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मोदीराज लाओ

मोदीराज लाओ
भारत बचाओ

रविवार, 30 सितंबर 2012

Mahatma Gandhi

 

His actual name was Mohan Das Karm Chand Gandhi . Some people call him BAPPUgandhi2. But in constitution or in law this designation holds no validity. If we think in logical way then any hundreds or hundred fifty years old person can’t be the father of that nation whose history goes back to 17 lakh 25 thousand years . Gandhi played a role in struggle for freedom but his support to khilafat Andolan gave rise to islamic algaovad which resulted in partition of AkhandBharat gandhi3_smallin three parts east pakistan , west Pakistan and Bharat. After partition on the basis of religion the short-sightedness of Gandhi and Nehru kept muslims in the part which was meant for non muslims only . Now India is facing so many troubles in Kashmir Ghati , Assam and many other parts of India due to islamic terrorism . If Nathu Ram Godse would have killed him 10 years back then neither AkhandBharat have been divided nor India would have been facing so serious problems due to islamic Gagoipopulation explosion . Many of the people may have different views but it is the reality that Gandhi and Nehru always insulted great revolutionaries like shahid Bhagat Singh, Shahid Chandra shekhar Azad shaheedand many others . This number of revolutionaries goes up to 7 lacks but our intellectual slave persons gave importance only to nehru- soniya-1Gandhi family . we citizens must take pledge to get freedom from this intellectual slavery and we must work hard to achieve the targets of our beloved revolutionaries’ who sacrificed their everything including life, for the freedom and betterment of our Holy Motherland BHARAT MATA .Bharat man

गुरुवार, 20 सितंबर 2012

हिन्दूओं को सोनिया गाँधी से बहुत-कुछ सीखने की जरूरत है।

खुद को धर्मनिर्पेक्ष कहने वाले  बन्धु बार-बार हमें व हमारे जैसी सोच रखने वालों को ये कहकर गाली निकालते हैं कि क्योंकि हम हिन्दूहित की बात करते हैं इसलिए हमारी सोच, राजनीति व संगठन सबकुछ सांप्रदायिक है। इसीलिए वो हमें हमारे मुंह पर सांप्रदायिक कहते हैं और हमारे मूर्ख प्रतिनिधि जिन्हें हमने चुनकर इतना तो जरूर ताकतबर बनाया है कि वो उन्हें मुंह पर समझा सकें कि सांप्रदायिक हिन्दूहित की बात करने वाले नहीं बल्कि हिन्दूहित का विरोध करने वाले हैं।लेकिन न जाने क्यों हमारे ये प्रतिनिधि सर्वधर्मसम्भाव में हमेशा आस्था रखने हिन्दूओं को सांप्रदायिक कहकर गाली निकालने वाले भारतविरोधियों को कड़ा जबाब देने के बजाए कायरता की हद तक संयम का परिचय देते हैं।soniya

इन हिन्दू प्रतिनिधियों को ईसाई एडवीज एंटोनिया अलवीना माइनो उर्फ सोनिया गांधी से  सीखना चाहिए कि अगर हाथ में ताकत आ जाए तो किस तरह अपने सांप्रदाय से सबन्धित लोगों को आगे बढ़ाते हुए दूसरे सांप्रदाय से सबन्धित लोगों को पीछे धकेला जाता है…

19-09-2012 को CONGRESS CORE GROUP की बैठक हुई जिसमें निम्न लोगों ने हिस्सा लिया

1) एडवीज एंटोनिया माइनो ईटालियन उर्फ एदलगबो उर्फ SONIYA GANDHI  ईसाई (MINORITY COMMUNITY)

2) A K ANTONY  ईसाई (MINORITY COMMUNITY)

3)AHMED PATEL PA TO SONIYA GANDHI मुसलमान(MINORITY COMMUNITY)

4)MANMOHAN SINGH (MINORITY COMMUNITY)

5) P CHIDAMBRAM CONVERTED ईसाई (DOUBTFULL IDENTITY)

 

अब आप सोचो कि काँग्रेस द्वारा प्रचारित धर्मनिर्पेक्षता का क्या  मतलब होता है ?

उम्मीद है आप समझ गए होंगे कि सेकुलर गिरोह द्वारा प्रचारित धर्मनिर्पेक्षता  का एक ही अर्थ है कि हिन्दूओं को शक्तिविहीन कर गैर हिन्दूओं की गुलामी करने के लिए  बाध्य करना…

हद तो तब है कि जब हरवक्त इस ईटालियन अंग्रेज की हर वक्त चाटुकारिता करने वाले किसी भी हिन्दू को जगह नहीं मिलती इस ईसाई की जुंडली में।

अगर आपके पास समय है तो विस्तार से जानने के लिए इस लेख को जरूर पढ़ें

एडवीज एंटोनिया अलवीना माइनो उर्फ सोनिया गांधी के हिन्दुविरोधी षडयन्त्र

अगर हमने कुछ गलत कहा तो हमें बताना न भूलें

मंगलवार, 18 सितंबर 2012

दंगाई आइना देखते ही क्यों भड़क उठते हैं?

पैग़ंबर मोहम्मद पर बनी विवादित फ़िल्म के विरोध की आंच मध्यपूर्व, यूरोप और अमरीका सहित भारत में भी पहुंच चुकी है लेकिन ये फिल्म दुनियाभर में लोगों को आखिर क्यों उकसा रही है.

फिल्म में क्या दिखाया गया है?

इनोसेंस ऑफ मुस्लिमस नामक इस फिल्म में इस्लाम को हिंसा (अधिक जानकारी के लिए यहां पढ़ें।) और द्वेष फैलाने वाले धर्म के रुप में दिखाया गया है. फिल्म के चित्रण के मुताबिक पैगंबर मुहम्मद मूर्ख और सत्ता-लोभी शख्स थे

.

 

सच्चाई हमेशा कड़वी ही लगती है

फिल्म की शुरुआत में एक इसाई परिवार को मुसलमानों द्वारा प्रताड़ित होते दिखाया गया है, जो मध्यपूर्व में इसाईयों के खिलाफ़ हुए हमलों का संकेत देता है. फिल्म के कई हिस्सों में पैगंबर और उनके सहयोगियों को धन-संपत्ति के लिए महिलायों और बच्चों की हत्या करते दिखाया गया है.

फिल्म में क्या है?

बेन्गाज़ी में हमला

बेन्गाज़ी में फ़िल्म के विरोध में हुए हिंसक प्रदर्शन में अमरीकी राजदूत समेत कई लोग मारे गए हैं.

पैगंबर मुहम्मद को किसी भी रुप में साकार करना अपने आप में गैर-इस्लामी है. इस फिल्म में उन पर कई कटाक्ष किए गए हैं. उनकी पत्नी ख़दीजा और उनके सहयोगियों के खिलाफ़ भी फिल्म में कई टिप्पणियां है ये सभी ईश-निंदा के अंतर्गत आते हैं.

इसके अलावा पैगंबर मुहम्मद का किसी स्त्री के साथ प्रेमालाप, उनका लालच और हिंसात्मक चित्रण अपने आप में अपमानजनक है.

क्या कहना है फिल्म के अभिनेताओं का?

सैम बेसाइल नाम के एक व्यक्ति ने फ़िल्म का निर्माण किया है जो ख़ुद को अमरीका में रहने वाले यहूदी बताते हैं और रियल स्टेट कारोबारी हैं. वॉल स्ट्रीट जर्नल के अनुसार सैम बेसाइल ने लगभग 50 लाख डॉलर में ये फ़िल्म बनाई है. ये धनराशि उन्होंने 100 यहूदियों से मांग कर जमा किया था. सैम बेसाइल ने इसे एक राजनीतिक फ़िल्म क़रार देते हुए कहा था कि इस्लाम एक कैंसर है.

जिस तरह के हालात इन दिनों हैं उनमें किसी भी संदर्भ में प्रदर्शन भड़क सकते हैं.

पैगंबर मोहम्मद का मजाक उड़ाते कार्टून

वर्ष 2005 में डेनमार्क के एक अखबार ने पैगंबर मोहम्मद को दर्शाते कार्टून प्रकाशित किए.

अख़बार युलांस पोस्टन ने 12 कार्टूनों की सिरीज़ प्रकाशित की जिनमें से कई कार्टूनों में पैगंबर को इस्लामी चरमपंथी के रूप में प्रदर्शित किया गया था.

फिर वर्ष 2006 में एक फ़्रांसीसी पत्रिका ने दोबारा इन कार्टूनों को छापा, जिसके बाद दुनिया भर में मुसलमानों की ओर से तीखी प्रतिक्रिया आई.

ये सारी सामग्री इन समाचारों का सार है

http://www.bbc.co.uk/hindi/news/2011/04/110411_france_veil_va.shtml

http://www.bbc.co.uk/hindi/news/2012/09/120912_film_islam_da.shtml

http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/2012/09/120910_midnight_film_release_india_psa.shtml

http://www.bbc.co.uk/hindi/news/2012/09/120912_islam_disrespect_da.shtml

http://www.bbc.co.uk/hindi/news/2012/09/120915_prophet_film_question_pa.shtml

मुसलमानों द्वारा भारत के विभिन्न हिस्सों में किए जा रहे भारतीयों के कतलयाम को देखते हुए कोई भी समझदार इनसान इसी निशकर्ष पर पहुंचेगा कि इसलाम की स्थापना करने वाला जरूर कोई शैतान ही रहा होगा वरना ये कातिल इस तरह मानबता को लहुलूहान कर हिन्दूओं द्वारा आक्रमणकारी मुसलमानों के प्रति दिखाए गए भाईचारे को खतरे में न डालते

सोमवार, 10 सितंबर 2012

रविवार, 2 सितंबर 2012

नितीस बनाम राज ठाकरे की लड़ाई को बिहार बनाम मुंमबई की लड़ाई बनाने की गलती न करो मेरे यारो!

देखो जरा चैन से बैठकर सोचो कि ये लड़ाई विहारियों के विरूद्ध है या उन वंगलादेशी घुसपैठियए मुसलमानों के बिरूद्ध जो खुद को कभी उतर प्रदेश के, तो कभी विहार के, तो कभी पशिचम वंगाल के बताकर सारे देश में इसालमिक आतंकवाद का एक ऐसा तानाबान बना चुके हैं जिसे हिन्दूओं की रक्षा के लिए तोड़ना जरूरी ही नहीं बल्कि हम सब की मजबूरी भी है।ध्यान खो हम यहां उन बंगलादेशी घुसपैठिए मुसलमानों की बात कर रहे हैं  जो विहार, उतर प्रदेश व पशिम वंगाल के ना3म पर अपनी गलत पहचान बताते हैं।

अब प्रशन उठता है कि राज ठाकरे का आज का ब्यान बिहारियों के विरूद्ध है याफिर विहारियों की आड़ में मुमबई को नर्क बनाने पर तुले घुसपैठिए मुसलमानों के विरूद्ध। हमें तो पहले ही शक था कि राज ठाकरे क्योंकि अभी नए हैं इसलिए सीधा मुसलमानों का विरोध करने का साहस नहीं दिखा पा रहे हैं इसलिए गुसपैठिए मुसलमानों का सीधा नाम लेने के बजाए विहारियों का नम लेकर इन इसलामिक आतंकवादियों को निशाना बना रहे हैं लेकिन राज ठाकरे के आज के ब्यान से सपष्ट हो गया कि उनके निशाने पर मुसलमान हैं न कि विहारी कैसे?

राज ठाकरे ने कहा कि अगर मुमबई में अमर जवान समारक तोड़ने वालों को पकड़ने गई मुमबई पुलिस, का अगर वहां की सरकार ने विरोध किया तो वो सब बिहारीयों को घुसपैठिए समझ कर बाहर निकाल देंगे।

अब आप कहेंगे किठाकरे ने धुसपैठिए मुसलमान नहीं कहा ।आपको समझना चाहिए कि अमर जवान समारक को किसी हिन्दू या विहारी ने नहीं तोड़ा इस समारक को तोड़ा मुसलमान ने ।अभी भी ठाकरे की ताकत इतनी नहीं बढ़ी है कि वो वर्षों से ढोरा जमाए बैठे घुपैठिए मुसलमानों को सीधा निशाना बना पायें इसलिए ठाकरे ने शहीद समारक को अपमानित करने की बात जोड़कर सबको अपने इरादों का साफ संदेश दे दिया।

अब आप कहेंगे कि नितीस का  नाम बीच में कैसे आया ? हम सबको याद रखना होगा कि नितीस वो गद्दार बनेने की राह पर है जो गद्दारी मुलायम सिंह यादब व दिगविजय सिंह इसलामिक आतंकवादियों के साथ खड़े होकर वर्षों से कर रहे हैं।

ये तो भाजपा की आत्मगाती मूर्खता है जो इस गद्दार से अपना सबन्ध नहीं तोड़ रही। ये काम 2004 में ही हो जाना चाहिए था।

आपको याद होगा कि जब बंगलौर पुलिस ने विहार से इसलामिक आतंकवादियों को गिरप्तार किया था तो इस नए नवेले गद्दार ने ढटकर विरोध किया था इसीलिए राज ठाकरे को ये ब्यान देने के लिए मजबूर होना पड़ा। ये भी हो सकता है कि नितीस कुमार द्वारा आतंकवादियों के पकड़े जाने का विरोध करने की सूचना वहां की सरकार ने ही राज ठाकरे को दी हो । 

देशभक्तों का वोट खोते जा रहे नितीस अब तुष्टीकरण की नीति के सात-साथ क्षेत्रवाद को भी अपने हथियार की तरह प्रयोग कर रहे हैं इसलिए ये लड़ाई राज ठाकरे बनाम नितीस की है न कि किसी और की।

अन्त में इतना ही कहेंगे कि जो भी व्यक्ति किसी भी हिन्दू से जाति, क्षेत्र या भाषा के आधार पर भेदभाव करता है वो देशभक्तों की निगाह में कभी मान-समान का पात्र नहीं हो सकता इसलिए राजठाकरे को आतंकवादी मुसलमानों के विरूद्ध सीधा वोलना चाहिए अगर ताकत नहीं हैं इन आतंकवादियों का विरोध करने की तो खामोश रहना चाहिए ।

आओ अन्त में हम सब प्रण करें कि अपने आसपास घुसपैठ कर चुके इन इसलामिक आतंकवादियों को ढूंढ कर देश से बाहर निकलें ।

गुरुवार, 30 अगस्त 2012

हिन्दू हथियार न उठोयें तो क्या करें ?

