नहीं बताई लेकिन धीरे-धीरे हमें एहसास हुआ कि RSS ने अपने आप ही हमें बाहर का रास्ता दिखा दिया ।

हालांकि आपको हैरानी होगी कि किसी ने हमें संघ से बाहर निकले को नहीं कहा न ही इस बात की सूचना दी कि हमें संघ से बाहर कर दिया गया है। हमें जिला कार्यकारणी से निकालकर संघ की जिम्मेवारी से मुक्त कर दिया गया वो भी हमें विना यह ऐहसास करवाए कि अब हम संघ के सदस्य नहीं हैं।

इसके बाद हमने अन्य संगठनों से सम्पर्क करने की कोशिश की जो आज तक जारी है। ऐसा नहीं कि संघ के कार्यों पर हमारा विस्वास नहीं लेकिन हमें लगता है कि संघ की शांतिप्रिय निती आज के हालात में हिन्दूहित-देशहित की रक्षा नहीं कर सकती। आज जरूरत है ईंट का जबाब पत्तथर से देने की क्योंकि राक्षसों का मुकावला विना राक्षस बने नहीं किया जा सकता। वेशक संघ क्रांतिकारी संगठन नहीं फिर भी हम मानते हैं कि संघ कायरों का संगठन कभी नहीं कहला सकता।

धारा के विपरीत जिस तरह संघ राष्ट्रवाद के साथ चट्टान की तरह खड़ा है वो साहस गद्दारों के राज में कोई कायर नहीं दिखा सकता।वेशक संघ की रितीनिती से हम सहमत नहीं फिर भई हमें लगता है कि संघ कार्य भी अपने समाज के अन्दर जरूरी है।

हिन्दू महासभा को समझना चाहिए कि संघ पर हमला करने के बजाए उसे खुद आगे बढ़कर जेलों में बन्द 30 निर्दोष हिन्दूओं की रक्षा के लिए कदम उठाने चाहिए ताकि हमारे जैसे उग्र हिन्दू ,हिन्दूमहसभा के बैनर तले देशविरोधी हिन्दू विरोधी धर्मनिर्पेक्ष गिरोह के हंमलों का जबाब उसी की भाषा में उसे दे सकें।

शनिवार, 30 अक्टूबर 2010

चोरों और गद्दारों की UPA सरकार पर माननीय न्यायालय का दे दना-दन!


सत्यमेव जायते भारतीय संसकृति का आधार सतम्भ है। जिसका आभास माननीय न्यायालय के 29-10-2010 को आए फैसलों से होता है। सच कहें तो सराकरी तन्त्र के पिछले कुछ समय से चले आ रहे हिन्दूविरोधी-देशविरोधी रूख की बजह से अब शांति से न्याय मिलने की सम्भवना से ही देशभक्त हिन्दूओं का विशवास उठने लगा है। लेकिन गाहे–वगाहे माननीय न्यायालय हिन्दूओं के अन्दर एक उम्मीद जगाता रहा है। वही आशा की किरण पिछले कल आए फैसलों में भी देखने को मिली है। आओ इन फैसलों के बारे में जानें...


1) UPA सरकार ने 2G Spectrums (http://samrastamunch.blogspot.com/2010/05/2g-spectrums.html)आबंटन में 50,000 करोड़ रूपए से अधिक डकार लिए। जिसकी पिछले एक वर्ष से CBI जांच कर रही है लेकिन एक वर्ष में CBI ने सरकार व मन्त्री की जांच को आगे बढ़ाने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाए हैं ।माननीय न्यायलय ने इस पर CBI व सरकार को जमकर लताड़ लगाई। माननीय न्यायालय ने कहा कि जिस मन्त्री मतलब A Raja पर हजारों करोड़ रूपए डकारने का आरोप है वही मन्त्री आज तक अपने पद पर कैसे है। न्यायलय ने आगे कहा कि जब जिसकी जांच होनी है व जिस विभाग में जांच होनी है वही उसी भिभाग के मुखिया के पद पर बैठा हुआ हो तो निष्पक्ष जांच कैसे सम्भव है? ये टिपणी मनमोहन सिंह की चोरबजारी को उजागर करने के लिए काफी है। इस टिप्पणी से सिद्ध होता है कि मनमोहन सिंह जिसे कभी इमानदार माना जाता था आज प्रधानमन्त्री की डमी कुर्सी के लालच में इस हद तक गिर चुका है कि उसे किसी भी चोर-बजारी से कोई परहेज नहीं बसर्ते इस चोर बजारी से उसकी आका एंटोनिया उर्फ सोनिया को फायदा पहंचता हो व उसका अपना पद बरकरार रहता हो।


