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मोदीराज लाओ

मोदीराज लाओ
भारत बचाओ

शनिवार, 21 अगस्त 2010

NGOs के माध्यम से चर्च के भारत-विरोधी षड्यन्त्र-1




विश्वभर में ईसाईयत के इतिहास में द्वितीय विश्वयुद्ध से एक नए पतन का सूत्रपात हुआ।युद्ध के अन्त में चर्च ने व्याकुलता से देखा कि अमेरिका के नेतृत्व में पशचमी ईसाई ताकतें विजयी हुई लेकिन 16वीं शताब्दी से बढ़ते जा रहे उपनिवेशवाद व साम्राज्यवाद संवेग रूक गया व क्षीण होना शुरू हो गया।जिसके निम्न परिणाम हुए।।।


1. राजा व प्रजा दोनों के ईसाई होने के बाबजूद यूरोप व रूस और उसकी कठपुतली सरकारों से चर्च का नियन्त्रण समाप्त हो गया। 1949 में इसी समूह में चीन भी शआमिल होगया जिससे चर्च को और धक्का लगा।


2. विश्व युद्ध के दौरान अन्दर से कमजोर होने व आजाद हिन्द सेना के डर से ईसाई सम्राज्यवाद को भारत से भी हटना पड़ा परिणामस्वारूप एशियाई व अप्रीकी देशों में स्वतन्त्रता अन्दोलनों ने जोर पकड़ा व बहुत से देश स्वतन्त्र राज्य बन गए।


3. विदेशी उपनिवेशवादियों और दमनकारियों का पोषक होने के कारण शासन की समाप्ति के साथ ही चर्च पर हमले होने शुरू हुए।चीन की देशभक्त सरकार ने अपने यहां से 1950-51 तक सब ईसाई मिशनरियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया।


4. भारत में बेशक ईसाईयों के चाटुकार नेहरू जैसे नेता चर्च के प्रभाव को बचाने का हर सम्भव प्रयास कर रहे थे पर जनता में इतना रोष था कि लोगों ने कुतों के नाम तक ईसाई रखने शुरू कर दिए। इसी प्रकार लगभग सब नवस्वतन्त्र देशों में धर्मांतरण की संम्भावनायें क्षीण होती चली गईं।


5. विश्वयुद्ध के पश्चात चर्च को अपने केन्द्रस्थल यूरोप और अमेरिका में अयन्त गम्भीर संकट का सामना करना पड़ा।औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वारूप इन देशों में अति भौतिकवादी व सुविधाभोगी समाज की रचना हुई जिसकी चर्च में कोई आस्था नहीं थी। क्योंकि चर्च ने हमेशा एक राजनीतिक संस्था के रूप में काम किया है इसलिए आध्यातमिकता के अभाव के कारण नई पीढी की चर्च में कोई रूचि नहीं थी।बेशक शासनाध्यक्ष द्वारा बाईबल की शपथ लेने के बाबजूद जनता व चर्च में गृहयुद्ध जैसी स्थिति थी।USA व अफ्रीकी देशों में काले लोगों की शक्ति बढ़ रही थी। काले इसाई लोगों व गोरे इसाई लोगों के बीच संघर्ष तीव्र हो रहा था।क्यूवा में फ्रिडेल कास्त्रो की क्रांति की सफलता के कारण अन्य अप्रीकी देशों में भी गोरिला युद्ध को बढ़ावा मिल रहा था। ऐसे में चर्च के सामने प्रश्न खड़ा हुआ कि भ्रष्ट तानशाहों का साथ दिया जाए या फिर बहुसंख्यक काले लोगों के संघर्ष में साथ दिया जाय। इससे पहले कि चर्च कोई निर्णय लेता कुछ विशप दक्षिणी अमेरिका में काले लोगों के पक्ष में संघर्ष में कूद पड़े और मुक्तियुद्द के प्रेरक बने।1960 में ब्राजील में जनजागरण करने वाले पालो प्रेरे नाम के पादरी को वहां की सरकार ने 1964 में नजरबन्द कर 1968 में देशनिकाला दे दिया।1971 में उसे WCC (WORLD COUNCIL OF CHURCHES)का परामर्शदाता चर्च ने नियुक्त किया।


इसी पोलो प्रेरो नाम के पादरी ने मार्कसवाद तथा चर्च दोनों का घोलमेल किया। यह पादरी एक स्थान पर लिखता है कि “मैं ब्राजील की गन्दी बस्तियों में मार्क्श के कारण नहीं अपितु ईसा के कारण आया। बस्ती के लोगों ने मुझसे कहा, कि जाइए “ मार्क्स को जानिए” उनकी जिद ने मुझे मार्क्स के पास भेजा।अब में सहज रूप से दोनों को जानता हूं।”

2 टिप्‍पणियां:

Suresh Chiplunkar ने कहा…

अगले भागों का इन्तज़ार रहेगा… NGOs को विदेशों से इसीलिये भारी मात्रा में पैसा भी मिलता है, और राजनैतिक समर्थन भी…

Mithilesh dubey ने कहा…

अगले भागों का इन्तज़ार रहेगा