जेहादीयों का बैनर

आप बास्तब में अगर देश में शान्ति चाहते हैं तो इस जानकारी को ध्यान से देखने और पढ़ने के बाद खुदवाखुद चिल्ला उठेंगे कि जब सराकरें मानबता के हत्यारों के साथ जा खड़ी हुई हैं तो हिन्दू के पास आत्मरक्षा में हथियार उठाने शिवा कोई चारा नहीं!

jehadi poster in kashmir 

ये वो बैनर है जो मानबता के हत्यारों ने कशमीर घाटी में जगह-जगह चिपकाकर हिन्दूमिटाओ-हिन्दूभगाओ षडयन्त्र की शुरूआत की

अधिक जानकारी के लिए यहां पढ़ें।)

 

 

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ये हैं वो सैनिक जिनके कन्धों पर भारतीयों की रक्षा की जिम्मेदारी है लेकिन चोरों ,गद्दारों और लुटेरों की सेकुलर(काँग्रेस) सरकार ने इनके हाथ इस कदर बान्ध दिए हैं कि ये खुद इसलामिक आतंकवादियों से पिटने-मरने को मजबूर हैं अब आप ही बताओ जिनको अपनी रक्षा का अधिकार नहीं वो भला दयावान-लाचार-शान्तिप्रिय हिन्दूओं की रक्षा कैसे करेंगे

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अगर कहीं  ये सैनिक आत्मरक्षा में किसी इसलामिक आतंकवादी को मार गिराते हैं तो उसे फर्जी मुठभेड़ करार देकर आतंकवादियों को मारने वाले बहादुर सैनिकों को जेलों में डाल दिया जाता है

(आज सैंकड़ों सैनिक व अन्य सुरक्षा बलों के जवान देशभक्ति की सजा जेलों में भुक्तने को मजबूर हैं)

 

आतंकवादियों की रक्षा के लिए कमांडर बर्खास्त

सैनिकों द्वारा अपना खून बहाकर देश के लिए किए गए काम को किस तरह इन गद्दार समर्थक सरकारों ने बर्बाद किया उसी को दर्शाता है ये ब्यान

सेनापति का दर्द

मुम्बई दंगा करवाने वालों के साथ वही गृहमन्त्री खड़ा है जिसे इससे पहले एडवीज एंटोनिया अलवीना माइनो(सोनिया गाँधी) के ऐजेंट अहमद पटेल व इसालमिक आतंकवादी के साथ बैठकर मुंम्बई का पुलिस कमीशनर की नियुक्त तय करते हुए कैमरे में कैद किया गया था

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जब आतंकवादियों के इसारे पर सराकर काम करे तो इसके शिवा और क्या हो सकता है

Muslims of India_11.08.2012

वन्देमातरम् का विरोध….भारत माता को गाली----सैनिकों पर हमले---अब अमरजवान समारक मतलब देश की आन-वान-शान के लिए कुर्वान होने वाले शहीदों का अपमान

क्या अब भी आप कह सकते हैं कि गद्दार नहीं है मुसलमान

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मुसलमानों की गद्दारी का नमूना आप याहं भी देख सकते हैं कि वो इन गद्दारों का किस तरह समर्थन कर रहे हैं

http://www.facebook.com/photo.php?fbid=453632971326429&set=o.198159610273612&type=1&permPage=1

मुसलमानों की धमकियों व हमलों के परिणामस्वारूप हिन्दूओं का पलायन

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मुसलमानों के हमलों और हिन्दूओं की इसी भागमभाग में

अफगानिस्तान पाकिस्तान बांगलादेश सब हिन्दुविहीन हो गए।

अब कश्मीर आसाम को हिन्दुविहीन करने के लिए जिहादी हमले जारी हैं।।

आज जिहादी हमलों में वो घरबार परिवार सहित मारे गए।।।

कल हमारी फिर हमारे बच्चों को मारने की तैयारी है।।।।

आपके मन में यही आ रहा होगा

DESTROY ISLAM
OR
GET DESTROYED BY IT

 

हिन्दूओं की सेवा में

उग्रहिन्दूवादी

(sdsbtf@gmail.com

रविवार, 19 अगस्त 2012

JAGO HINDU JAGO: ईद कहो या बकरईद मकसद तो एक ही है---हिंसा---कत्लोगा...

JAGO HINDU JAGO: ईद कहो या बकरईद मकसद तो एक ही है---हिंसा---कत्लोगा...: हम कई बार हैरान होते हैं ये देखकर कि जब कातिल अल्लाह के नाम पर कतलयाम मचा रहे होते हैं तो कुछ परजीवि इस कत्लयाम को कभी वकर ईद तो कभी ईद के ...

शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

हिन्दूओ कब तक भागोगे …..

आज हम बहुत दिनों बाद लिख रहे हैं वो भी एक ऐसे विषय पर जो हमारी आत्मा को हर वक्त लहुलुहान करता रहता है …h9अभी हाल ही में मिडीया ने आसाम का मुद्दा उठाया ये सोचकर कि आसाम में होने वाली हिंसा में प्रताड़ित लोग मुसलमान हैं लेकिन जैसे ही मिडीया को ये ऐहसास हुआ कि सच्चाई इसके विलकुल विपरीत है मिडीया ने इस मुद्दे को ठंडे बस्ते में डालने की बहुत कोशिश  की ।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि आसाम में बंगलादेशी घुसपैठिएयों (intruders) ने अपनी संख्या भारत-विरोधी हिन्दू-विरोधी काँग्रेस की सहायता से इतनी बड़ा ली है कि अब वो वहां पर स्थानीय निवासी हिन्दू अनुसूचित जनजातियों व धर्मान्तरित हो चुके ईसाईयों को उनके घरों पर हमले कर उनका खून वहाकर ठीक उसी तरह आसाम को हिन्दूविहीन करने की कोशिस कर रहे हैं जिस तरह इन इस्लामिक आतंकवादियों ने इसी भारतविरोधी-हिन्दूविरोधी काँग्रेस की सहायाता से कशमीरघाटी को हिन्दूविहीन किया था। हिन्दूमिटाओ-हिन्दूभगाओ अभियान

…परिणामस्वारूप आज आसाम के बहुत से क्षेत्र हिन्दूविहीन हो गए हैं व लाखों हिन्दू अपने घर बार छोड़कर राहत सिविरों में रहने को मजबूर हैं और काँग्रेस अपने भारत के इन निर्दोष नागरिकों के साथ खड़े होने के बजाए घुसपैठिए इस्लामिक आतंकवादियों का ये कहकर बचाब कर रही है कि अमेरिका(अमेरिका एसा ईसाई देश है जिसका राष्ट्रपति संविधान के बजाए बाईबल की शपथ लेता है) में भी मैक्सिको से घुसपैठ होती रहती है लेकिन वो ये बताना भूल जाती है कि घुसपैठ करने वाले न तो इस्लामिक आतंकवादी होते हैं और न ही अमेरिका अपने नागरिकों पर अमेरिका में तो क्या दुनिया के किसी भी हिस्से में हमला बर्दास करता है हद तो तब हो जाती है जब काँग्रेस इन जिहादी घुसपैठिए आतंकवादियों के मानबाधिकारों की बात करती है साथ ही पाकिस्तान व वंगलादेश में इस्लमिक आतंकवादियों की हिंसा के सिकार हिन्दूओं व अनुसूचित जातियों से सबन्धित हिन्दूओं खासकर वालमिकीयों को भारत की नागरिकता देने का विरोध करती है।

ये चार लाईनें हमने 2007 में इस लेख में लिखी थीं और आज के हालात देखकर आप समझ सकते हैं कि हमने कितना सी आकलन किया था और हिन्दू इसी तरह असंगठित रहा तो वो दिन दूर नहीं जब चौथी लाईन भी हम पर लागू हो जाएगी

अफगानिस्तान पाकिस्तान बांगलादेश सब हिन्दुविहीन हो गए।  

अब कश्मीर आसाम को हिन्दुविहीन घोषित करने की तैयारी है।।   

आज जिहादी हमलों में वो घरबार परिवार सहित मारे गए।।।   

कल हमारी फिर हमारे बच्चों को मारने की तैयारी है।।।।

क्योंकि आसाम पर ये हमला वंगलादेशी घुसपैठिए इस्लामिक आतंकवादी  कर रहे हैं इसलिए भारत के हर देशभक्त नागरिक को अपने भारतीय भाईयों के साथ खड़ा होना चाहिए लेकिन भारत में रहने वाले मुसलमान इन घुसपैठिए आतंकवादियों के समर्थन में अब तक जमसेदपुर, मुमबई में हमला कर चुके हैं व यही इस्लमिक आतंकवादियों के समर्थक मुसलमान अब बंगलौर,पूना व हैदराबाद,पंजाब जैसे सहरों में उतरपूर्ब के अनुसूचित जनजातियों से सबन्धित हिन्दू भाईयों, अन्य हिन्दूओं व ईसाईयों को ये शहर छोड़कर जाने के लिए धमकियां दे रहे हैं इनके विरूद्ध हर तरह का झूठा प्रचार कर इनपर हमला करने के लिए महौल बना रहे हैं फिर भी हिन्दू-विरोधी भारतविरोधी एडवीज एंटोनिया अलवीना माइनो की गुलाम काँग्रेस सरकार इस्लामिक आतंकवादियों की मददगार बनी हुई है।assam

 

परिमामस्वारूप आसाम में लोग अपने घरवार छोड़कर राहत सिविरों में भाग रहे हैं, देश के मुसलिम बहुल क्षेत्रों से हिन्दू--- हिन्दूबहुल क्षेत्रों की ओर भाग रहे हैं ऐसा नहीं कि हम सिर्फ उतरपूर्व के हिन्दूओं या ईसाईयों की बात कर रहे हैं पर बैसे भी भारत के जिस भी क्षेत्र में मुसलमानों की जनसंख्या  बड़ जाती है वहां पर ये इस्लामिक आतंकवादी ऐसा दहसत व गंदगी भरा महौल बना देते हैं कि हिन्दूओं के पास वहाँ से भागने के शिवा और कोई चार नहीं रहता ।

यह वही भागने की प्रवृति है जिसके कारण हिन्दू पहले अफगानीस्थान से भागा, फिर पाकिस्तान और वंगलादेश से भागा फिर बंगलादेश के साथ लगते समुद्री टापुओं से भागा, फिर कशमीर घाटी से भागा, भारत के अन्य मुसलिम बहुल क्षेत्रों से भागा …  आज वंगलौर, हैदराबाद,पूना,पंजाव व आसाम के मुसलिम बहुल क्षेत्रों से भाग रहा है…

मन में यही प्रशन पैदा होता है कि आखिर हिन्दू कब तक भागेगा और कहां भागेगा।modi

अब ये वक्त की जरूरत है कि हिन्दू यहूदियों ये सबक लेकर हिन्दूहित के लिए काम करने वाले संगठनों स्नातन संस्था---हिन्दूजागृति समृति …बजरंग दल---हिन्दूवाहिनी---RSS---VHP…हिन्दूमहासभा जैसे संगठनों के साथ संगठित होकर इन भारतविरोधी-हिन्दूविरोधी आतंकवादियों को ईंट का जबाब पत्थर से देने का मार्ग अपनाए वरना वो दिन दूर नहीं जब न हिन्दू बचेगा न हिन्दूस्थान

लोग कहते हैं, युनान मिश्र रोमा सब मिट गए, कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।
पर यह भी सत्य है कि उस कौम का इतिहास नहीं होता ,जिसको मिटने का एहसास नहीं होता,
मिलजुलकर एकजुट होकर कदम उठाओ ऐ हिन्दूओ,बरना तुम्महारी दासतां तक न होगी दासतानों

शुक्रवार, 10 अगस्त 2012

भगवान श्रीकृष्ण जी के जन्मदिन पर सब हिन्दूओं को हार्दिक शुभकामनायें

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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

जयकारा वीर बजरंगी - - - हर हर महादेव

ॐ श्री हनुमते नमः ॐ श्री हनुमते नमः ॐ श्री हनुमते नमः




ॐ श्री हनुमते नमः ॐ श्री हनुमते नमः ॐ श्री हनुमते नमः



ॐ श्री हनुमते नमः ॐ श्री हनुमते नमः ॐ श्री हनुमते नमः



ॐ श्री हनुमते नमः ॐ श्री हनुमते नमः ॐ श्री हनुमते नमः



ॐ श्री हनुमते नमः ॐ श्री हनुमते नमः ॐ श्री हनुमते नमः



ॐ श्री हनुमते नमः ॐ श्री हनुमते नमः ॐ श्री हनुमते नमः



ॐ श्री हनुमते नमः ॐ श्री हनुमते नमः ॐ श्री हनुमते नमः



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ॐ श्री हनुमते नमः ॐ श्री हनुमते नमः ॐ श्री हनुमते नमः



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ॐ श्री हनुमते नमः ॐ श्री हनुमते नमः ॐ श्री हनुमते नमः



ॐ श्री हनुमते नमः ॐ श्री हनुमते नमः ॐ श्री हनुमते नमः



ॐ श्री हनुमते नमः ॐ श्री हनुमते नमः ॐ श्री हनुमते नमः



ॐ श्री हनुमते नमः ॐ श्री हनुमते नमः ॐ श्री हनुमते नमः



ॐ श्री हनुमते नमः ॐ श्री हनुमते नमः ॐ श्री हनुमते नमः



ॐ श्री हनुमते नमः ॐ श्री हनुमते नमः ॐ श्री हनुमते नमः



ॐ श्री हनुमते नमः ॐ श्री हनुमते नमः ॐ श्री हनुमते नमः



ॐ श्री हनुमते नमः ॐ श्री हनुमते नमः ॐ श्री हनुमते नमः



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गुरुवार, 29 मार्च 2012

उतराखण्ड में सरकार बनते ही काँग्रेस का स्वदेशी, देशभक्ति और आयुर्वेद के क्राँतिवीर पर हमला

चोरी,गद्दारी और भारतविरोध अब काँग्रेस का ट्रेडमार्क बन चुका है। काँग्रेस जब से विदेशी अंग्रेज एडवीज एंटोनिया अलवीना माइनो की गुलाम होकर केन्द्र में सता में है तब से वो कोई ऐसा मौका नहीं चूक रही जिसमें भारत को लहुलुहान कर भारतविरोधियों को लाभ पहुँचाया जा सके।

चोरों, लुटेरों और गद्दारों की सरगना की गुलाम काँग्रेस की केन्द्र सरकार को लाखों भारतीयों का खून बहाने वाली भारत की कट्टर दुश्मन ISI(Inteligence Services of Islam) में शान्तिदूत नजर आता है …दुनियाभर में मानवता का खून बहाने वाले ओसामाबिन लादेन में मानवता का चेहरा नजर आता है… व इन्सानियत , प्रेम, भाईचारे, इमानदारी के प्रेरणास्त्रोत सन्त स्वामीरामदेव जी व उन्य देशभक्तों में काँग्रेस को अपना शत्रु नजर आता है…

अपनी इसी भारतविरोधी-हिन्दूविरोधी मानसिकता से ग्रसित गुलाम काँग्रेस ने उतराखण्ड में सरकार बनने की सम्भावना देखते ही इस अंग्रेज के सपोले की गुलाम रीताबहुगुणा के भाई को उतराखण्ड का मुख्यमन्त्री घोषित कर दिया । जबकि इसको आधा दर्जन से भी कम काँग्रेसी विधायकों का समर्थन हासिल था।

सोचने वाला विषय ये है कि जब काँग्रेसी विधायकों का समर्थन किसी और को प्राप्त था तो फिर राहुल विन्शी ने क्यों जोरजबरदस्ती कर अपनी गुलाम के भाई को मुख्यमन्त्री बनाने के लिए अपना सबकुछ दाव पर लगा दिया?

