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मोदीराज लाओ

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भारत बचाओ

सोमवार, 25 फ़रवरी 2013

राजा वीरभद्र सिंह जी आपने ये क्या कर दिया?

हिमाचल एक छोटा सा राज्य है जिसका राष्ट्रीय राजनीति पर ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता लेकिन फिर भी हिमाचल में चर्च द्वारा अपनी मर्जी की सरकार बनवाने के लिए कई तरह के षडयन्त्र  रचे जाते हैं ।

पहले तो चर्च ने उतर पूर्व के छोटे राज्यों की तरह हिमाचल को भी हिन्दूविहीन करने के लिए धनवल से धर्मांतरण अभियान चलया जिसका हिमाचल के लोंगों ने हिन्दू संगठनों के साथ मिलकर  डटकर विरोध किया ।

इस विरोध को असली ताकत तब मिली जब बीरभद्र सिंह जी ने हिमाचल में धर्मस्वतन्त्रता  विधेयक पारित करवाकर ये सुनिश्चित किया कि चर्च हिमाचलियों पर जोर जबरदस्ती न कर सके ।

हद तो तब हो गई जब चर्च ने चोरी और सीना जोरी की कहाबत को सच साबित करते हुए  इस कानून को कोर्ट में चैलेंज किया लेकिन अन्त में विजय सत्य की ही हुई और माननीय न्यायलय ने इस कानून को सही ठहराया।

हम सब जानते हैं कि चर्च अपने षडयन्त्रों को आगे बढ़ाने के लिए इटालियन अंग्रेज एटवीज एंटोनिया अलवीना माइनो का हर तरह से उपयोग करता है और हिमाचल के मामले में भी राजा बीरभद्र सिंह जी पर हर सम्भव दबाब डाला गया देशहित-हिन्दूहित में बनाए गए इस कानून को रद्द कवाने के लिए।

लेकिन राज साहब ने चर्च और उसके ऐजेंटों की एक न सुनते हुए इस कानून को अमलीजामा पहनाकर ही दम लिया ।राजा साहब के इसी फैसले से खुश होकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पत्रिका पंचजन्य में राजा साहब को हिमाचल का लौहपुरष का खिताब देकर सम्मानित किया गया।

लेकिन हिन्दूहित-देशहित में राजा साहब द्वारा बनया गया ये कानून व देशभक्तों द्वारा राजा साहब को  दिया गया ये सम्मान चर्च के उन ऐजेंटों को रास न आया जिनको हिन्दूहित-भारत हित नहीं वल्कि जिनका मकसद हिन्दूविरोध-भारतविरोध  है।

परिणामस्वारूप  राजा साहब को योजनाबद्ध तरीके से हटाकर उनकी जगह एक ईसाई को नेता विपक्ष की कुर्सी पर बिठा दिया गया लेकिन जब हिमाचल की भोली-भाली लेकिन समझदार जनता से इस ईसाई को कोई जनसमर्थन न मिला तो आखिरकार चर्च को राजा बीरभद्र सिंह जी के आगे घुटने टेकने पड़े ।

इससे पहले राजा साहब को चर्च के आगे घुटने टेकने को मजबूर करने के लिए युबा काँग्रेस के  प्रधान के पद पर भारी बहुमत से चुने गए इनके बेटे बिक्रम सिंह  का चुनाब रद्द करते हुए उनकी दोबारा जीत के डर से उनके दोबारा चुनाब लडने पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया गया।

राजा साहब के ऐसे बहुत से फैसले हैं जिनके कारण हमारे जैसे बहुत से लोग जो चर्च की गुलाम कांग्रेस के हिन्दूविरोधी-भारतविरोधी षडयन्त्रों के प्रखर विरोधी होने के बाबजूद राजा साहब के कट्टर समर्थक हैं ।

लेकिन राजा साहब द्वारा चर्च के दबाब के आगे झुकते हुए स्वामी रामदेव जी के ट्रस्ट पतंजली योगपीठ को आबंटित भूमि को रद्द करना एक ऐसा अलोकप्रिए कदम है जो राजा साहब जी की प्रखर देसभक्त की छबि से कतई मेल नहीं खाता।