2) कर्नाटक में BJP की सरकार को गिराने के लिए एंटोनिया का गुलाम हंस राज भारद्वाज किस हद तक गिरा हुआ है उस पर भी माननीय न्यायलय ने फैसला दिया । फैसले में माननीय न्यायालय ने कर्नाटक विधानसभा स्पीकर के उस निर्णय को सही ठहराया जसमें CONGRESS व JDS के जाल में फंसकर BJP सरकार से समर्थन वापस लेने वाले विधायकों को अयोग्य करार दिया गया था।


हमें यहां यह जानना जरूरी है कि ये हंसराज भारद्वाज वही है जिसने कानून मन्त्री रहते एंटोनिया के इटालियन यार कवात्रोची(http://jagohondujago.blogspot.com/2009/04/blog-post_28.html) के लंदन में जब्त पैसे को निकलवाने व इस देश के शत्रु पर चल रहे वोफोर्स दलाली कांड सौदे से सबन्धित केशों को समाप्त करावने में सहायता की थी। मतलब कर्नाटक सराकर को गिराने की कोशिस इटालियन अंग्रेज कर रही है। एक बजह साफ है कि इस कर्नाटक सरकार ने पिछले दिनों मुसलिम आतंकवादियों की धर-पकड़ की थी।








3) जिन अमित शाह जी को आतंकवादी सोराबूद्दीन का नमोनिशान मिटाने से दुखी होकर CBI ने अपनी हिरासत में रखा था। जिसकी जमानत को CBI कोर्ट ने वार-वार असवीकार किया था उसी अमित शाह जी को माननीय उच्च न्यायलय ने जमानत देकर CBI व कांग्रेस की हिन्दूविरोधी-देशविरोधी निती का पर्दाफास कर दिया। कांग्रेस किस हद तक आतंकवादियों का हौसला बढ़ाने में जुटी है उसका सबसे बढ़ा प्रमाण है कि अगले ही दिन मतलब आज माननीय सर्वोचन्यायालय में अमित शाह जी की जमानत रद्द करने की अर्जी दे डाली जिसे मानीय सर्वोच न्यायलय ने असवीकार कर दिया।


यहां हमें ये याद रखना जरूरी है कि सोराबूद्दीन वही आतंकवादी है जिसके घर से 12AK47 व दर्जनों हैंडगर्नेड मिले थे। बैसे जो कांग्रेस अफजल जैसे आतंकवादी की फांसी माननीय न्यायालय के आदेश के बाबजूद रोक सकती है उसके लिए दर्जनों पुलिस अधिकारियों व जवानों को जेलों में बन्द करना कोई नई बात नहीं।


अन्त में हम सबको ये जानान जरूरी है कि ANTONIO की गुलाम  UPA सरकार की देश के साथ गद्दारी की दास्तां इतनी लम्बी है जिसे एक लेख या किताब में समा पाना असम्भव है। लेकिन हम भी तब तक चैन से नहीं बैठेंगे जब तक इस चोरों व गद्दारों की UPA सरकार की सरदार इटालिय अंग्रेज से इस देश को मुक्त नहीं करवा लिया जाता।



























मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010

कांग्रेस का हाथ गद्दारों के साथ !


सच कहें तो गद्दारों की इस पार्टी में सुधार की अब कोई उम्मीद नजर नहीं आती। हमारा मानना था कि निचले सतर पर कॉंग्रेस में वेहद देशभक्त कार्यकरता हैं जिसका प्रभाब पहली पंक्ति के हिन्दूविरोधी-देशविरोधी नेताओं पर एक न एक दिन जरूर पढ़ेगा ।


लेकिन लगता है कि विदेशी इसाई मिसनरी विषकन्या के कांग्रेस पर कब्जे के बाद ऐसा होना लगभग नामुकिन सा हो गया है। जिस गद्दारी की शुरूआत इस भारत विरोधी की गुलाम सरकार ने 2004 में अर्धसैनिकबलों के जबानों को शहीद होने पर मिलने वाले पैसे में कटौती के साथ की वो अब गद्दारी का सतर इस हद तक पहुंच गया है कि भारतीय सैनिकों पर हमले करने बाले पत्तथरबाज आतंकवादियों को UPA सरकार ने पांच-पांच लाख देकर अपनी गद्दारी का प्रमाण देश के सामने रखा।