सरकार बनने के एकदम बाद स्वदेशी, देशभक्ति और आयुर्वेद के क्राँतिवीर परम्पूजनीय स्वामीराम देवजी पर हमला ये साबित करने के लिए काफी है कि राहुल विन्शी को भारतीयता का प्रचार-प्रसार किसी भी हालत में स्वीकार नहीं।

वरना हर कोई जानता है कि स्वामी रामदेव जी के सारे भारत में स्वदेशी वस्तु भण्डार व आयुर्वैदिक चिकित्सालय काम कर रहे हैं। आज तक भारत के किसी भी राज्य में स्वामी जी द्वारा संचालित स्वदेशी तन्त्र पर किसी भी तरह कोई अनियमतता नहीं पाई गई है।

कुलमिलाकर  इटालियन एडवीज एंटोनिया अलवीना माइनो ने उतराखण्ड में अपनी कठपुतली सरकार बनाकर माफिया राज के लिए दुनियाभर में बदनाम इटली की  षयन्त्रकारी राजनीति को भारत में और आगे वड़ाने का काम किया है। जिस तरह इस अंग्रेज ने अपने माफिया राज को आगे बढ़ाने के लिए CBI को हथियार बनाकर मुलायम सिंह यादव व मायावती को केन्द्र में चल रहे इस चोरों, लुटेरों और गद्दारों की सरगना के माफिया राज को एक साथमिलकर समर्थन करने के लिए मजबूर किया है उसी तरह अब विभिन्न सरकारी ऐजेंसियों का दुरूपयोग कर स्वामी जी को अपनी आवाज बन्द रखने के लिए मजबूर करने के लिए हर तरह के षडयन्त्रों को अन्जाम दिया जाएगा।

अगर स्वामी जी ने गद्दारों के विरूद्ध अपना शंखनाद इसी तरह जारी रखा तो इस अंग्रेज की गुलाम सरकार उनको बदनाम करने या मरवाने के लिए किसी भी हद तक गिर सकती है।

चर्च ने भारत में अंग्रेजों का परोक्ष शासन चलाने के लिए जिस तरह आधा दर्जन नेताओं का कत्ल करवाकर इस अंग्रेज को काँग्रेस का अध्यक्ष बनवाकर भारत का साशन अपने हाथ में लिया  वही चर्च देशभक्ति और भारतीयता के क्राँतिवीर स्वामीरामदेव जी को चर्च का खेल बिगाड़ने में सफल होने का मौका भला कैसे दे सकता है?http://samrastamunch.blogspot.in/2010/09/6.html

Hindusatn Liver(Uniliver) जैसी जिन भारतविरोधी Multinationals के चन्दे पर चर्च का भारतविरोधी आतंकवाद व धर्मांतरण फलता-फूलता है वो चर्च भला इन Multinationals के भारतविरोधी षडयन्त्रों को वेनकाब करने के काम में लगे इस क्राँतिवीर को भारत में अपनी ऐजेंट का साशन रहते हुए कैसे फलने-फूलने दे सकता है?

मंगलवार, 27 मार्च 2012

आओ शहीद जवानों को श्रधांजली अर्पित करते हुए प्रण करें कि भारतविरोधी आतंकवादियों और उनके समर्थक सेकुलर गद्दारों को जब तक भारत से नेसतनानबूद नहीं कर दिया जाता तब तक हम चैन से नहीं बैठेंगे…

देखो ये प्रश्न भारत के अस्सतित्व का है इसलिए इस प्रश्न का जबाब भी हम सब भारतवासियों को मिलकर ही निकालना है। भारतविरोधी आतंकवादियों के हाथों अगर भारतीयों का कत्लयाम यूँ ही वे रोक टोक चलता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब हमें यहूदियों की तरह वेघर होकर दुनियाभर में ठोकरें खाने को मजबूर होना पड़ेगा। समय की जरूरत है कि हम सब अपने हर तरह के छेटे-मोटे मतभेद भुलाकर देशभक्त संगठनों के साथ एकजुट होकर भारतीय सेना को सहयोग देकर भारतविरोधियों का सर्वनाश सुनिश्चित करें।

पिछले कल यानिके 27/03/12 को जिस तरह से दर्जनों CRPF जवानों का नक्सिलियों द्वारा कत्लयाम किया गया वो इन आतंकवादियों का इस तरह का कोई पहला हमला नहीं …इससे पहले भी ये वामपंथी आतंकवादी पश्चिम वंगाल में वांमपंथी सरकार के सहयोग से इसी तरह दर्जनों जवानों को जिन्दा जला चुके हैं ।

आपने देखा कि किस तरह सांसद और विधायक अपनी पोल खुलने के डर से एकजुट होकर पोलखोलने वालों पर हमला वोल देते हैं लेकिन भारतविरोधी आतंकवादियों द्वारा मारे जा रहे निर्दोष लोगों व सैनिकों को न्याय दिलवाने के लिए जब निर्णायक कार्यवाही की बात आती है तो ये दल कभी एकजुटता नहीं दिखाते ।

मतलब साफ है कि भारतीयों को न्याय पाने के लिए समाजिक सतर पर एकजुट होकर सुरक्षावलों का सहयोग लेकर भारतविरोधी आतंकवादियों के सफाए का अभियाना चलाना होगा वरना हम यूँ ही मरते-तड़पते रहेंगे और ये तथाकथित प्रतिनिधि हमारा खून चूस व वहाकर अपनी तिजोरियां भरते रहेंगे..

शनिवार, 24 मार्च 2012

दलित हिन्दूओं पर धर्मनिर्पेक्षतावादियों का हमला अगर इसी तरह जारी रहा तो देशभक्त हिन्दूसमाज चुप नहीं बैठेगा…

हम पिछले पन्द्रह दिनों से देख रहे हैं कि उतर प्रदेश में धर्मनिर्पेक्ष गिरोह की  सरकार बनते ही देशभक्त हिन्दूओं खासकर दलित हिन्दूओं पर लगातार हमले किए जा रहे हैं---कहीं उनके घर जलाए जा रहे हैं तो कहीं उन्हें गोली से उड़ाया जा है… कहीं बाबा भीमराव अम्बेडकर साहब जी की मूर्तियां तोड़कर…कहीं गंगा सफाई का अभियान रोककर हिन्दूओं की आस्था पर चोट की जा रही कहीं… महिला प्रतिनिधियों के पति का कत्ल किया जा रहा तो कहीं इन हिन्दूओं को दबाने के लिए इनपर दबाब बनाया जा रहा है …ये सब अमानबीय कुकर्म किए जा रहे हैं सेकुलर गिरोह की प्रमुख सहयोगी समाजवादी पार्टी द्वारा चुनाब जीतने व उसकी सरकार बनने के बाद ।

देश का बच्चा-बच्चा जानता है कि इस पार्टी का मुखिय मौलाना मुलायम सिंह यादब  इस्लामिक आतंकवादियों के साथ मिलकर हिन्दूओं का खून बहाकर आन्नदित होता है शायद इस वार भी हो रहा होगा…तभी तो ये हिन्दूविरोधी खून खराबा रूकने का नाम ही नहीं ले रहा।

आप अच्छा मानो या बुरा वेशक पहले सेकुलर गिरोह से जुड़ी समाजबादी पार्टी की सरकार मुसलमानों के बोटों के सहारे बना करती थी लेकिन इसवार इस सरकार को बनबाने में मुसलमानों से कहीं ज्यदा योगदान हिन्दूओं का है वरना हमने तो हिन्दूओं से पहले ही कहा था कि हिन्दूओं की कातिल समाजवादी पार्टी व कांग्रेस से बचने के लिए रणनितिक समझदारी दिखाते हुए बहुजन समाजवादी पार्टी व भारतीय जनता पार्टी को विजयी वनायें लेकिन हिन्दूओं ने एकवार फिर मूर्खता करते हुए हिन्दूविरोधी-भारतविरोधी सेकुलर गिरोह से जुड़ी समाजवादी पार्टी को विजयी वनाकर अपने पैर पर कुलहाड़ी मारने का काम किया जिसका खमियाजा आज हम सब हिन्दू भुगतने लगे हैं।

सच कहें तो मौलाना मुलायम सिंह यादब की जगह युवा अखिलेश यादब द्वारा मुख्यमन्त्री का पद सम्भालने के बाद मन मेंएक उम्मीद जगी थी कि शायद अपने वेटे के भविष्य की रक्षा की खातिर  मौलाना मुसायन सिंह यादम व भारत माता को डायन कहकर गाली निकालने वाले आजम खान जैसे उनके यार अब हिन्दूओं का खून नहीं बहाँयेगे लेकिन लगता है कि इनको अपने वेटे के भविष्य से ज्यदा प्रिए हिन्दूओं का खून बहाना है।

लेकिन सेकुलर गिरोह से जुड़े हिन्दूविरोधियों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि अब ये हिन्दू 90 के दशक का वो हिन्दू नहीं है जो मार खाकर भी चुप रहता था अब ये हिन्दू बदल चुका है और अगर कहीं ये हिन्दू अपनी पे आ गया तो न तो सेकुलर गद्दार बचेंगे और न ही इनके यार इस्लामिक आतंकवादी।

कुलमिलाकर सेकुलर गिरोह के हित में यही है कि वो बाबा भीमराव अम्वेडकर जी की मूर्तियां तोड़कर व दलितों के घर जलाकर देसभक्त हिन्दू समाज को भयभीत करने का दुहसाहस न करे वरना इसके जो भी दुष्परिणाम निकलेंगे उसके लिए पूरी तरह से ये सेकुलर गिरोह ही जिम्मेदार होगा…

सोचने की बात तो ये हैं कि किसी भी भारतविरोधी गद्दार को किसी देशभक्त या सेना  द्वारा एक थप्पड़ भर मार देने पर जोर-जोर से चिल्लाने वाले सबके सब सेकुलरवादी, तथाकथित मानवाधिकारवादी आदि-आदि … धर्मनिर्पेक्ष गिरोह द्वारा हिन्दूओं पर किए जा रहे इस अत्याचार पर पूरी तरह खामोश ही नहीं वल्कि इस कुकर्म में हर तरह से भागीदार वनकर रह गए हैं।

आपको याद होगा कि पिछले दिनों बंगलादेशी घुसपैठिए की पिटाई करने वाले सुरक्षावलों पर ये सबकेसब गद्दार किस तरह से पिल पड़े थे लेकिन अब इनको कोई अत्यचार नजर नहीं आ रहा है।

जागो हिन्दू जागो पहचानों इन भारतविरोधी-हिन्दूविरोधी सेकुलर गद्दारों को और एकजुट होकर मिटा डालो हिन्दूओं के कातिल इन हत्यारों को

शुक्रवार, 23 मार्च 2012

शहीदी दिवस पर विशेष ….अमर शहीद सरदार भगत सिंह…

 

आज से लगभग सौ वर्ष पहले लायपुर जिले के गांव वंगा में एक हिन्दू-सिख कुटुम्ब रहता था।यह कुटुम्ब अपनी देशभक्ति के लिए प्रसिद्ध था। गांव के लोग इस कुटुम्ब का बड़ा आदर करते थे।

कुटुम्ब में तीन भाई थे--- सरदार किशन सिंह जी,सरदार स्वर्ण सिंह जी और सरदार अजीत सिंह जी। भारतविरोधी–हिन्दू विरोधी अंग्रेज सरकार ने तीनों भाईय़ों को देशभक्ति के अपराध में जेल भेज दिया था। इनमें से अजीत सिंह जी को काले पानी की सजा दी गई थी।

घर में किशन सिंह जी की मां जी और पत्नी को छोड़कर और कोई नहीं था।

1907 ई. के सितम्बर माह में किशन जी की पत्नी ने एक बालक को जन्म दिया । बालक देखने में शुन्दर था हष्टपुष्ट था ।

बालक के जन्म लेने से घर में हर्ष और उत्साह की लहर दौड़ पड़ी। गाना-बजाना होने लगा। गांव के लोग किशन सिंह जी की मां जी को बधाईयां देने आने लगे।

जिस समय किशन जी के घर में गाने बजाने का क्रम चल रहा था उसी समय वे जेल से छूटकर आ गये। उनके आने से हर्ष और उत्साह में पंख लग गये। किशन जी की मां की खुशी का तो कहना ही क्या था। मां तो खुशी के मारे फूली नहीं समा रही थी। मां जी के मुख से निकल पड़ा “ये लडका तो बड़े भागों वाला है । इसके पैदा होते ही इसके पिता जेल से छूट कर आ गये।”

किशन सिंह जी की मां ने इस बालक का नाम भगत सिंह रखा। यही बालक भगत सिंह वे अमर शहीद भगत सिंह जीb5 हैं, जिन्होंने अपनी देशभक्ति से मातृभूमि का मस्तक ऊँचा करने के लिए सर्वोत्तम वलिदान दिया था।

भगत सिंह का लालन-पालन बड़े प्यार से हुआ। घर में सब लोग उन्हें बहुत प्यार करते थे। ये चंचल बालक हमेशा हंसता रहता था।

भगत सिंह ज्यों-ज्यों उमर की सीढ़ियां चढ़ने लगे ,त्यों-त्यों उनकी सुन्दरता निखरने लगी, उनकी चंचलता में पंख लगने लगे। जब वे कुछ और बड़े हुए, तो संगी साथियों के साथ खेलने लगे।

बालक भगत सिंह साथियों को दो दलों में बाँट दिया करते थे और बीरता के खेल खेला करते थे।

भगत सिंह का कुटुम्ब बड़ा धार्मिक था। घर में भजन और कीर्तन प्राय प्रतिदिन हुआ करते था। बालक भगत सिंह बड़े प्रेम से भजन और कीर्तन सुना करते थे। उन्होंने सुन करके ही बहुत से गीत याद कर लिए थे। वे अपने पिता जी को बड़े प्रेम से गायत्री मन्त्र सुनाया करते थे।

एक दिन भगत सिंह के पिता जी अपने मित्र के घर गये। आनन्द किशोर जी बड़े देशभक्त थे। उन्होंने बालक भगत सिंह से पूछा “तुम कौन सा काम करते हो?”