राजा साहब को  समझना चाहिए कि बिदेशों के इसारों पर काम करने वाली काँग्रेस ने जो काम पिछले साठ वर्षों में नहीं किया वही काम स्वामी रामदेव जी ने पिछ 15 वर्ष में कर दिखाया ये काम हैं भारतीय जीवन पद्धति के प्रचार-प्रसार के साथ-साथ भारतीय औषध दर्शन आयुर्वेद का विकस व आयुर्वेद के श्रेत्र में विशाल शोध कार्य।

अब अगर भारत हित के इस पुन्य कार्य के लिए हिमाचल में जमीन नहीं दी जा सकती तो फिर भारतविरोधी-हिन्दूविरोधी कार्यों में संलिपत चर्च को आज तक जितनी भी जमीन आबंटित की गई है उस सबको बापस लेकर हिमाचल की जनता को हवाले कर देना चाहिए।

अगर राजा साहब प्रशांत-भूषण को दी गई जमीन को बापस लेते तो हम कह सकते थे कि एक ऐसे गद्दार जो पाकिस्तान की भाषा बोलता हो  को जमीन देना पूरी तरह नजायज था।

अब राजा साहब और प्रेम कुमार धूमल को हिमाचल की जनता को ये भी बताना चाहिए कि प्रियंका बाढरा को हिमाचल की जमीन किस समाजिक कार्य के लिए दी गई।priyanka.htm1

आज भी हमारी राय पूरी तरह सपष्ट है कि राजा साहब का ये फैसला चर्च के दबाब में लिया गया वो फैसला है जो राजा साहब द्वारा वर्षों की मेहनत के वाद वनाई गई देशभक्त जननेता की छवि को धूमिल करेगा व राजा साहब के विरोधी उनकी इस छवि के कमजोर होते ही उनको उनके पद से दरकिनार कर चर्च के दुलारे एक ऐसे वयक्ति को इस पद पर बिठा देंगें जिसकी पत्नी न केवल इटालियन है वल्कि ईसाई भी है और राजा साहब बिरोध भी नहीं कर पायेंगे क्योंकि अगर चुनाब से ठीक पहले चर्च ने घुटने टेके हैं तो राजा साबह की देशभक्त जननेता की छवि के सामने क्योंकि ये वो छवि है जो सारे भारत में काँग्रेस विरोधी महौल होने व चुनाब के दौरान चर्च नियंत्रित कांग्रेस सरकार द्वारा तमाम अलोकप्रिए फैसले करने के बाबजूद हिमाचल की जनता ने सेकुलर प्रेमकुमार धूमल को पटकनी देकर हिन्दूत्वनिष्ठ बीरभद्र सिंह को हिमाचल की सता पर बिठाया लेकिन ये शायद जनता ने स्वपन में भी नहीं सोचा होगा कि राजा साहब मजबूर होकर चर्च के  आगे गुटने टेक देंगे ।

हमें अभी भी उम्मीद है कि राजा साहब अपने समर्थकों की उम्मीदों व भावनाओं का ख्याल रखते  हुए अपने इस फैसले को यथाशीघ्र दुरूस्त करेंगे ।

वरना राजा साहब के समर्थक यही कहते-कहते उनका साथ छोड़ जायेंगे कि-------

राजा वीरभद्र सिंह जी आपने ये क्या कर दिया?

3 टिप्‍पणियां:

दिवाकर मणि ने कहा…

मुझे बीरभद्र सिंह और हिमाचली राजनीति के बारे में ज्यादा नहीं पता था लेकिन आपके इस आलेख से सच्चाई का साक्षात्कार करने का मौका मिला। इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद. :)

MANU PRAKASH TYAGI ने कहा…

और क्या कर सकते थे

gattu great ने कहा…

एसी कौन सी मजबुरी की अपने और अपने प्रजा से समझौता