2004 में अर्धसैनिक बलों के शहीद जवानों के परिबार बालों को मिलने वाली राशि में कटौती करते वक्त कुतर्क दिया गया कि सरकार के पास पैसे नहीं हैं लेकिन आतंकवादियों को देने के लिए सरकार के पास पैसों की कोई कमी नहीं ये इस फैसले से सिद्ध होता है।


लोग कह रहे हैं कि इस विदेशी की कुलाद ने भारत समर्थक RSS की तुलना भारतविरोधी आतंकवादी गिरोह SIMI से कर दी हम पूछते हैं कि इस विदेशी की गुलाम जिस सरकार ने आतंकवादियों को मारने वाले सैनिकों पर केश दर्ज किए ,यहां तक कि पूरी की परी बटालियन को कटघरे में खड़ा कर दिया उस बिदेशी की कुलाद देशभक्त संगठन के वारे में और कह भी क्या सकती है?


सच्चाई यह है कि सेना किसी भी सरकार की ताकत होती है और सेना द्वारा देशहित में उठाए गए हर कदम की कोई भी देशभक्त सरकार समर्थन करती ही है लेकिन यहां मामला दूसरा है।


क्योंकि यह विदेशी इटालियन है इसे भारत की सेना परायी लगती है अपनी नहीं क्योंकि इसकी अपनी सेना तो इटालिन व युरोपियन सेना है । शायद इसीलिए ये विदेशी हर वक्त अपनी गुलाम सरकार पर भारतीय सेना को कमजोर करने वाले कदम उठाने का दबाब बनाती है। इसी दबाब की बजह से आज तक गुजरात से लेकर कशमीर घाटी तक सुरक्षाबलों के दर्जनों जवान जेलों में डाले जा चुके हैं व सैंकड़ों पर मुकदमे दर्ज किए जा चुके हैं।


अब जिसे, भारतीय सेना जो कि सरकार के इसारे पर ही हर काम करती है सिवाय देश की रक्षा के --- से ही डर लगता हो ---जिसे ये सेना अपनी दुशमन लगती हो ----भल उसे प्रधानमंत्री बनने से रोकने वाले देसभक्त संगठन क्या कभी अपने लगेंगे--- नहीं न ।


ऐसे में सोचने वाला विषय यह है कि जिस विदेशी के निशाने पर भारतीय सेना है उसके निशाने पर भला देशभक्त संगठन क्यों नहीं होंगे ?


क्या आपको याद नहीं कि किस तरह पोटा हटवाकर इस भारत विरोधी इसाई ने भारत विरोधी आतंकवादियों की मदद की।मजेदारबात तो यह है कि इस विदेशी का तो भारतीय सर्वोच न्यायालय तक पर भरोसा नहीं बरना ऐसे कैसे हो सकता था कि देश पर हमला करने का जघन्य अपराध कतरने वाला आतंकवादी अफजल आज तक जिन्दा रहता ? वो भी तब जब माननीय न्यायालय ने इस भारतविरोधी आतंकवादी की फांसी की तारीख 19 नम्मवर 2006 तय की हो और आज 19 नम्मवर 2010 आने वाला हो।


अब आप सोचो कि भारतीय सेना व सर्वोच न्यायलय क्या सिर्फ RSS के हैं या फिर सारे देश के ? क्या ये दोनों संघ के इसारे पर काम करते हैं या फिर भारत सरकार के इसारे पर ?


जब इस विदेशी ने इन दोनों ही समानन्नीय संस्थाओं को बदनाम करने के लिए बार-बार सराकर पर दबाब बनाया हो व सरकार ने वार-बार इस दबाब के आगे झुककर इन दोनों ही संस्थाओं का अपमान किया हो तो फिर आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि इस विदेशी के दबाब में ये सरकार किसी भी देशभक्त संगठन को बदनाम करने में कोई कसर वाकी छोड़ेगी ?