बालक भगत सिंह ने उतर दिया “मैं बंदूकें बनाता हूं।”

आनन्द किशोर जी ने पुन: दूसरा प्रश्न किया “तुम बन्दूकें क्यों बनाते हो?”

बालक ने सहज भाव से उतर दिया “मैं बन्दूकों से भारत मांab1 को स्वतन्त्र करूँगा”

आनन्द किशोर बालक भगत सिंह के उतर से बड़े प्रसन्न हुए।उन्होंने उनके पिता से कहा “तुम बड़े भाग्यशाली हो। तुम्हारा यह पुत्र अपने साहस और अपनी बीरता से तुम्हारे पूर्बजों का नाम उज्जल करेगा।”

आनन्द किशोर जी की कही हुई बात सत्य सिद्ध हुई। भगत सिंह ने बड़े होकर अपने साहस और वीरता से सिर्फ अपने पूर्बजों का ही नहीं वल्कि सारे देश का मुख उज्जवल किया।

दूसरी वार बालक भगत सिंह अपने पिता के साथ खेत पर गये। खेत में हल चल रहा था।

बालक भगत सिंह ने अपने पिता से पूछा, “पिता जी ,यह क्या हो रहा है?”

पिता ने उतर दिया,“खेत में हल चला रहा है। खेत की जुताई हो रही है। जुताई के बाद खेत में गेहूं के बीज बोये जायेंगे।”

बालक भगत सिंह ने सहज भाव से कहा, “पिता जी आप पिस्तौलों और बन्दूकों की खेती क्यों नहीं करते, gunsआप गेहूं के बीज न वोकर, बन्दूकों के बीज क्यों नहीं बोते?”

पिता जी आश्चर्यचकित होकर बालक भगत सिंह के मुख की ओर देखने लगे। उन्हें क्या मालूम था कि उनका यह बालक बड़ा होने पर सचमुच बन्दूंकों की खेती करेगा। सचमुच बन्दूकों और पिस्तौलों pistolsके बल पर आक्रमणकारी अंग्रेज लुटेरों के अन्दर दहशत पैदा कर भारत माता की आजादी का नायक बनेगा।

जब भगत सिंह जी पाँच वर्ष के हुए, तो पढ़ने के लिए गाँव की प्राईमरी पाठशाला में विठाये गये। वे पढ़ने लिखने में बढ़े तेज थे। खेलों में भी उनकी बड़ी रूची थी। प्राईमरी की शिक्षा के बाद उनके पिता जी ने उनका नाम लाहौर के खालसा स्कूल में लिखवा दिया।फलत: वे पढ़ने के लिए लाहौर चले गये।

भगत सिंहBhagat_Singh_1929_thumb1 अधिक दिनों तक खालसा स्कूल में नहीं पढ़ सके। इसका कारण यह था कि स्कूल का बाताबरण विलकुल विदेशी था। लड़के अंग्रेजी बोलते थे और विदेशी ही पोशाक पहनते थे। खान-पान, रहन-सहन---सबकुछ अंग्रेजी ढ़ंग का था।

किशन सिंह जी को ये सब अच्छा नहीं लगता था क्योंकि वे देशभक्त थे, भारतीयता उनकी रग-रग में समाई हुई थी। वे नहीं चाहते कि विदेशी बाताबरण में उनका बच्चा भारतीय संस्कृति से दूर चला जाए।

अत: किशन जी ने भगत सिंह का नाम खालसा स्कूल से कटवाकर डी.ए.वी. स्कूल में लिखवा दिया। भगत सिंह ने डी. ए. वी. से ही दशवीं की कक्षा पास की। 1920ई. में गाँधी जी का असहयोग अन्दोलन चला। अहसहयोग अन्दोलन में अंग्रेजों के नियन्त्रण वाली सरकारी संसथाओं का वहिष्कार किया गया और जगह-जगह राष्ट्रीय स्कूल व कालेज खोले गए।

लाहौर में भी भाई परमानन्द जी के प्रयत्नों से नेशनल कालेज की स्थापना की गई। भाई जी ही उस कालेज की देखरेख करते थे।

नेसनल काले की स्थापना होने पर भगत सिंह ने डी.ए.वी. कालेज छोड़ दिया व नेशनल कालेज में एफ.ए. में नाम लिखवाकर पढ़ने लगे।

नेशनल कालेज में ही भगत सिंह जी का शुखदेव जीsukhdev-colour_thumb3

और

भगवती चरण जी Bhagwati_Charan_Vohra_thumb1 से परिचय हुआ। यह परिचय धीरे-धीरे घनिष्ठ मित्रता में बदल गया।वह मित्रता जीवनभर वनी रही।

एकवार कालेज में चन्द्रगुप्त नाटक खेला गया।उस नाटक में भगत सिंह ने शशिगुप्त अर्थात चन्द्रगुप्त का अभिनय किया था। उन्होंने उनके सैनिक जीवन से लेकर सम्राट होने तक का अभिनय इतनी खूबी के साथ किया कि दर्शक मुग्ध होकर रह गये। स्वयं भाई परमानन्द जी ने उनके अभिनय की प्रशंसा करते हुए कहा था “तुम एक दिन अवश्य अपना नाम ज्जवल करोगे।”

कालेज की पढ़ाई के दिनों में ही भगत सिंह के जीवन में एक ऐसी घटना घटी, जिसके कारण उनके जीवन के रंगमंच का पर्दा बदल गया।

भगत सिंह तो भाई थे । उनके दूसरे भाई का नाम जगत सिंह था। अल्पावस्था में ही जगत सिंह की मृत्यु हो गई। कुछ दिनों में घर के लोगमृत्यु के शोक को भूल गए और घर में नई बहार लाने के लिए भगत सिंह का विवाह करने की बात सोचने लगे।

किशन सिंह जी ने भगत सिंह का विवाह करने का निश्चय कर लिया।उन्होंने विवाह के लिए एक लड़की को भी देख लिया।

भगत सिंह उन दिनों बी. ए. पास कर चुके थे। उन्होंने बी. ए. पास करने से पहले ही देश की सेवा करने का ब्रत ले लिया था। उन्होंने निश्चय किया था कि वे अपने चाचा अजित सिंह की तरह आजीबन देश की सेवा करेंगे, भारत की स्वातन्त्रता के लिए संघर्ष करेंगे।

भगत सिंह को जब अपने विबाह की बात मालूम हुई तो उन्होंने अपने पिता जी को पत्र लिखा, “पिता जी, मैंनें चाचा अजित सिंह जी की तरह देश सेवा का ब्रत लिया है। यह प्रेरणा मुझे आप से ही मिली है। अत: कृपा करके आप मुझे विवाह के बन्धन में न बाँधें । मैं विबाह नहीं करना चाहता।”

भगत सिंह के पत्र ने उनके घर में खलबली पैदा कर दी। उनकी माँ और उनकी दादी बहुत दुखी हुईं। वे किसी तरह भगत सिंह को विबाह करने के लिए राजी करना चाहतीं थीं। क्योंकि भगत सिंह ही अब उस घर के जीवनावलम्ब थे। अत: वे उन्हें छोड़ना नहीं चाहती थीं, उन्हें शीघ्र से शीघ्र गृहस्थ जीवन में लाना चाहती थीं।

फलत: किशन जी ने भगत सिंह को पत्र लिखा ,“मैंनें तुम्हारा विवाह करने का निश्चय कर लिया है। विवाह के लिए लड़की भी पसन्द कर ली है। तुम्हें अपना निश्चय बदलकर मेरी बात माननी चाहिए। तुम्हारी माँ और तुम्हारी दादी की भी यही इच्छा है कि तुम विबाह करके गृहस्थ जीवन व्यतीत करो ।”

पिता का पत्र पाकर भगत सिंह संकट में पड़ गये-वे सोचने लगे, अब करें तो क्या करें? पिता जी की बात मानकर विबाह करें या भारत माँ की सेवा करने के अपने व्रत को पूरा करने के लिए मातृभूमि की स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष करें?

कई दिनों तक सोचने और विचार करने के बाद भगत सिंह जी ने निश्चय किया कि वे विबाह नहीं करेंगे, भारतमाता Bharat-man_thumb2की सेवा में ही अपना जीवन व्यतीत करेंगे।

भगत सिंह जी ने पिता जी को उतर दिया , “पिता जी मातामही मुझे पुकार रही है। मैंनें उसकी पुकार पर अपने जीवन की डोर उसके हाथ दे दी है। अत: मैं आपकी बात न मानने पर विवश हूँ। वाद-विवाद अधिक न बढ़े और मैं कठिनाई में न पड़ूं, इसलिए अब मैं लाहौर छोड़ रहा हूँ। कहाँ जाऊँगा-कुछ कह नहीं सकता।”

पिता जी को पत्र लिखने के बाद भगत सिंह जी ने लाहौर छोड़ दिया। वे दिल्ली चले गये। वे दिल्ली में दैनिक ‘अर्जुन’ में संवाददाता का काम करने लगे।

कुछ ही दिनों में भगत सिंह जी का मन दिल्ली से उचट गया। वे दिल्ली से कानपुर चले गये। वे कानपुर में सप्ताहिक ‘प्रताप, में काम करने लगे। उन्होंने अपना नाम बदलकर, बलबन्त रख लिया। वे इसी नाम से प्रताप में लेख लिखा करते थे। प्रताप के संपादक और सुप्रसिद्ध देशभक्त गणेश शंकर जी भगत सिंह जी को बड़ा स्नेह देते थे। वे उनकी सहायता तो करते ही थे, उन्हें प्रोतसाहन भी दिया करते थे।

‘प्रताप, में काम करते हुए भगत सिंह जी का कई क्रान्तिकारियों से परिचय हुआ। उनमें योगेश चन्द्र चटर्जी, वटुकेशवर दत्त और चन्द्रशेखर आजाद Chander Shekhar Azad jiमुख्य थे। धीरे-धीरे यह परिचय मित्रता के रूप में बदल गया। भगत सिंह जी उनके साथ मिलकर गुप्त रूप से क्रांतिकारी काम करने लगे।

इन्हीं दिनों गंगा में बाढ़ आई ।गंगा के किनारे के सैंकड़ों गांव डूब गये। जान-माल का बहुत अधिक नुकसान हुआ।

भगत सिंह ने अपने मित्रों के साथ बाढ़ पीढ़ितों की बड़ी सेवा और सहायता की उनकी सेवा पर कानपुर की जनता मुग्ध हो उठी और मुक्त कंठ से उनकी प्रशंसा करने लगी।

कुछ दुनों बाद गणेश शंकर विद्यार्थी ने एक राष्ट्रीय विद्यालय की स्थापना की। उन्होंने सरदार भगत सिंह को उस विद्यालय का मुख्य अध्यापक नियुक्त किया। वे अब अध्यपान कार्य करने लगे।

इन्हीं दिनों किसी तरह किशन सिंह जी को सरदार भगत सिंह जी का पता मालूम हो गया। उन्होंने उन्हें तार देकर सूचित किया “तुम्हारी माँ मरणासन है तार पाते ही शीघ्र घर चले आओ।”

तार पाने पर भगत सिंह अपने आप को रोक नहीं सके। वे नौकरी छोड़कर घर चले गये। उन्होंने अपनी मां की तन-मन से सेवा की। माँ तो अच्छी हो गई, पर भगत सिंह पुन: लौटकर कनपुर नहीं जा सके। उनकी दादी और उनकी मां ने उन्हें रोक लिया।

भगत सिंह अपनी दादी और माँ की बात मानकर घर पर रूक तो गये पर उनका मन नहीं लगता था। वे बराबर सोच-विचार में पड़े रहते थे। वे सोचते थे कि कहीं घर के लोग विवाह के लिए उन से दोवारा हठ न करें। अगर ऐसा किया तो क्या वे उनकी बात मान लेंगे? नहीं कदापि नहीं। वे विवाह वन्धन में नहीं बँधेंगे। उन्होंने भारत माँ की सेवा का जो व्रत धारण किया है,वे उसे अवश्य पूरा करेंगे।

भगत सिंह को कानपुर के अपने मित्रों की भी याद आया करती थी। वे सोचा करते थे,वे लोग तो गुलामी की जेंजीरों को तोड़ने के लिए क्रान्ति की आग जलाने में लगे होंगे और मैं यहां माँ व दादी के मोह में पड़कर घर में रह रहा हूँ।

