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मोदीराज लाओ

मोदीराज लाओ
भारत बचाओ

शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

Happy New Year/ मुबारकें/ अखबार/ स्कूल/ किताब/ Hallow/ hi…

हम अक्सर अपने सेकुलर मित्रों को भारत की बर्तमान दुर्दशा के लिए कोसते रहते हैं । लेकिन हमें लगता है कि भारत के लगातार बिगड़ते हालात के लिए देशभक्त मित्र सेकुलर मित्रों से कहीं अधिक जिम्मेदार हैं।
क्यों आओ जरा अपने अन्दर झांक कर इस कड़वी सच्चाई का सामना कर इस सच्चाई को बदलने की दिशा में आगे बड़ें।
सेकुलर गिरोह में अधिकतर वो लोग हैं जो या तो भारत के ताकबर और मानबतावादी इतिहास से अपरिचित हैं या फिर अपने निजी स्वार्थों के कारण देश के दुशमनों के हाथों विक चुके हैं या फिर वो लोग हैं जो आज तक मुसलमानों और अंग्रेजों की लम्बी गुलामी के परिणामस्वारूप पैदा हुई बौद्धिक गुलामी से अभी तक बाहर नहीं निकल पाए हैं।
लेकिन देशभक्त संगठनों में तो वो लोग हैं जो इस बौद्धिक गुलामी से खुद को मुक्त मानते हैं ।लेकिन वास्तविकता थोड़ी कड़वी है क्योंकि जो खुद को बौद्धिक गुलामी से मुक्त मानते हैं वो भी अक्सर जाने अनजाने  ब्यावहार में बौद्धिक गुलामों जैसा ही आचरण करते हैं।
उपर जो शब्द हमने लिखे हैं ये वो शब्द हैं जो हमने अक्कसर देशभक्तों के मुंह से सुने हैं ।जबकि इन शब्दों के चलन का प्रमुख कारण गुलामी का असर ही है।
भारतीय तरीके से किसी की खुशी को मनाने पर हम उसे बधाईयां देते हैं लेकिन हमारे देशभक्त मित्र अक्कसर मुबारकें शब्द का प्रयोग करते हैं जो कि मुसलमानों की गुलामी के परिणामस्वारूप अस्तिस्व में आया। इसी बौद्धिक गुलामी का ही परिणाम है कि हम आज भी विद्यालय की जगह स्कूल, पुस्तक की जगह किताब, समाचार पत्र की जगह अखबार  का अक्कसर प्रयोग करते हैं।
हम खुद भी बौद्धिक गुलामी के ऐसे ही लक्षणों से ग्रसित हैं जिन्हें दूर करने का प्रयत्न कर रहे हैं। ये लेख हमारी अपनी निजी कमजोरियों की ही उपज है।
आज भारत में वो कौन सा घर(सेकुलर या देशभक्त) है जिस घर में मार्च-अप्रैल में आने वाले नबरात्रों में कन्या विठाकर व प्रसाद बांट कर नए वर्ष का स्वागत नहीं किया जाता हो लेकिन ये अंग्रेजों की गुलामी का ही असर है कि इशामसीह  के मरने के दिन, हम भी मूर्ख अंग्रेजों   की ही तरह एक-दूसरे को Happy New Year H N Y 2012कहते हैं। वेशक किसी की खुशी में शामिल होने में कोई हर्ज नहीं लेकिन भारत की परम्परा में किसी बुरे से बुरे इनसान के मरने पर भी खुशियां नहीं मनाई जाती, जबकि इशामसीह तो एक भले इनसान थे, फिर उनके मरने पर खुशियां कैसी?
कहते हैं समझदार को इशारा ही काफी होता है इसलिए हमने अपने देशभक्त मित्रों को सिर्फ एक इसारा किया है आशा है वो इस इशारे को समझकर खुद को स्वादेशी के मार्ग पर आगे बढ़ाकर अपने अन्दर पाए जाने वाले बौद्धिक गुलामी के लक्षणों को दूर करने का यथा सम्भव प्रयत्न करेंगे। 

3 टिप्‍पणियां:

aisha ने कहा…

its nice to read a useful article for beginner like me. Some of points from this article are very helpful for me as I haven’t considered them yet. I would like to say thank you for sharing this cool article. Bookmarked and sharing for friends.
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दीर्घतमा ने कहा…

सुनील जी नमस्ते
केवल सरकार की सत्ता परिवर्तन हुआ है न की सूरज आया है हम आज़ादी के रट्टू तोता हो गए है अभी गुलामी के ही तो संबिधान है क्या हिन्दू धर्म के अनुसार कुछ होता है नहीं तो क्या हिन्दू आजाद है हम फिर बहुत बिचित्र गुलामी में फस चुके है .

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

वो जाते-जाते, करना था सो काम कर गये।
जो उनके थे, भारत उन्हीं के नाम कर गये ।
भारत को इन्डिया बनाकर क्या घात कर गये।
आजादी देकर, तन मन से गुलाम कर गये ॥