आज स्वामीराम देब जी हर भारतीय चाहे वो अमीर हो या गरीब को दिन-रात एक कर स्वस्थ जिन्दगी जीने का तरीका बताने के साथ-साथ भारतीयों को भारतीय संस्कृति का हर वो पहलू याद करवा रहे हैं जिसे वो विदेशी आक्रमणकारियों के गुलामीकाल के दौरान ही यातनाओं के परिणामस्वारूप भुला चुके थे।


आज स्वामीराम देब संसार की एक सबसे बड़े भारतीय संगठन के प्रमुख हैं लेकिन क्या इस विदेशी की गुलाम सरकार ने उन्हें Z+ सुरक्षा पलब्ध करवाई नहीं न क्यों ?


सिर्फ इसलिए क्योंकि जिस स्वामीरामदेब जी का नाम सुनने पर हर देसभक्त भारतीय का सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है वही रामदेब इस विदेशी को कभी अपना नहीं लगता ?


आज भारत के इसके जैसे कितने ही शत्रु ऐसे हैं जिन्हें इस विदेशी की गुलाम सरकार देशभक्त भारतीयों की खून-पसीने की कमाई से सुरक्षा उपलब्ध करवाकर इनकी हिन्दू क्रांतिकारियों से रक्षा कर रही है ?


लेकिन गद्दारों की सरदार कब तक खैर मनाएगी एक न एक दिन ये सब गद्दार देशभक्त भारतीयों के हाथों अपने कुकर्मों का अन्जाम हर हाल में भुक्तेंगे ही...






शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

इन्द्रेश ही क्यों हिन्दू क्रांतिकारियों के सबन्ध तो डा. अबदुल कलाम जी से भी थे?

 डा. अबदुल कलाम जी भारत के राष्ट्रभक्त क्रांतिकारियों के कितने नजदीक थे इसका प्रमाण तो ये फोटो है।




फोटो में डा. अबदुल कलाम हिन्दू क्रांतिकारी दयानन्द पांडे जी के साथ देश के दुशमनों को समाप्त करने पर गहन विचार विमर्श कर रहे हैं। इन देश के दुशमनों में वांमपंथी आतंकवादियों, मुसलिम आतंकवादियों व धर्मांतरण के ठेकेदारों के साथ-साथ सेकुलर गद्दार भी सामिल हैं ।


रही बात इन्द्रेश जी के हिन्दू क्रांतिकारियों के साथ सबन्धों की तो आज देश का हर वो नागरिक जो भारत माता को अपनी मां मानता है इन क्रांतिकतारियों के साथ है क्योंकि अब वक्त आ गया है कि हिन्दूविरोधी-देशविरोधी धर्मनिर्पेक्ष गिरोह को उसी की भाषा में जबाब दिया जाए।

 भारत को अपनी मां मानने वाले देशभक्त मुसलमान भी हिन्दू क्रांतिकारियों के साथ हैं।


ये विलकुल सत्य है कि इन्द्रेश जी RSS के पदा अधिकारी हैं ठीक उसी तरह जिस तरह डा. अबदुल कलाम जी इन क्रांतिकारियों से मुलाकात के वक्त देश के राष्टपति थे ।जब देश का प्रथम नागरिक ही इन क्रांतिकतारियों का समर्थक था तो फिर वाकी जनता भला क्यों इन हिन्दू क्रांतिकारियों का समर्थन नहीं करेगी?


रही कार्यवाही की बात तो सच्चाई यह है कि 7-8वीं सताब्दी में मुसलिम आतंकवादियों के भारत पर आक्रमण से लेकर अंग्रजों के आक्रमण के दौरान व बाद में काले अंग्रेजों के सासनकाल में भी देशभक्त हिन्दूओं को सताया जाता रहा।


धर्मनिर्पेक्ष गिरोह के सहयोग से हिन्दूबहुल क्षेत्रों व मन्दिरों पर लगातार हमले होते रहे। लेकिन आज तक इन धर्मनिर्पेक्ष गद्दारों व इनके पाले हुए भारतविरोधी आतंकवादियों के विरूद्ध आज तक कोई सीधी कार्यवाही नहीं की गई उल्टा इनको पांच-पांच लाख रूपए इनाम देकर सैनिकों व देशभक्तों पर हमलों के लिए उकसाया जाता रहा।


अब वक्त आ गया है कि इन भारतविरोधी आतंकवादियों के विरूद्ध सीधी कार्यवाही कर भारत को इन भारत विरोधी धर्मनिर्पेक्ष आतंकवादियों से मुक्त करवाया जाए।आओ मिलकर आगे बढ़ें।


ओउम