भगत सिंह जी राजनीति और इतिहास के विद्यार्थी थे । उन्होंने 1857 की स्वतन्त्रता के युद्ध के वीरों की कहानियां पढ़ी थीं। वे रास बिहारी बोस, भाई बालमुकुन्द, अबध बिहारी और वीर सावरकर जी की जीबन कथाओं से भी परिचित थे। वे इन घटनाओं को भी जानते थे कि रास विहारी वोस ने सारे भारत में एक साथ ही क्रान्ति की आग जलाने की योजना बनाई थी। उन्होंने फौजियों के ह्रदय में क्रान्ति के बीज वोय थे।

भगत सिंह जी को इन सभी घटनाओं से प्रेरणा मिलती थी। इस प्रेरणा के फलस्वारूप उनके मन का यह संकल्प दृढ़ होता जा रहा था कि वे गुलामी की जंजीरों को तोड़ने में ही अपना सारा जीवन लगायेंगे व विवाह कदापि नहीं करेंगे।

भगत सिंह की मां और दादी का कहना था कि वे पंजाब से बाहर ना जायें । उन्होंने उनकी यह बात मान ली ।उन्होंने ने निश्चय किया कि कोई बात नहीं हम पंजाब में रहकर ही क्रान्ति की आग जलायेंगे।

उन दिनों अकालियों का गूरूबाग सत्याग्रह चल रहा था। रोज ही स्वंसेवकों का जत्था जुलूस बनाकर निकलता और अपने को गिफ्तार कराता था। उस सत्यग्रह को लेकर सारे पंजाब में उतेजना फैली हुई थी। भारतविरोधी सरकार का दमन चक्र भी जोरों से चल रहा था। एक दिन सत्याग्रहियों का जत्था भगत सिंह जी के गाँव से होकर जाने वाला था। उन्होंने उस जत्थे के स्वागत के लिए बड़ी धूम-धाम से से तैयारी की थी। उन्होंने गांव के अन्य युवकों के मन में भी उत्साह के बीज बोये थे।

सत्याग्रहियों का जत्था गाँव में पहुँचा, तो उन्हें फूल मालायें पहनाई गईं, उन्हें खाना खिलाया गया,उन्हें वस्त्र प्रदान किये गये और नकद रूपए भी दिए गये। गांव के कुछ युवक सत्याग्रहियों के साथ हो लिए,पर स्वंय भगत सिंह सत्याग्रहियों के साथ नहीं गये, क्योंकि उनके सामने केवल अकालियों का प्रश्न नहीं था। उनके सामने प्रश्न था सारे हिन्दूस्थान की आजादी का। वे हिन्दू-सिख अवश्य थे फर वे सब भारतवासियों को अपना मानते थे। वे गुरूद्वारे के साथ ही मन्दिर का भी आदर करते थे।

यद्यपि भगत सिंह अकाली अन्दोलन के सत्याग्रह में कभी सामिल नहीं हुए थे, पर उन्होंने उस दमन की जोरों के साथ निन्दा की जो अंग्रेजी भारतविरोधी सरकार की ओर से हो रहा था।

भगत सिंह जी का मन आकुल रहता था। वे शीध्रताशीघ्र क्रांतिकारी दल में सम्मिलित होना चाहते थे, भारत माँ की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के प्रयत्न में लगना चाहते थे।

उन दिनों बंगाल,उतर प्रदेश और पंजाब में नये सिरे से क्रांतिकारियों के दल का संगठन गुप्त रूप से हो रहा था। लाहौर में भी कुछ क्रान्तिकारी पहुँचे थे और दल को सुदृढ़ बनाने में लगे हुए थे।

संयोग की ही बात थी कि भगत सिंह जी का परिचय क्रान्तिकारी दल के एक सदस्य से हो गया,दल में सम्लिलित होने का उन्हें सुयोग प्राप्त हो गया।

दोपहर का समय था। भगत सिंह दल के अध्यक्ष की सेवा में उपस्थित हुए।

दल के अध्यक्ष ने भगत सिंह से प्रश्न किया, “तुम कौन हो? यहां क्यों आए हो?” भगत सिंह ने तर दिया “मेरा नाम भगत सिंह है मैं भारत माँ की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए क्रान्तिकारी दल में सम्मिलित होना चाहता हूँ।”

अध्यक्ष ने भगत सिंह की ओर देखते हुए कहा , “क्या तुम इस बात से परिचित हो कि क्रांतिकारी दल में सम्मिलित होने का अर्थ है, मृत्यु से खेलना, भयानक से भयानक कष्टों को सहन करना ?”

भगत सिंह ने निर्भीकता से उतर दिया,“मैं जानता हूँ-अच्छी तरह जानता हूँ। मैं गुलामी की जेजीरों को तोड़ने के लिए तैयार हूँ, भयानक से भयानक कष्टों को सहन करने के लिए उद्यत हूँ। ”

अध्यक्ष ने पुन: कहा, “क्या तुम अपने माता पिता से पूछ कर आए हो?”

भगत सिंह ने उतर दिया, “मैं इसकी आवश्यकता नहीं समझता। मैं माता-पिता, कुटुम्बियों और घर द्वार से भारत माता को सर्वोपरि मानता हूँ। वह सबकी माँ है हम सबकी माँ है। मैं उसे स्वतन्त्र करवाने के लिए अपना जीवन बलिदान कर दूँगा।”

अध्यक्ष से सोचते हुए कहा, “दल में सम्मिलित होने से पूर्व तुम्हें परीक्षा देनी होगी।”

भगत सिंह वोल उठे, “किस बात की परीक्षा ?”

अध्यक्ष ने कहा,“अपनी वीरता की,अपने कष्ट सहन की।”

भगत सिंह ने उतर दिया, “मैं तैयार हूँ। जरा अपना पैर आगे बढ़ाईए।”

अध्यक्ष ने अपना पैर आगे बढ़ा दिया। भगत सिंह ने उनके पैर पर अपना पैर रखकर भाले से चोट की, भाले की नोक भगत सिंह के पैर को पार करती हुई अध्यक्ष के पैर में घुस गई।

अध्यक्ष दर्द से कराह उठे। भगत सिंह ने भाले को फैंकते हुए कहा, “आप तो दर्द से कराह उठे,पर मुझे तो कुछ भी नहीं मालूम हो रहा है,जबकि चोट मुझे अधिक लगी है।”

अध्यक्ष भगत सिंह की वीरता और दृढ़ता पर मुग्ध हो उठे। उन्होंने भगत सिंह को दल में सम्मिलित करते हुए कहा, “मैं तुम्हें सरदार की उपाधी दे रहा हूँ।”

वस उसी दिन से भगत सिंह के नाम के आगे सरदार जुड़ गया और वे सरदार सिंह कहे जाने लगे।

भगत सिंह के पैर में भाले की चोट का निशान आजीवन वना रहा। वे अपने मित्रों को उस निशान को दिखाकर उस घटना की बार-बार चर्चा किया करते थे।

भगत सिंह क्रंतिकारी दल में सम्मिलित होकर क्रन्ति के लिए काम करने लगे। उन्होंने अनुभव किया कि जब तक कोई संस्था स्थापित न की जायगी,काम सुचारू रूप से नहीं हो सकेगा।

फलत: भगत सिंह ने अपने मित्रों के सहयोग से युबकों की एक संस्था स्थापित की जिसका नाम नौजवान भारत सभा रखा गया। उसकी मासिक सदस्यता की फीस केवल चार आने थी। प्रवेश फीस एक रूपया थी।

1924 ई. के सर्दियों के दिन थे। लायलपुर नगर के बाहर मैदान में बहुत से खेमे गड़े हुए थे। एक सुसज्जित पंडाल के भीतर बहुत से युवक बैठे थे। पंडाल के उपर केशरी झंडा फहरा रहा था। पंडाल में एक ओर मंच बना हुआ था,जिस पर कुछ लोग बैठे थे। उनमें सरदार भगत सिंह जी भी थे।

यह आयोजन नौजवान भारत सभा की ओर से था। सभा का एक अधिवेशन हो रहा था। अधिवेशन में पंजाब के बहुत से युवक सम्मिलित हुए थे।

सरदार भगत सिंह जी मंच पर बोलने के लिए खड़े हुए थे। उन्होंने अपने भाषण में महाराणा प्रताप जी, छत्रपति शिवा जी और गुरू गोविन्द सिंह जी की याद दिलाई। उन्होंने भारत की गरीबी का वर्णन करते हुए अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर किए जा रहे अत्याचारों का वर्णन किया। उन्होंने भारत माँ की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए जुवकों का आह्वान किया। उन्होंने कहा “युवक आगे बढ़ें और इस आक्रमणकारी, अत्याचारी अंग्रेजी शासन का अन्त करके भारत को स्वतंत्र करें। ”

भगत सिंह के भाषण का युवकों पर बड़ा प्रभाव पड़ा उन्होंने ‘हम तैयार हैं’ ‘हम तैयार हैं’ के नारे लगाकर भगत सिंह जी का स्वागत किया।

भगत सिंह जी ने पुन: कहा, “जो जुवक नौजवान भारत सभा में सामिल होना चाहते हैं, उन्हें प्रतिज्ञा पत्र पर रक्त से हस्ताक्षर करने होंगे।”

सर्वप्रथम भगत सिंह ,सुखदेव और भगवतीचरण ने अपने रक्त से प्रतिज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर किए। उसके बाद सैंकड़ों युवक वारी-वारी से आगे बढ़े और उन्होंने अपने रक्त से प्रतिज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर किए।

हजारों लोग नौजवान भारत सभा के सदस्य हो गए। देखते ही देखते हजारों रूपए इकट्ठे हो गए। पंडाल ‘भारत माँ की जय’ के नारों से गूँज उठा।

अधिवेशन के बाद युवक गाँव-गाँव फैल गए, लोगों को नौजवान भारत सभा का सदस्य बनाने लगे। अंग्रेजी शासन का अन्त करने के लिए उनमें उत्साह और जोश पैदा करने लगे।

भारतविरोधी सरकार के कान खड़े हो गये। उसने सोचा कहीं ऐसा न हो कि, सारे पंजाब में विप्लव की हवा फैल जाए और उसके लिए बहुत बड़ा सिरदर्द बन जाए।

भारतविरोधी सरकार ने यह भी अनुभव किया कि इस काम के पीछे भगत सिंह जी का हाथ है। अत: भगत सिंह जी भारतविरोधी सरकार की आँखों में खटकने लगे। भारतविरोधी सरकार की ओर से उन्हें बन्दी बनाने का षड्यन्त्र किया जाने लगा।

भगत सिंह जी के पीछे जासूस लग गये।वे जहाँ भी जाते थे जासूस उनका पीछा किया करते थे।

गिरफ्तारी की खबर जब जोरों से उड़ी, तो मित्रों और हितैषियों ने सलाह दी कि वे कुछ दिनों के लिए पंजाब से वाहर चले जाएँ।

अत : भगत सिंह जी कानपुर चले गये, लेकिन वे कानपुर में भी ज्यादा दिन नहीं रह सके क्योंकि कानपुर में भी जासूस उनके पीछे लगे रहते थे। उन्हें डर था कि कहीं उनके कारण उनके मित्र संकट में न पड़ जायेँ।

उन दिनों बेलगाँव में कांग्रेस का अधिवेशन हो रहा था। अत : भगत सिंह कानपुर से वेलगाँव चले गये।

अधिवेशन समाप्त होने पर भगत सिंह इधर-उधर घूमते रहे। फिर लाहौर चले गये। लाहौर में अकाली पत्र का सम्पादन करने लगे।

भगत सिंह ने अकाली पत्र में अंग्रेजी शासन के विरूद्ध कई लेख लिखे। उन्होंने फाँसी पर चढ़े हुए क्रान्तिकारियों की प्रशंसा की।

उन लेखों के कारण भगत सिंह जी को गिफ्तार कर लिया गया। उन पर अभियोग साबित न होने पर उन्हें छ : हजार रूपए की जमानत पर छोड़ दिया गया।

भगत सिंह जी छूटने के बाद फिर क्रन्तिकारी कामों में लग गये।

1925 ई. के दशहरा का दिन था। लाहौर में बड़ी धूम-धाम से राम-लीला का जुलूस निकल रहा था। मर्यदापुर्षोत्तम भगवान श्री रामचन्द्र जी की सवारी भगवान राम जी की जय के नारों के साथ मुख्य सड़कों से होती हुई आगे बढ़ रही थी।लाखों भक्तों की भीड़ थी।

जुलूस जब अनारकली में पहुँचा, तो बड़े जोर का धमाका हुआ। किसी ने जुलूस पर बम फैंक दिया था।

जुलूस में किसी की मृत्यु तो नहीं हुई लेकिन कुछ लोग घायल अवश्य हो गए थे।

भारतविरोधी सरकार की आँखों में पहले से खटक रहे भगत सिंह जी को फंसाने का मानो भारतविरोधी अंग्रेज सरकार को बहाना मिल गया हो। अत: उसने बम फैंकने का अपराध भगत सिंह जी पर लगाकर उन्हें उनके मित्रों के साथ गिरफ्तार कर लिया।

अदालत में भगत सिंह और उनके मित्रों पर मुकद्दमा चलाया गया, पर प्रमाण नहीं मिल सके।

अत: भारतविरोधी सरकार को मजबूर होकर भगत सिंह जी को छ: हजार की जमानत पर छोड़ना पड़ा।

छूटने पर भगत सिंह जी फिर क्रान्ति की आग जलाने लगे, फिर विप्लव-सबन्धी काम करने लगे।

1925 ई. की 8वीं अगस्त को सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में काकोरी में ट्रेन लूटी गई थी। उनके साथ चन्द्रशेखर आजाद जी, अश्फाक उल्ला जी और राजेन्द्र लाहिड़ी आदि क्रांतिकारी भी थे।

भेद खुलने पर सभी लोग एक एक कर गिफ्तार कर लिए गए और अलग-अलग जेलों में बन्द कर दिए गए। केवल चन्द्रशेखर आजाद गिरफ्तार नहीं किए जा सके थे। वे फरार होकर छिप गए थे।

बन्दी क्रान्तिकारियों पर लगभग दो वर्ष तक मुकद्दमा चलाया गया। उन्हें बचाने का भरसक प्रयत्न किया गया, परन्तु वे बच नहीं सके। उन्हें फांसी की सजा दी गई। वे जेलों में ही शूली पर चढ़ा दिए गए।

1927 ई. में जब 9 अगस्त का दिन आया तो सारे देश में शहीदी दिवश मनाया गया। जगह-जगह सभायें की गईं और जुलूस निकाले गये।

लाहौर में ब्रेडला हाल में भी शहीदी दिवश मनाया गया। विद्यार्थियों की ओर से एक सभा का आयोजन किया गया। सभा में भगत सिंह ने भाषण दिया। उन्होंने भाषण में शहीदों की जीवन गाथाओं पर प्रकाश चाला और उनकी वीरता की भूरी-भूरी प्रशंसा की।

भगत सिंह जी के भाषण का विद्यार्थियों पर बड़ा प्रभाव पड़ा ,पर उस भाषण के बाद वे फिर भारतविरोधी अंग्रेज सरकार की नजरों में गड़ने लगे। उनपर निगाह रखी जाने लगी।

भारतविरोधी सरकार ने भगत सिंह जी का भेद जानने के लिए अपने कई जासूसों को भारत नौजवान सभा का मेम्वर बना दिया।

जासूस प्रतिदिन नौजवान भारत सभा के दफ्तर में जाने लगे और गुप्त रूप से भगत सिंह की गतिविधियों का पता लगाने लगे।

किसी तरह भगत सिंह को यह बात मालूम हो गई कि उनकी बैठकों में कुछ सरकारी जासूस भी सम्मिलित होते हैं। उन्होंने उनसे अपना पीछा छुड़ाने के लिए एक उपाय सोचा।

एक दिन सभी सदस्य दफ्तर में इकट्ठे हुए थे, तो भगत सिंह ने कहा, “आजादी के लिए हममें कष्ट सहन की शक्ति है या नहीं ---आज इसकी परीक्षा ली जाएगी। मैं 5-6 मोमबतियाँ जला रहा हूँ। सबको बारी-बारी से जलती हुई मोमबतियों पर अपना हाथ रखना होगा।”

भगत सिंह ने 5-6 मोमबतियाँ जलाकर एक मेज पर रख दी और सबको एक में मिला दिया। मिलाने से एक अच्छी लपट मोमबतियों से निकलने लगी।

भगत सिंह ने कहा,“सबसे पहले मैं अपना हाथ जलती हुई मोमबतियों की लपट पर रख रहा हूँ।” और उन्होंने अपना दाहिना हाथ लपट के उपर रख दिया। उपर का चमड़ा जल गया,मांस दिखी देने लगा,पर भगत सिंह ने अपने हाथ को नहीं हटाया।

आखिर भगत सिंह के मित्रों ने उन्हें खींचकर अलग किया। उनकी आत्मदृढ़ता को देखकर सभी विस्मित हो गए। गद्दार जासूसों के तो प्राण निकल गए। इन गद्दारों ने उसी दिन से नौजवान भारत सभा के दफ्तर में जाना छोड़ दिया। भगत सिंह ने राहत की साँस ली। उन्होंने ने सोचा, हाथ जला,पर जासूसों से पिंड तो छूट गया।

काकोरी की ट्रेन डकैती के बाद क्राँतिकारियों का दल टूट गया। कुछ लोग तो फांसी पर चढ़ा दिए गय और कुछ लोग छिप गए। क्राँति की आग बुझी तो नहीं पर बहुत ही मन्द पड़ गई।

चारों ओर निराशा छा गई। जो जहां था वहीं छिप कर बैठ गया और दूसरे-दूसरे कामों में लग गया।

भगत सिंह भी बहुत निराश हुए। यद्यपि उनकी नौजवान भारत सभा का काम-काज चल रहा था,पर उनका मन नहीं लग रहा था। अत : वे लाहौर छोड़कर शाहंशाह चक गांव मे चले गए और वहीं रहने लगे।

भगत सिंह जी ने निराशा के गम को भुलाने के लिए एक डेरी फार्म खोला। पर उनका यह डेरी फार्म अधिक दिनों तक नहीं चला क्योंकि उनका मन तो कहीं दूसरी ओर लगा रहता था। उन्हें डेरी फार्म में अधिक नुकशान उठाना पड़ा अत : कुछ ही दिनों के बाद उन्होंने उसे बन्द कर दिया।

चक ग्राम में रहते हुए भगत सिंह अधिक चिन्तित रहा करते थे। वे बटुकेश्वर दत्त और चन्द्रशेखर आजाद के बारे में बराबर सोचविचार किया करते थे। वे सोचा करते थे कि दत्त न जाने कहाँ होंगे और न जाने कहाँ होंगे आजाद। वे जहां भी होंगे क्राँति के लिए अवश्य प्रयत्न करते होंगे क्योंकि वे वीर हैं, साहसी हैं और आत्मत्यागी हैं, पर अकले-अकेले काम करने से क्रांति कैसे हो सकती है ? क्राँति के लिए तो सुदृढ़ संस्था की आवश्यकता है ।जब तक लोग एक साथ नहीं मिलेंगे, संघ-बद्ध होकर काम नहीं करेंगे,तबतक क्रँति के मार्ग पर सफलता नहीं मिल सकती, पर सब लोग एक साथ मिलें तो कैसे मिलें ? इस समय सभी लोग विखरे हुए हैं, किसी को किसी का पता नहीं। तो क्या,मैं चुपचाप चक ग्राम में बैठा रहूँ?मैं बटुकेश्वर दत्त और आजाद को ढूँढूँगा। उनसे मिलकर क्राँतिकारियों की एक मजबूत संस्था बनाने का प्रयत्न करूँगा।

भगत सिंह गाँव से निकल पड़े। वे कानपुर,लखनऊ और बनारस में आजाद को ढूँढते हुए झाँसी पहुँचे। झाँसी में उन्हें आजाद मिल गए। वे उन दिनों गुप्त रूप में झाँसी में ही रहते थे।

दत्त भी झाँसी पहुँच गए थे। दत्त और आजाद को पाकर भगत सिंह को जो प्रसन्नता हुई उसका वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता ।

दत्त, आजाद और भगत सिंह के प्रयत्नों से दूसरे क्राँतिकारी भी झाँसी पहुँच गए। सबने आपस में राय—सलाह करके एक अखिल भारतीय क्राँतिकारिणी संस्था बनाने का निश्चय किया और यह निश्चय किया कि सभी लोग आपस में मिल जायेँ,स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए योजनाबद्ध काम करें।

1927 के दिन थे। सभी क्रांतिकारी दिल्ली के पुराने किले में एकत्र हुए। एक मजबूत संस्था बनाने के लिए विचार-विमर्श होने लगा।

लगभग दो-तीन घंटे तक तर्क-वितर्क और वाद-विवाद चलता रहा। अंत में एक नई संस्था बनाई गई जिसका नाम हिन्दुस्तान सोशलिशस्ट रिपब्लिकन आर्मी रखा गया।

भगत सिंह को प्रचार का काम सौंपा गया था। चन्द्रशेखर आजाद के जिम्मे धन और शस्त्र-संग्रह का काम था।

आर्मी का दफ्तर पहले झाँसी में खोला गया था,उसके बाद किराये का मकान लेकर आगरा ले जाया गया।

संस्था के पास धन की कमी थी। अत: आर्मी के दफ्तर में रहने वाले क्राँतिकारियों को बड़े कष्ट उठाने पड़ते थे।

उन दिनों प्राय सभी क्रांतिकारी आगरे में ही रहते थे। भगत सिंह भी आर्मी के दफ्तर में ही निवाश करते थे। कभी खाना भरपेट मिलता था तो कभी आधे पेट खा करके ही रह जाना पड़ता था। भेद खुल न जाए---इसलिए बहुत बचकर रहना पड़ता था।

उन दिनों क्रांतिकारियों को जो कष्ट उठाने पड़े उनकी स्मृति मात्र से ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

भगत सिंह ने अब तक बड़े आराम से जीवन व्यतीत किया था,पर उन्होंने अब देश की आजादी के लिए उन कष्टों को सहन किया। उनके एक मित्र ने उनके कष्ट सहन की चर्चा करते हुए लिखा है, “भगत सिंह भूखे रह जाते थे,पर खाना नहीं माँगते थे। वे अपनी भूख से कहीं अधिक दूसरों की भूख की चिन्ता करते थे।”

संसार की पहली लड़ाई में काँग्रेसी नेताओं ने भारतविरोधी अंग्रेज सरकार की धन-जन से बड़ी सहायता की थी। बजह थी भारतविरोधी सरकार द्वारा इन नेताओं से किया गया वो बायदा जिसके अनुसार इस लड़ाई में अंग्रेजों के जीतने की स्थिति में सता इन कांग्रेसी नेताओं को सौंपी जानी थी।

परन्तु लड़ाई में जीत हो जाने के बाद दुराचारी अंग्रेज अपनी फितरत के अनुशार बायदे से मुकर गए। इन अत्याचारी अंग्रेजों ने भारतीयों को उनके अधिकार देने के बजाए एक कमीशन नियुक्त किया,जिसके अध्यक्ष साइमन था। इसीलिए उस कमीशन को साइमन कमीशन कहा जाता है।

साइमन कमीशन में कुल सात सदस्य थे। राक्षसों की भारतविरोधी ब्रिटिश सरकार ने पहले कहा था कि कमीशन में आधे सदस्य भारतीय होंगे लेकिन एकवार फिर अपनी नीचता दिखाते हुए अत्यचारी भारतविरोधी अंग्रेज सरकार ने एक भी सदस्य भारतीय नहीं रखा वल्कि सबके सब विदेशी अंग्रेज सदस्य नियुक्त किए।

परिणामस्वारूप भारत में कमीशन के विरूद्ध बड़ा रोष फैला। काँग्रेस ने एक प्रस्ताब पास कर निर्णय किया कि कमीशन का बहिष्कार किया जाए।

1928 ई. में ये कमीशन भारत आया । ये कमीशन भारत में जहां भी जाता वहाँ पर इसका वहिष्कार किया जाता। सभायें की जाती, जुलूस निकाले जाते थे और साइमन कमीशन लौट जाओ के नारे लगाए जाते थे।

30 अक्तूवर को साइमन कमीशन लाहौर के स्टेशन पर उतरा। उसका बहिष्कार करने के लिए लाखों नर-नारी लाला लाजपतराय जी के नेतृत्व में स्टेशन के बाहर एकत्र हुए। उनके हाथों में काले झंडे थे। वे गगनभेदी नारे लगा रहे थे—साइमन कमीशन लौट जाओ, साइमन कमीशन लौट जाओ...

गुलाम पुलिस के घुड़सवारों ने जुलूस को आगे बढ़ने से रोक दिया। गगनभेदी नारों को सुनकर गुलाम पुलिस अपनी योजनानुशार डंडे लेकर लोगों पर टूट पड़ी।

कितने ही निर्दोष घायल हो गए,कितने ही गिर पड़े। चीख-पुकार मच गई,भगदड़ होने लगी।

एक अंग्रेज ने आगे बढ़कर लाला जी पर डंडे से वार किया।डंडा लाला जी की छाती में लगा और वे गिर पड़े, मूर्छित हो गए।

लाला जी को उठाकर अस्पताल ले जाया गया। उन्हें बचाने के सब प्रयत्न असफल हो गए। वे 27 नवम्बर को संसार से चलबसे।

लाला जी की मृत्यु का शोक सारे देश में फैल गया, युबकों के ह्रदय में तेजना की लैहर दौड़ पड़ी। आर्मी के सदस्यों का खून खौल उठा। उन्होंने निश्चय किया कि लाला जी की मृत्यु का बदला लिया जाएगा।

लाहौर में ही आर्मी के सदस्यों की बैठक बुलाई गई। विचार-विमर्श होने लगा। सभी सदस्य इस बात पर सहमत थे कि लाल जी की मृत्यु का बदला अंग्रेज स्काट और सैंडरस को मारकर लेना चाहिए क्योंकि ये ही लोग लाला जी की मृत्यु के जिम्मेदार थे। सैंडर्स और स्काट की हत्या का काम जिन तीन वीर क्रांतिकारियों ने अपने हाथों में लिया। उनके नाम थे---भगत सिंह, राजगुरू और चन्द्रशेखर आजाद।

भगत सिंह, राजगुरू और चन्द्रशेखर---तीनों वीरों ने सैंडर्स को मारने की योजना बनाई। पहले उनकी योजना थी कि, वे सैंडर्स को मारकर गुलाम पुलिस से लड़ते हुए अपनी जान देंगे, पर यह योजना सफल न हो सकी। उन्होंने सैंडर्स की हत्या तो की पर उन्हें गुलाम पुलिस से लड़ने का अवसर प्राप्त नहीं हुआ।

27 दिसम्बर का दिन था । चार बज रहे थे। सैंडर्स अपने दफ्तर से बाहर निकला और जाने के लिए मोटर साईकल पर सवार हुआ। उसने ज्यों ही मोटरसाइकिल स्टार्ट की, धाँय-धाँय,धाँय करके तीन गोलियां चली।

गोलियाँ सैंडर्स के सीने को पार कर गईं। सैंडर्स घटनास्थल पर गिरकर प्राणसून्य हो गया। गोलियां स्वयं भगत सिंह जी ने चलाई थीं।

गोलियों की आबाज सुनकर फर्न बाहर निकला। राजरगुरू ने उसपर पिस्तौल तान दी। वह डरकर फिर दफ्तर में भाग गया।

गद्दार सेकुलर कानस्टेवल चानान सिंह ने भगत सिंह जी का पीछा किया ,पर राजगुरू ने उसका भी काम-तमाम कर दिया।

चारों ओर सन्नाटा छा गया। भगत सिंह, राजगुरू और चन्द्रशेखर---तीनों वीर दौड़ते हुए डी. ए. वी. कालेज के छात्रास में घुस गए। कुछ देर तक वहां रूके रहे, फिर साइकल पर बैठकर अपने-अपने निवास स्थान पर चले गए।

उनके चले जाने पर गुलाम पुलिस दल ने चारों ओर से छात्रावास को घेर लिया। हर एक कमरे की तलासी ली गई पर कोई सुराग न मिला।

इसके बाद तो सारे लाहौर नगर में गुलाम पुलिस छा गई। जगह-जगह तलाशियां होने लगीं, छापे मारे जाने लगे। हर चौराहे और हर नुक्कड़ पर गुलाम पुलिस तैनात कर दी गई। हर एक मोटर और हर एक ताँगे की तलासी ली जाने लगी। होटलों और धर्मशालाओं को भी नहीं छोड़ा गया।

स्टेशन पर भी खुफिया गुलाम पुलिस तैनात कर दी गई। जो भी आदमी पुलिस स्टेशन जाता था उससे पूछताछ की जाती थी।

बिना पूछ-ताछ किए किसी को रेल में चढ़ने नहीं दिया जाता था। इस तरह भगत सिंह, राजगुरू और चन्द्रशेखर आजाद को गिरफतार करने के लिए गुलाम पुलिस एड़ी-चोटी का पसीना एक करने लगी फिर भी वे तीनों क्राँतिकारी वीर गुलाम पुलिस के हाथ नहीं लगे, नहीं लगे।

भगत सिंह, राजगुरू और चन्द्रशेखर लाहौर में रूकना नहीं चाहते थे क्योंकि लाहौर में चारों तरफ गुलाम पुलिस का जाल विछ चुका था। यद्यपि ये तीनों न गिरफ्तारी से डरते थे और न मृत्यु से ,फिर भी वे गुलाम पुलिस के फंदे में फंसना नहीं चाहते थे। उनके सामने देश की आजादी का प्रश्न था। वे देश को आजाद करवाने के लिए अभी जेल से बाहर रहना चाहते थे। अत: वे लाहौर से बाहर निकल जाने के लिए उपाय सोचने लगे।

आखिर भगत सिंह ने अपने मित्रों से उपाय करके एक उपाय ढूँढ निकाला ।उनका यह उपाय बहुत साहसी और विस्मयजनक था।

लाहौर स्टेशन के प्लेटफार्म पर कलकता जाने के लिए गाड़ी तैयार थी। स्टेशन के बाहर एक अमेरिकन कार पहुँची। कार में से एक साहब अपनी मेम और अर्दली के साथ निचे उतरे। साहब और मेम देखने में विल्कुल अमेरिकन की तरह मालूम हो रहे थे। अर्दली, अर्दली के वेश में था।

गुलाम पुलिस इन्स्पेक्टर सामने ही खड़ा था। वह सलाम करके सामने से हट गया।

साहब अपनी मेम और अर्दली के साथ फर्स्ट क्लास के डिब्बे में घुस गए। अर्दली उन्हें फर्स्ट कलास के डिब्बे में बिठाकर स्वयं सेकेण्ड क्लास में चला गया।

गाड़ी सीटी देकर चल पड़ी।

अमेरिकन साहब के वेश में स्वयं भगत सिंह जी थे। मेम का वेश दुर्गा भाभी ने धारण किया था। अर्दली राजगुरू बने थे।

इस तरह भगत सिंह गुलाम पुलिस की आँखों में धूल झोंककर राजगुरू के साथ लाहौर से निकल गए। रास्ते में दो-तीन दिनों तक अमृतसर में रूके रहे,उसके बाद कलकता चले गए। चन्द्रशेखर आजाद जी भी तीर्थयात्री के वेश में गुलाम पुलिस को चकमा देकर लाहौर से बाहर निकल गए।

भगत सिंह जी जब कलकता पहुँचे तब कहीं जाकर गुलाम पुलिस को पता चला कि पक्षी पिंजरे से उड़ गया।

भगत सिंह जी के कलकता पहुँचने पर बंगाल के क्रांतिकारियों में हर्ष की लहर दौड़ पड़ी। उन्होंने बड़े आदर के साथ कलकता में उनके रहने का प्रबन्ध किया।

भगत सिंह और राजगुरू कलकता में रहकर विपल्व की आग जलाने लगे। क्राँति के लिए गुप्त रूप से प्रयत्न करने लगे। पर बंगाल के क्रांतिकारी उनके दल में सामिल होने के लिए तैयार नहीं हुए। वे अलग रहकर ही स्वतन्त्रता के लिए प्रयत्न करना चाहते थे।

कलकता में रहते हुए भगत सिंह जी ने महसूस किया कि बंगाल के क्राँतिकारियों के पास बम है। पर पंजाब और उतर प्रदेश के क्राँतिकारियों के पास बम नहीं है। अत: वे किसी एसे आदमी की तलाश करने लगे,जो बम बनाना जानता हो और जो उतर प्रदेश तथा पंजाब के क्राँतिकारियों को बम बनाना सिखा सके।

बड़ी कठिनाईयों के बाद भगत सिंह जी को एक ऐसा आदमी मिल गया। पहले तो बह पंजाब और उतर प्रदेश के क्रान्तिकतारियों को बम बनाना सिखाने के लिए तैयार नहीं हुए लेकिन भगत सिंह जी द्वारा बहुत आग्रह करने पर बह बम बनाना सिखाने के लिए तैयार हो गया।

भगत सिंह उसे साथ लेकर राजगुरू के साथ आगरा चले गए। पहले बम बनाने का कारखाना आगरा में खोला गया और फिर उसके बाद लाहौर में भी खोला गया।

क्रान्तिकारियों को अब धन की कमी नहीं थी। भगत सिंह ने सैंडर्स की हत्या करने में जो वीरता दिखाई थी उससे उनका नाम जनता में चारों ओर फैल चुका था। क्रान्तिकारियों की वीरता और उनके साहस पर जनता मुग्ध हो चुकी थी। अत :

वे जिससे भी पैसा मांगते थे मिल जाता था। बड़े-बड़े व्यापारी उन्हें चन्दा दिया करते थे।

क्रान्तिकारियों का काम अब बड़े जोरों के साथ चलने लगा। रोज कुछ न कुछ होता ही रहता था। आज इस नगर में बम धमाका हुआ तो कल उस नगर में । भारतविरोधी अंग्रेज सरकार के कान खड़े हो गए और वह हाथ धोकर क्रान्तिकारियों के पीछे पड़ गई।

1929 के दिन थे । मुम्बई में मिल मालिकों और मजदूरों का झगड़ा चल रहा था। साम्यवादी मजदूरों की सहायता कर रहे थे और भारतविरोधी सरकार लाठियों तथा गोलियों से मजदूरों को दबा रही थी।

भारतविरोधी सरकार मजदूरों और किसानों को उभरना नहीं देना चाहती थी। उसे डर था कि अगर कहीं मजदूरों और किसानों में क्रान्ति की लहर फैल गई तो उन्हें सँभालना कठिन हो जाएगा और भारतविरोधी सरकार के सामने एक बहुत बड़ी समस्या खड़ी हो जाएगी।

भारतविरोधी सरकार ने पब्लिक सेफ्टी बिल के नाम से मजदूरों को दबाने के लिए एक काला कानून बनाने का निश्चय किया।

दल की बैठक बुलाई गई। काफी सोच-विचार के बाद निश्चय किया गया कि केन्द्रीय असेम्बली के हाल में बम फैंककर बिल का विरोध किया जाए। बम का उदेश्य किसी की हत्या करना नहीं वल्कि भारतविरोधी सरकार को चेतावनी देना है।

असेम्बली हाल में बम फेंकने का काम भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त के सुपुर्द किया गया।

1929 ई. की 8वीं अप्रैल का दिन था। असेम्बली हाल में पब्लिक सेप्टी बिल पर विचार हो रहा था,बहस चल रही थी। सहसा हाल में बम का धमाका हुआ। बम दर्शकों की गैलरी से फेंका गया था।

सारा हाल धुएँ से भर गया। लोग इधर-उधर भागने लगे। कुछ लोग अपनी-अपनी मेजों के निचे छिप गए। गुलाम पुलिस गैलरी की ओर दौड़ पड़ी। गैलरी में दो युबक खड़े होकर मुस्करा रहे थे। उनमें से एक भगत सिंह जी व दूसरे बटुकेश्वर दत्त जी थे।

वे चाहते तो भाग सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया क्योंकि उनका काम अब पूरा हो चुका था। वे भारतविरोधी सरकार को चेतावनी देना चाहते थे और वह अब दे चुके थे।

गुलाम पुलिस को भगत सिंह के पास जाने का सहास नहीं हो रहा था। गुलाम पुलिस को भयभीत देखकर दोनों ने अपने-अपने हाथ उपर उठा दिए। गुलाम पुलिस ने आगे बढ़कर दोनों युबकों को गिरफ्तार कर लिया। उनके हाथों में हथकड़ी डाल दी।

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त जब बन्दी रूप में बाहर लाए गए तो इन्कलाब जिन्दाबाद, भगत सिंह जिन्दाबाद के नारों से वायुमण्डल गूँज उठा। उन नारों को सुनकर अंग्रेजों का ह्रदय ही नहीं वल्कि असेम्वली हाल की दीबारें भी काँप उठीं तो आश्चर्य नहीं।

भगत सिंह जी ने असेम्वली हाल में बम फैंकने के साथ ही बहुत से पर्चे भी फैंके थे। उन पर्चों पर आर्मी का चिन्ह और झण्डा बना हुआ था। उनमें लिखा था, “हमने किसी को मारने के उद्देश्य से बम नहीं फैंका है। हमने बहरों को यह बताने के लिए बम फैंका है कि पब्लिक सेप्टी बिल एक काला कानून है जो मजदूरों के रक्त का शोषण करेगा। हमने बम फैंककर इस काले कानून का विरोध किया है।”

भगत सिंह जी ने जब देश के नागरिकों को अंग्रेजों की गुलामी से सचेत करने के लिए बम फैंक था उस समय उस हाल में अंग्रेजों के पीठलगू मोती लाल नैहरू भी मौजूद था। इसके अतिरिक्त मदन मोहन मालवीय व वी. जी. पटेल भी वहाँ पर मौजूद थे।

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को बन्दी के रूप में दिल्ली की जेल में ले जाया गया। जेल में उन्हें अलग-अलग कमरों में रखा गया,उनपर बड़ी कड़ी निगरानी रखी जाती थी। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त जी को पहले तो छोटी अदालत में ले जाया गया लेकिन उन्होंने छोटी अदालत में बयान देने से मना कर दिया।

इसके बाद भगत सिंह जी और बटुकेशवर दत्त जी को सेशन जज के सामने पेश किया गया। दोनों वीर क्राँतिकारियों ने एक लिखित बयान दिया। बयान पर दोनों के हस्ताक्षर थे। भगत सिंह जी व बटुकेशवर दत्त जी ने अपने लिखित बयान में दुराचारी व अत्याचारी अंग्रेजों की पोल खोली था। उन्होंने अहिंसा के नाम पर कांग्रेसी नेताओं के देशविरोधी–अंग्रेज समर्थक रूख की कड़ी निंदा की थी। उन्होंने कहा था “हमने असेम्बली हाल में किसी की हत्या के उदेश्य से बम नहीं फैंका है। अगर हमारा उदेश्य किसी की जान लेना होता तो हम शक्तिशाली बम फैंकते। हमने असेम्वली हाल में अंग्रेजी भारतविरोधी सरकार को चेतावनी दी है कि उसके अत्याचार अब बहुत दिनों तक चलने वाले नहीं। अब भारत के युबक आगे आ गए हैं। वे भारतविरोधी सरकार के अत्याचारों का अन्त करके रहेंगे, भारत को गुलामी के फन्दे से छुड़ाकर रहेंगे। ”

भगत सिंह जी और बटुकेशवर दत्त जी के बयान को भारतविरोधी सरकार ने अपनी तरफ से जब्त करने की कोशिश की लेकिन इससे पहले ही ये बयान समाचारपत्रों में छप गया। आर्मी ने इसकी लाखों कापियां छपवाकर वितरित कीं। इसकी कापियां देश में ही नहीं अपितु विदेश में भी बाँटी गईं।

सेसन जज के सामने बयान देने के बाद भगत सिंह जी पर दो और अपराध लगाय गये—एक तो सैंडर्स की हत्या का और दूसरा लाहौर क्रान्ति का। जिसमें कई बड़े-बड़े दुष्ट अंग्रेज अधिकारियों को जान से मार डालने और शासन को उलटने की योजना थी। बटुकेशवर दत्त जी को उन दोनों अपराधों में सम्मिलित नहीं किया गया था। वे केवल असेम्बली हाल में बम फैंकने के अपराधी माने गए थे।

भगत सिंह जी पर जब दो और आपराध लगाए गए तो उन्हें दिल्ली की जेल से मियांवाली की जेल में ले जाया गया,क्योंकि वे दोनों अपराध लाहौर से ही सम्बम्ध रखते थे और उनका मुकदमा वहीं चल सकता था।

उन दिनों जेलों में राजनीतिक बन्दियों के साथ बड़ा बुरा व्यवहार किया जाता था। उन्हें कंकड़-पत्थर मिला हुआ खाना दिया जाता था। फलत : वे बीमार हो जाते थे। कुछ तो मर जाते थे,और कुछ का शरीर सदा के लिए खराब हो जाता था।

भगत सिंह जी के कानों में जब ये खबरें पड़ीं, तो वे काँप उठे। उन्होंने राजनीतिक बन्दियों की दशा सुधारने के उद्देश्य से भूख हड़ताल करने का निश्चय किया। उन्होंने इसकी सूचना भारतविरोधी सरकार को भी दे दी। उन्होंने भारतविरोधी सरकार के सामने कुछ मांगे भी रखीं,जिनमें कुछ इस प्रकार हैं

1) राजनीतिक बन्दियों को अच्छा खाना दिया जाए।

2) राजनीतिक बन्दियों को आपस में मिलने दिया जाए।

3) राजनीतिक बन्दियों को पढ़ने के लिए पत्र और पुस्तकें दी जांयें।

4) राजनीतिक बन्दियों को उनके घर वालों से मिलने दिया जाए।

पर भारतविरोधी सरकार ने भगत सिंह जी की मांगों पर ध्यान नहीं दिया । पलत: उन्होंने बटुकेश्वर दत्त के साथ भूख हड़ताल शुरू कर दी। उनकी भूख-हड़ताल से दूसरे कैदी भी प्रभावित हुए। वे भी उनकी सहानुभूति में भूख-हड़ताल करने लगे।

भगत सिंह जी की भूख हड़ताल से सारे देश में बहुत खलबली मची। देश के बड़े-बड़े नेता भारतविरोधी सरकार पर दबाब डालने लगे कि भगत सिंह जी की माँगों को मान ले। भारतविरोधी सरकार को आशा थी कि भूख हड़ताल कुछ ही दिनों में खत्म हो जाएगी,पर जब पूरा महीना बीत गया और हड़ताल जोर पकड़ने लगी, तो भारतविरोधी सरकार को झुकना पड़ा। भारतविरोधी सरकार ने भगत सिंह जी की मांगे मान लीं। फलस्वरूप भगत सिंह जी ने भूख हड़ताल समाप्त कर दी।

जिन दिनों भगत सिंह जी मियांवली की जेल में भूख हड़ताल पर थे, उन्हीं दिनों लाहौर की जेल में यतीन्द्रनाथ जी जी भूख-हड़ताल कर रहे थे। उनकी हालत बहुत खराब हो गई थी।1929 की 27वीं जुलाई को उनकी हालत चिन्ताजनक हो गई।

देश के बड़े-बड़े नेताओं ने यतीन्द्रनाथ जी से आग्रह किया कि वे भूख-हड़ताल खत्म कर दें, पर उन्होंने किसी की बात नहीं मानी। ऐसा लगा कि उनके प्राण-तन्तु टूट जायेंगे।

आखिर भगत सिंह जी से कहा गया कि वे यतीन्द्रनाथ जी दास को भूखहड़ताल समाप्त करने को राजी करें।

भगत सिंह जी को मियांवली जेल से लाहौर पहुंचाया गया। उन्होंने यतीन्द्रनाथ जी दास को भूख हड़ताल समाप्त करने के लिए राजी कर लिया। उन्होंने भारतविरोधी सरकार को भी इस बात के लिए राजी कर लिया कि वह यतीन्द्रनाथ दास जी को विना किसी शर्त के छोड़ देगी।

यतीन्द्रनाथ दास जी ने अपनी भूख हड़ताल समाप्त कर दी। एक दिन एक बड़े नेता ने उनको पूछा, “जिस काम को आपने बड़े-बड़े नेताओं के कहने पर नहीं किया था, उस काम को भगत सिंह के कहने से क्यों किया?”

यतीन्द्रनाथ दास जी ने उत्तर दिया, “भगत सिंह जी महान क्रांतिकारी हैं, महानदेशभक्त और वीर हैं। उनके कहने से भूखहड़ताल क्या, मैं अपने प्रणों का भी परित्याग कर सकता हूँ।”

यतीन्द्रनाथ दास जी ने तो भूख-हड़ताल समाप्त कर दी पर भारतविरोधी सरकार ने अपनी नीचता एक वार फिर प्रकट करते हुए अपने बायदे का पालन न कर उन्हें जेल से रिहा नहीं किया।

फलत: जेल में रहने वाले सभी क्राँतिकारी क्षुब्ध हो उठे। उन्होंने पुन: भूख-हड़ताल शुरू कर दी।

कुछ ही दिनों के बाद यतीन्द्रनाथ दास जी ने शरीर छेड़ दिया। सारे देश में उतेजना की लहर दौड़ पड़ी। लोग अत्याचारी अंग्रेज सरकार की निंदा करने लगे।

भगत सिंह जी और बटुकेश्वर दत्त जी की भी हालत खराब होने लगी। उनकी भूख हड़ताल काफी दिनों तक चली व अब तक हुई भूख हड़तालों के रिकार्ड टूट गए।

सारे देश में जोश पैदा हो गया। बड़े-बड़े नेता भारतविरोधी सरकार की निंदा करने लगे और भगत सिंह जी से निवेदन करने लगे कि वे भूख हड़ताल खत्म कर दें।

हालत बिगड़ती देखकर भारतविरोधी सरकार को झुकना पड़ा। भारतविरोधी सरकार ने भगत सिंह जी की बातें मान लीं और भगत सिंह जी ने भूख-हड़ताल समाप्त कर दी।

भगत सिंह जी ने जब हड़ताल खत्म कर दी तो उनपर जेल में ही मुकद्दमा चलाया जाने लगा। उन पर सबसे बड़ा जो आरेप लगाया गया ,वह लाहौर क्राँति का था। क्राँतिकरियों की कुल संख्या सोलह थी।

मुकद्दमे की कार्यवाही को देखने के लिए बाहर के किसी आदमी को आज्ञा नहीं थी। भगत सिंह जी ने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा, “जब तक मुकद्दमे की कार्यवाही को देखने के लिए जनता को नहीं आने दिया जायेगा, वे अदालत में उपस्थित नहीं होंगे।”

काफी तर्क-वितर्क और वाद-विवाद के बाद भारतविरोधी सरकार ने भगत सिंह जी की बात मान ली।

अदालत में मुकद्दमा शुरू हुआ। मुकद्दमे की कार्यवाही को देखने के लिए हजारों स्त्री-पुरूष उपस्थित होते थे। इन्कलाब-जिन्दाबाद के नारों के साथ क्राँतिकारी अदालत में प्रवेश करते थे। मुकद्दमे की विशेषता यह थी कि सभी अभियुक्त गवाहों से स्वयं जिरह करते थे।

जयगोपाल सरकारी गवाह बन गया था । एक दिन उसने क्रान्तिकारियों को कुछ बुरा-भला कहा। उसके शब्दों को सुनकर एक क्रांतिकारी से रहा न गया उसने इस पर चप्पल फैंक दिया।

इसके परिणामस्वारूप गुलाम अदालत ने क्रांतिकारियों को हथकड़ी पहनाकर लाने व गुलाम अदालत में भी हथकड़ी पहनाकर ही रखने के आदेश दे दिए।

भगत सिंह जी ने गुलाम अदालत के इन आदेशों का विरोध किया। उन्होंने कहा, जब तक गुलाम अदालत अपनी इस आज्ञा को वापस नहीं लेगी, वे अदालत में नहीं जायेंगे।

दूसरे दिन गुलाम पुलिस जब भगत सिंह को गुलाम अदालत ले जाने के लिए गई, तो उन्होंने इन्कार कर दिया। बड़े प्रयत्नों के बाद किसी तरह इस शर्त पर , कि गुलाम अदालत अपना आदेश वापस ले लेगी, पाँच आदमी अदालत ले जाए जा सके।

पर अदालत ने अपनी आज्ञा वापस नहीं ली। फलत: तीसरे दिन सभी क्राँतिकारियों ने अदालत जाने से इनकार कर दिया। क्राँतिकारियों के ले जाने के लिए गद्दार पठान सैनिक बुलाए गए । जब क्राँतिकारियों ने सैनिकों की बात नहीं मानी तो उन्हें बहुत मारा-पीटा गया। उन्हें मार-पीट कर कोठरी में बन्द कर दिया गया। कोठरियों के भीतर भी उन्हें बहुत मारा पीटा गया।

भगत सिंह जी को सबसे अधिक चोट पहुंचाई गई थी क्योंकि वे ही इन सब क्राँतिकारियों के नेता थे।

मार-पीट की खबर जब बाहर पहुंची तो सारे लाहौर नगर में उतेजना फैल गई। जनता ने एक बहुत बड़ी सभा करके भारतविरोधी सरकार की क्रूरता की नंदा की। केवल लाहौर ही नहीं सारे देश में भारतविरोधी सरकार की क्रूरता की निंदा की गई। जनता के दबाब को देखकर मोतीलाल नैहरू जैसे क्राँति विरोधी बड़े-बड़े नेता लाहौर जेल में गय और भगत सिंह और उनके साथियों से मिलकर उनका हाल-चाल पूछा।

भारतविरोधी सरकार भयभीत हो उठी उसने सोचा कि कहीं इस कांड को लेकर भारत में विप्लव न हो जाए।अत: उसे दबाने के लिए एक आरेडिनैंस निकाला। यह आर्डिनैंस लाहौर षडयन्त्र आर्डिनैंस के नाम से प्रसिद्ध है।

परिणाम उल्टा हुआ। आर्डिनैंस जारी होने पर लाहौर- क्राँति के मुकद्दमे की चर्चा देश में ही नहीं विदेशों में भी फैल गई। लाहौर क्राँति मुकद्दमा क्या है इस बात को जानने के लिए विदेशों के लोग भी उत्सुक हो उठे। देश के लोगों की सहानुभूति तो क्राँतिकारियों के साथ थी ही विदेशियों के मन में भी क्राँतिकारियों के प्रति सहानुभूति पैदा हो उठी।उन्हें छुड़ाने के लिए देश-विदेश सभी स्थानों ने चन्दा आने लगा । केवल चन्दा ही नहीं अबाजें भी उठने लगीं कि भगत सिंह और उनके साथियों को छोड़ जिया जाए,पर क्या भारतविरोधी सरकार के ह्रदय पर कुछ प्रभाव पड़ा? नहीं कदापि नहीं।

मुकद्दमे के दिनों में भगवतीचरण जी ने भगत सिंह जी को छुड़ाने का प्रयत्न किया था।उन्होंने एक योजना बनाई कि बम फैंककर जेल की दीवार को तोड़ दिया जाए और भगत सिंह जी को छुड़वा लिया जाए। भगवती चरण जी की यह योजना सफल नहीं हो सकी। बम समय से पहले ही फट गया और भेद खुल गया।

सरदार भगत सिंह जी और उनके साथियों को छुड़ाने का प्रयत्न किया गया पर सफलता नहीं मिल सकी। क्योंकि भारतविरोधी सरकार ने उन्हें हर हाल में फाँसी पर चढ़ाने का निर्णय कर लिया था। सारे देश की इच्छाओं और भावनाओं को कुचलते हुए गुलाम अदालत ने अपना फैसला सुना दिया। फैसले में भगत सिंह जी ,शिवराम जी और राजगरू जी को फाँसी की सजा दी गई थी।बटुकेश्वर दत्त सहित अन्य क्राँतिकारियों को काले पानी के दंड से दंडित किया गया। सारे देश में इस फैसले का विरोध किया गया। देश के कई बड़े नेताओं ने तार भेजकर वाइसराय से प्रार्थना की कि वे अपने विशेषाधिकार का प्रयोग कर फैसले को बदल दें, पर वाइसराय पर कि प्रभाव नहीं पड़ा। प्रिवीकौंसिल में अपील भी की, पर कुछ नहीं निकला।फाँसी की सजा बनी रही।फाँसी की सजा से दंडित किए जाने पर तीनों वीर क्राँतिकारी अपनी-अपनी कोठरी में बन्द कर दिए गए। तीनों बड़े प्रसन्न रहते थे। दिन रात वन्देमातरम् के गीत गाया करते थे व उस दिन की प्रतीक्षा किया करते थे जब वे देश की आजादी के लिए फांसी के तख्ते पर चढ़ जायेंगे।

फाँसी की सजा से पहले भगत सिंह जी के पिता ,उनकी माँ, उनकी दादी और अनेक रिस्तेदार उनसे मिलने के लिए गए थे। उनकी आँखें भरी हुई थीं। भगत सिंह जी ने उन्हें समझाते हुए कहा,“एक दिन मरना तो था ही । कितने हर्ष की बात है कि हम देश के लिए मर रहे हैं। अत: मेरी मृत्यु पर किसी को आँसू नहीं बहाना चाहिए; सबको प्रसन्न होना चाहिए।”

फाँसी देने का दिन 1931ई. की 24वीं मार्च निश्चित किया गया था, 23वीं मार्च को ही संध्या के बाद तीनों वीर क्राँतिकारियों को सूचित किया गया कि थोड़ी देर के बाद फांसी दी जाएगी।

भगत सिंह जी ने जेलर से कहा, “क्यों जेलर साहब , अंग्रेज सरकार कानून क्यों तोड़ रही है? फाँसी का दिन तो 24 मार्च निश्चित किया गया था।भारतविरोधी सरकार एक दिन पहले ही हमें क्यों फाँसी दे रही है?”

जेलर साहब उतर देते तो क्या देते?

सच तो यह था कि भारतविरोधी सरकार को डर था कि कहीं देश में क्राँति न फैल जाए। अत: उसने एक दिन पहले ही चुपचाप फाँसी देने का निश्चय किया।

रात के सात बजकर 33 मिनट हो रहे थे। तीनों वीर योद्धा वन्देमातरम् के गीत गाते हुए अपनी कोठरी से बाहर निकले । तीनों इन्कलाब जिन्दाबाद के नारों के साथ फाँसी के तख्ते पर चढ़ गए और कुछ सेकेंड में ही वे अनन्त दूरी पार करके स्वर्ग चले गए।

रात में ही तीनों वोरों को रावी नदी के किनारे ले जाया गया।एक ही चिता पर तीनों को मिट्टी का तेल डालकर जला दिया गया।

सवेरे जब यह खबर नगर में फैली तो लाखों नर-नारी रावी के किनारे की ओर दौड़ पड़े। चिता की धरती अब भी गरम थी।

नर-नारियों की आँखों में आँसू बरस रहे थे। भगत सिंह जिन्दाबाद, राजगरू जिन्दाबाद, शिवराम जिन्दाबाद, के नारों से आकाश गूँज रहा था।कोई चिता की राख ले जा रहा था, तो कोई मिट्टी कुरेद रहा था।वह दृश्य बहुत ही करूणिक था, बड़ा ही पीड़ाजनक था।

तीन दिनों तक लगातार लाखों नर-नारी इकट्ठे होते रहे,अपने आँसुओं से उस धरती को धोते रहे।

अब भी जब 23 मार्च का दिन आता है,तो लाखों नर-नारी उस जगह इकट्ठे होते हैं और भगत सिंह जी की याद में अपनी आँखों के बगीचे के फूल उस जगह बिखेरते हैँ।यह क्रम चुगों-युगों तक चलता रहेगा। क्योंकि भगत सिंह और उनके साथी s5अपने पबित्र बलिदान से देवता की भाँति वन्दनीय बन गए हैं।

व्यथित ह्रदय जी की पस्तक -1992

अमर शहीद : सरदार भगत सिंह

से अधिकतर जानकारी ली गई।

व्यथित ह्रदय जी का हार्दिक धन्यवाद।